राज्यसभा चुनाव में दो वोट का खेल
NDA के कुनबे में सेंध या सपा की बड़ी रणनीति? 10वीं सीट पर बढ़ा रोमांच
उत्तर प्रदेश में 16 अक्टूबर को होने वाला राज्यसभा चुनाव अब सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं रह गया है। 10 सीटों के लिए होने वाले चुनाव में बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच असली मुकाबला उस अतिरिक्त सीट को लेकर बनता दिख रहा है, जिस पर दोनों खेमे अपनी-अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। और इसी बीच NDA में शामिल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के दो विधायकों के सपा के पक्ष में वोट करने की चर्चा ने पूरे समीकरण को दिलचस्प बना दिया है। सुभासपा प्रमुख और यूपी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने खुद कहा है कि अब्बास अंसारी और जगदीश नारायण राय सपा के लोग हैं और उनके सपा के पक्ष में वोट करने की संभावना है। दोनों 2022 में सुभासपा के टिकट पर जीते थे, लेकिन उस समय सुभासपा का गठबंधन सपा के साथ था।
1. दो वोट दिखने में छोटे, असर बड़ा
राज्यसभा चुनाव में एक सीट जीतने के लिए फिलहाल करीब 37 प्रथम वरीयता वोट चाहिए। यूपी विधानसभा की प्रभावी संख्या को लेकर हालिया रिपोर्टों में 396-397 का आंकड़ा सामने आया है। इसी वजह से 37 वोट का आंकड़ा महत्वपूर्ण है। बीजेपी और उसके सहयोगियों के पास आठवीं सीट के लिए पर्याप्त संख्या के बेहद करीब आंकड़ा है। ऐसे में NDA के दो विधायक अगर सपा के पक्ष में जाते हैं तो संख्या का मामूली अंतर भी आठवीं सीट की गणित को प्रभावित कर सकता है। यानी यहां एक-एक विधायक की कीमत बढ़ गई है।
2. सपा का असली निशाना तीसरी सीट?
सपा ने फिलहाल रामगोपाल यादव और धनराज नाथवानी को उम्मीदवार बनाया है। दोनों की जीत के लिए सपा और कांग्रेस के मौजूदा आंकड़े पर्याप्त माने जा रहे हैं। लेकिन असली राजनीतिक कहानी तीसरे उम्मीदवार को लेकर है। सपा के पास दो सीट जीतने के बाद भी कुछ अतिरिक्त वोट बचते हैं। तीसरी सीट के लिए उसे लगभग नौ और प्रथम वरीयता वोटों की जरूरत पड़ सकती है। यही वजह है कि पार्टी NDA के भीतर संभावित क्रॉस वोटिंग पर नजर रख रही है। यानी अखिलेश यादव के सामने अब सवाल सिर्फ दो सीट बचाने का नहीं, बल्कि तीसरी सीट के लिए संख्या जुटाने का भी है।
3. अब्बास अंसारी का नाम क्यों अहम?
अब्बास अंसारी और अखिलेश यादव की हालिया मुलाकात ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी थी। इसके बाद ओमप्रकाश राजभर का बयान सामने आया। राजभर के मुताबिक दोनों विधायक 2022 से ही सपा के साथ रहे हैं और उनका सपा से जुड़ाव कोई नई बात नहीं है। इसलिए सपा के लिए यह सिर्फ चुनाव के दिन होने वाला संभावित क्रॉस वोट नहीं है। यह उस पुराने गठबंधन की राजनीतिक विरासत से भी जुड़ा है, जिसके तहत 2022 में सुभासपा और सपा साथ चुनाव लड़े थे।
4. NDA की चुनौती सिर्फ दो विधायक नहीं
NDA के सामने गणित और भी पेचीदा है। बीजेपी के पास 255 विधायक हैं और उसके सहयोगियों को जोड़ने पर संख्या 288 के आसपास पहुंचती है। कुछ अन्य समर्थक विधायकों को जोड़कर NDA की प्रभावी संख्या 294 बताई गई है, जबकि आठ सीट सुनिश्चित करने के लिए करीब 296 प्रथम वरीयता वोट चाहिए। ऐसे में दो सुभासपा विधायकों का संभावित क्रॉस वोट NDA की संख्या को और नीचे ला सकता है। हालांकि बीजेपी की तरफ से भी ऐसे विधायकों पर नजर है जिन्होंने पिछले राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोट किया था। यानी मुकाबला एकतरफा नहीं है।
5. अखिलेश की रणनीति—कहां से आएंगे नौ वोट?
सपा के पास तीसरी सीट के लिए सबसे बड़ा सवाल संख्या का है। सपा और कांग्रेस के पास मिलाकर करीब 102 प्रभावी वोट बताए जा रहे हैं। दो उम्मीदवारों के लिए 74 वोट खर्च होने के बाद करीब 28 वोट बचते हैं। तीसरी सीट के लिए लगभग 9 और वोट चाहिए। यहीं से सपा की रणनीति शुरू होती है। NDA के सहयोगी दलों के ऐसे विधायक, जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि कभी सपा के साथ रही हो, सपा के लिए संभावित संपर्क का आधार बन सकते हैं। अखिलेश यादव ने भी संकेत दिया है कि कुछ लोग NDA में असंतुष्ट हैं और वापस आना चाहते हैं। हालांकि यह राजनीतिक दावा है, अंतिम स्थिति मतदान के समय ही स्पष्ट होगी।
6. बीजेपी के लिए भी परीक्षा
बीजेपी के सामने चुनौती सिर्फ सपा के तीसरे उम्मीदवार को रोकने की नहीं है। पार्टी की कोशिश आठ सीटों पर जीत सुनिश्चित करने की है। अगर सहयोगी दलों के कुछ विधायक अलग वोट करते हैं और दूसरी तरफ सपा अतिरिक्त वोट जुटा लेती है, तो दसवीं सीट का मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है। यानी राज्यसभा चुनाव में पहली बार नहीं, लेकिन एक बार फिर क्रॉस वोटिंग ही सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकती है।
7. 2024 की याद, 2026 का नया मुकाबला
2024 के राज्यसभा चुनाव में भी उत्तर प्रदेश में क्रॉस वोटिंग ने बड़ा असर डाला था। उस समय बीजेपी ने आठ सीटें जीती थीं और सपा का तीसरा उम्मीदवार हार गया था। अब 2026 में परिस्थितियां कुछ अलग हैं। सपा पहले से दो उम्मीदवार घोषित कर चुकी है और तीसरी सीट की संभावना तलाश रही है। दूसरी तरफ बीजेपी के सामने आठवीं सीट के लिए अपने सहयोगियों और संभावित क्रॉस वोटिंग को संभालने की चुनौती है। यानी पिछली बार जिस हथियार ने सपा के तीसरे उम्मीदवार की राह रोकी थी, इस बार वही हथियार दोनों खेमों के हाथ में हो सकता है।
37 वोट का खेल, एक सीट का सवाल
यूपी का राज्यसभा चुनाव 10 सीटों का है, लेकिन राजनीतिक रोमांच मुख्य रूप से आठवीं, नौवीं और दसवीं सीट के गणित में छिपा है। सुभासपा के दो विधायकों का संभावित सपा समर्थन संख्या में छोटा दिखाई देता है, लेकिन जब हर सीट के लिए 37 वोट की जरूरत हो तो दो वोट भी रणनीति बदल सकते हैं। अब निगाहें तीन चीजों पर हैं— सुभासपा के बाकी विधायक किस तरफ जाते हैं? NDA के भीतर क्रॉस वोटिंग कितनी होती है? और क्या अखिलेश यादव तीसरी सीट के लिए जरूरी अतिरिक्त वोट जुटा पाते हैं? 16 अक्टूबर का मतदान इन सभी दावों और रणनीतियों की असली परीक्षा होगा। राज्यसभा की यह लड़ाई सिर्फ संसद की एक सीट की नहीं है। 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले यह दोनों खेमों के संगठन, गठबंधन और विधायकों पर पकड़ का भी राजनीतिक संकेत बन सकती है।