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महिला आरक्षण का इंतजार क्यों? 2029 से पहले परिसीमन बना सबसे बड़ा पेंच

DigitalDesk by DigitalDesk
August 10, 2026
in मुख्य समाचार
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women reservation Delimitation
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नई दिल्ली। महिला आरक्षण… संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने का वो वादा, जिसे पूरा करने के लिए संसद ने 2023 में ऐतिहासिक कानून पास किया था। संविधान के 106वें संशोधन के जरिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम अस्तित्व में आया और लोकसभा, राज्य विधानसभाओं तथा दिल्ली विधानसभा में करीब एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का रास्ता साफ हुआ। लेकिन कानून बनने के करीब तीन साल बाद भी यह आरक्षण चुनावी जमीन पर लागू नहीं हो सका है।

अब 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। खास बात यह है कि इस बहस में सिर्फ महिलाओं को आरक्षण देने का सवाल नहीं है, बल्कि इसके पीछे जनगणना और परिसीमन की पूरी संवैधानिक प्रक्रिया जुड़ी हुई है। यही वजह है कि केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच इस मुद्दे पर हुई सार्वजनिक बहस ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है।

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1. कानून बना, लेकिन आरक्षण अभी दूर

महिला आरक्षण कानून को संसद ने सितंबर 2023 में पारित किया था। इसका उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है। कानून के तहत करीब एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान है।

लेकिन कानून में इसके तत्काल लागू होने का प्रावधान नहीं है। इसके लिए पहले जनगणना के आंकड़ों का प्रकाशन और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया जरूरी है। परिसीमन के बाद ही यह तय किया जाना है कि कौन-कौन सी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।

यानी संसद से कानून पास होना पहला कदम था, लेकिन उसके बाद की संवैधानिक प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि महिला आरक्षण वास्तव में चुनावी मैदान में कब दिखाई देगा।

यही वो बिंदु है जिस पर अब सियासी बहस तेज हो गई है।

2. परिसीमन क्यों बना सबसे बड़ा सवाल?

परिसीमन का मतलब है निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का नए सिरे से निर्धारण। आसान भाषा में कहें तो जनसंख्या के आंकड़ों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर यह तय करना कि देश में लोकसभा और विधानसभा की सीटों का स्वरूप क्या होगा और अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं कहां तक होंगी।

महिला आरक्षण कानून में सीटों के आरक्षण को परिसीमन से जोड़ा गया है। इसलिए जब तक नया निर्वाचन क्षेत्र ढांचा तय नहीं होता, तब तक महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की पहचान भी नहीं हो सकती।

यहीं से 2029 का चुनाव महत्वपूर्ण हो जाता है।

कानून के मुताबिक पहले जनगणना के आंकड़े सामने आएंगे, उसके बाद परिसीमन होगा और फिर आरक्षित सीटों का निर्धारण किया जाएगा। पूरी प्रक्रिया को पूरा करने में लगने वाला समय अब राजनीतिक चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है।

2027 की प्रस्तावित जनगणना के आंकड़े सामने आने के बाद परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने की स्थिति में 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले इसे पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसी आशंका ने महिला आरक्षण की समयसीमा को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

3. राहुल बनाम रिजिजू: असली विवाद क्या है?

महिला आरक्षण को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक बयानबाजी अब सीधे तौर पर परिसीमन की प्रक्रिया तक पहुंच गई है।

राहुल गांधी का तर्क है कि महिला आरक्षण कानून संसद से पहले ही पारित हो चुका है और अब इसे लागू करने की जरूरत है। उनके मुताबिक महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए और इंतजार नहीं कराया जाना चाहिए।

दूसरी तरफ केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू का कहना है कि महिला आरक्षण कानून की संवैधानिक व्यवस्था को समझना जरूरी है। उनके मुताबिक आरक्षण को लागू करने के लिए परिसीमन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है और यदि इसे 2029 के लोकसभा चुनाव में लागू करना है तो परिसीमन की प्रक्रिया को समय रहते आगे बढ़ाना होगा।

यानी विवाद इस बात पर नहीं है कि महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए या नहीं।

असल सवाल है—यह आरक्षण लागू कब होगा और इसके लिए जरूरी परिसीमन कब पूरा होगा?

यही सवाल अब सरकार और विपक्ष के बीच सियासी बहस का नया केंद्र बन गया है।

4. परिसीमन बदलेगा तो बदल सकता है राजनीतिक नक्शा

परिसीमन का असर केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं रहेगा। अगर लोकसभा की सीटों की संख्या और राज्यों के बीच सीटों का वितरण बदलता है तो इसका असर देश की पूरी राजनीतिक तस्वीर पर पड़ सकता है।

आबादी के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण की संभावना को लेकर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच प्रतिनिधित्व का सवाल पहले से संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा रहा है।

दक्षिणी राज्यों की चिंता यह रही है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन किया है, अगर भविष्य में केवल आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होता है तो उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से नुकसान हो सकता है।

दूसरी तरफ ज्यादा आबादी वाले राज्यों का तर्क प्रतिनिधित्व के लोकतांत्रिक सिद्धांत से जुड़ा है।

इसलिए परिसीमन सिर्फ निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने की प्रशासनिक कवायद नहीं है। यह संसद में राज्यों की ताकत, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भविष्य के चुनावी समीकरण को प्रभावित करने वाली बड़ी संवैधानिक प्रक्रिया है।

और इसी पूरी प्रक्रिया के साथ महिला आरक्षण भी जुड़ा हुआ है।

5. 2029 से पहले क्या निकल सकता है रास्ता?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या महिला आरक्षण को 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू करने का कोई रास्ता निकाला जा सकता है?

2023 का कानून परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती समयसीमा की है। दूसरी तरफ विपक्ष इस मुद्दे को महिलाओं के राजनीतिक अधिकार और प्रतिनिधित्व से जोड़कर सरकार पर जल्द कार्रवाई का दबाव बना सकता है।

अगर परिसीमन की प्रक्रिया समय पर पूरी होती है तो महिला आरक्षण के लागू होने का रास्ता खुल सकता है। लेकिन अगर प्रक्रिया में देरी होती है तो 2029 के चुनाव में भी मौजूदा व्यवस्था जारी रहने की संभावना पर सवाल उठेंगे।

इसलिए आने वाले महीनों में संसद के भीतर और बाहर महिला आरक्षण के साथ-साथ परिसीमन पर भी बहस तेज होना तय माना जा रहा है।

कुल मिलाकर कहानी सिर्फ महिला आरक्षण की नहीं है। कहानी उस संवैधानिक रास्ते की है, जो महिला आरक्षण को चुनावी हकीकत में बदलने वाला है।

कानून बन चुका है… महिलाओं के लिए करीब एक-तिहाई राजनीतिक हिस्सेदारी का लक्ष्य तय हो चुका है… लेकिन उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जनगणना, परिसीमन और सीटों के आरक्षण की लंबी प्रक्रिया बाकी है।

अब सवाल सिर्फ इतना नहीं कि महिलाओं को आरक्षण कब मिलेगा?

सवाल यह भी है कि परिसीमन कब होगा, सीटों का नया नक्शा कैसा होगा और 2029 का लोकसभा चुनाव इस बदलाव का गवाह बनेगा या नहीं?

यही वो सवाल हैं, जिनके जवाब आने वाले समय में भारतीय राजनीति के प्रतिनिधित्व का नया अध्याय लिख सकते हैं।

Tags: #women reservation Delimitation
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