नेशनल स्पोर्ट्स डे पर बड़ा सवाल: चैंपियन बनने से पहले कौन संभालता है खिलाड़ियों को?
जब कोई भारतीय खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर मेडल जीतता है तो पूरा देश उसकी कहानी जानना चाहता है। टीवी चैनल इंटरव्यू लेते हैं, सरकार इनामों की घोषणा करती है, ब्रांड विज्ञापन के लिए आगे आते हैं और सोशल मीडिया पर देशभक्ति के संदेशों की बाढ़ आ जाती है। लेकिन उस चमकदार जीत के पीछे वर्षों की वह मेहनत छिपी होती है, जब खिलाड़ी को शायद ही कोई पहचानता था। वह सुबह 4 बजे उठकर अभ्यास करने वाला बच्चा होता है, जिसके माता-पिता ने उपकरण खरीदने के लिए पैसे जुटाए होते हैं। वह खिलाड़ी होता है जिसे कई बार अच्छे मैदान, कोच या प्रतियोगिता तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
सवाल यह है कि मेडल आने से पहले उस खिलाड़ी के साथ कौन खड़ा होता है?
भारत में खेल व्यवस्था बदली, लेकिन चुनौतियां बाकी
भारत में पिछले कुछ वर्षों में खेलों को लेकर सोच बदली है। सरकार ने खेल प्रतिभाओं को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। Khelo India Programme जैसे अभियानों ने स्कूल, विश्वविद्यालय, ग्रामीण, आदिवासी, विंटर और पैरा स्पोर्ट्स को नई पहचान दी है। प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, उपकरण, डाइट, शिक्षा और मेडिकल सुविधाओं के लिए सहायता दी जा रही है। खेल विज्ञान, फिजियोथेरेपी और अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण के अवसर भी बढ़े हैं। आज बैडमिंटन, बॉक्सिंग, कुश्ती, शूटिंग, हॉकी, एथलेटिक्स और शतरंज जैसे खेलों में भारत की पहचान मजबूत हुई है। लेकिन बड़ी चुनौती अभी भी यही है—क्या हर प्रतिभाशाली बच्चे तक यह व्यवस्था पहुंच रही है?
गांव का खिलाड़ी कहां खो जाता है?
हर चैंपियन की शुरुआत मेडल से नहीं होती। शुरुआत होती है स्कूल की दौड़ से, गांव के मैदान से, स्थानीय प्रतियोगिता से या किसी छोटे से खेल आयोजन से। लेकिन यहीं पर कई प्रतिभाएं सिस्टम से बाहर हो जाती हैं। कई स्कूलों में अच्छे मैदान नहीं हैं। कई जगह खेलों को पढ़ाई के मुकाबले कम महत्व दिया जाता है। उपकरण उपलब्ध होने बावजूद उनका उपयोग नहीं हो पाता। कई बच्चों में प्रतिभा होती है, लेकिन उसे पहचानने वाला प्रशिक्षित कोच नहीं मिलता। भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, कमी है उसे खोजने और निखारने वाली मजबूत व्यवस्था की।
खेल आज भी महंगा सपना है
एक खिलाड़ी बनने की कीमत सिर्फ मेहनत नहीं होती।
उसे चाहिए—
- अच्छे जूते और उपकरण
- प्रशिक्षण शुल्क
- प्रतियोगिता का खर्च
- यात्रा और ठहरने का खर्च
- बेहतर पोषण
एक सामान्य परिवार के लिए हर प्रतियोगिता एक आर्थिक फैसला बन जाती है। क्या माता-पिता काम छोड़कर बच्चे के साथ जा सकते हैं? क्या यात्रा पर पैसा खर्च करना सही होगा? क्या खेल के उपकरण खरीदे जाएं या पढ़ाई पर खर्च किया जाए? कई परिवार बच्चों के सपनों के लिए बड़ा त्याग करते हैं, लेकिन कई परिवार आर्थिक मजबूरी के कारण प्रतिभा को आगे नहीं बढ़ा पाते।
खेल में भी तय करती है जगह और सुविधाएं
भारत में आज भी खिलाड़ी की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वह कहां से आता है। कुछ राज्यों ने विशेष खेलों में मजबूत पहचान बनाई है। हरियाणा कुश्ती और बॉक्सिंग के लिए जाना जाता है। ओडिशा ने हॉकी को मजबूत आधार दिया है। मणिपुर ने कई बड़े खिलाड़ी दिए हैं। लेकिन देश के कई जिलों में अभी भी अच्छे मैदान, प्रशिक्षक और नियमित प्रतियोगिताओं की कमी है। सिर्फ स्टेडियम बनाना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि वहां नियमित प्रशिक्षण हो, कोच उपलब्ध हों और खिलाड़ियों को आसानी से पहुंच मिले।
कोच ही बनाता है चैंपियन
एक अच्छा मैदान बिना अच्छे कोच के अधूरा है। कोच सिर्फ तकनीक नहीं सिखाता, बल्कि खिलाड़ी की क्षमता पहचानता है, चोट से बचाता है और मानसिक मजबूती देता है। भारत को स्कूल और जिला स्तर पर हजारों प्रशिक्षित कोचों की जरूरत है। इसके साथ ही युवा खिलाड़ियों की सुरक्षा भी जरूरी है। हर अकादमी में शिकायत व्यवस्था, पारदर्शिता और सुरक्षित माहौल होना चाहिए। क्योंकि सुरक्षित खिलाड़ी ही लंबे समय तक बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
चयन प्रक्रिया पर भरोसा जरूरी
किसी खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ा झटका तब होता है जब उसे लगता है कि उसका प्रदर्शन चयन का आधार नहीं बना।
खेलों में चयन हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन प्रक्रिया साफ होनी चाहिए।
खिलाड़ियों को पता होना चाहिए—
- चयन के नियम क्या हैं
- किन प्रतियोगिताओं को महत्व मिलेगा
- प्रदर्शन का कौन सा समय देखा जाएगा
- अपील कैसे की जा सकती है
पारदर्शिता से विवाद कम होते हैं और खिलाड़ियों का भरोसा बढ़ता है।
खेल या पढ़ाई? बच्चों पर दोहरी चुनौती
युवा खिलाड़ी अक्सर दो जिंदगी जीते हैं। सुबह अभ्यास, फिर स्कूल-कॉलेज, प्रतियोगिताएं और उसके बाद पढ़ाई का दबाव।
कई बार परीक्षा और खेल प्रतियोगिताएं एक साथ आ जाती हैं। एक खिलाड़ी को सिर्फ इसलिए शिक्षा से दूर नहीं होना चाहिए क्योंकि उसने खेल चुना है। जरूरत है ऐसी व्यवस्था की जहां खिलाड़ी पढ़ाई और खेल दोनों को साथ लेकर चल सके। क्योंकि हर खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंचता। इसलिए शिक्षा उसका सुरक्षा कवच होनी चाहिए।
जो मेडल नहीं जीतते, उनका क्या?
एक मजबूत खेल व्यवस्था सिर्फ विजेताओं के लिए नहीं होती। हजारों खिलाड़ी राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचते हैं, लेकिन चैंपियन नहीं बन पाते। उनके लिए भी करियर के रास्ते जरूरी हैं। खेल छोड़ने के बाद खिलाड़ी कोच, रेफरी, फिटनेस ट्रेनर, विश्लेषक, खेल प्रशासक और कमेंटेटर बन सकते हैं। लेकिन इसके लिए पहले से करियर मार्गदर्शन और प्रशिक्षण की जरूरत है।
क्रिकेट से सीख, लेकिन हर खेल को मौका
क्रिकेट की सफलता दिखाती है कि जब किसी खेल को मजबूत घरेलू ढांचा, पैसा, मीडिया और प्रतियोगिताएं मिलती हैं तो खिलाड़ी के लिए रास्ते खुल जाते हैं। दूसरे खेलों में भी ऐसा ढांचा बनाना होगा। लंबी अवधि की प्रतियोगिताएं, मीडिया कवरेज और स्थानीय स्तर पर लीग खेलों को मजबूत कर सकती हैं। क्योंकि जिस खिलाड़ी को लोग देखेंगे ही नहीं, उसे पहचानेंगे कैसे?
खेल सिर्फ मेडल नहीं, समाज निर्माण भी है
खेल नीति को सिर्फ ओलंपिक पदक और रैंकिंग तक सीमित नहीं किया जा सकता। खेल बच्चों में अनुशासन, आत्मविश्वास, टीम भावना और नेतृत्व क्षमता पैदा करता है। एक खेल राष्ट्र वह नहीं जहां सिर्फ कुछ खिलाड़ी मेडल जीतते हैं, बल्कि वह है जहां लाखों बच्चे खेलते हैं। इसके लिए जरूरी है—
- हर स्कूल में मैदान
- हर क्षेत्र में सुविधाएं
- लड़कियों को बराबर अवसर
- दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए बेहतर व्यवस्था
जीत से पहले की यात्रा को भी पहचानना होगा
भारत खेलों में आगे बढ़ रहा है। योजनाएं बनी हैं, सुविधाएं बढ़ी हैं और खिलाड़ियों को पहले से ज्यादा सम्मान मिल रहा है। लेकिन असली बदलाव तब होगा जब सिस्टम सिर्फ मेडल जीतने वालों के पीछे नहीं, बल्कि संघर्ष कर रहे हर खिलाड़ी के साथ खड़ा होगा। क्योंकि हर चैंपियन कभी एक सामान्य बच्चा था, जिसे सिर्फ एक मौके की जरूरत थी। मेडल कुछ मिनटों की खुशी देता है, लेकिन उस मेडल तक पहुंचने की यात्रा कई वर्षों की होती है। अगर भारत को वास्तव में खेल महाशक्ति बनना है, तो उसे जीत का जश्न मनाने के साथ-साथ संघर्ष के दिनों में भी खिलाड़ियों का हाथ थामना होगा।