भूख ने सिखाया जिंदगी का सबसे बड़ा सबक
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 साल की उम्र में निधन हो गया। 8 अक्टूबर 2026 की सुबह गोवा स्थित उनके घर पर उन्हें गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया। अस्पताल ले जाने के बाद डॉक्टरों ने करीब 45 मिनट तक उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें पुनर्जीवित नहीं किया जा सका।
नाना पाटेकर का जाना सिर्फ एक अभिनेता का जाना नहीं है। यह उस दौर के एक ऐसे कलाकार का अंत है, जिसने अपनी जिंदगी की तकलीफों को ही अपनी सबसे बड़ी अभिनय-पूंजी बना लिया था।
नाना का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। बचपन में परिवार आर्थिक संकट से गुजरा तो महज 13 साल की उम्र में उन्हें काम करना पड़ा। स्कूल के बाद वह चूना भट्टी में फिल्मों के पोस्टर रंगने जाते थे। इसके लिए उन्हें महीने के सिर्फ 35 रुपये मिलते थे और काम तक पहुंचने के लिए उन्हें करीब 8 किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था। यानी आने-जाने में करीब 16 किलोमीटर का सफर।
एक वक्त ऐसा भी था जब एक दिन में सिर्फ एक वक्त का खाना नसीब होता था। नाना खुद कह चुके थे कि भूख और अपमान ने उन्हें जिंदगी के ऐसे सबक सिखाए, जो कोई अभिनय स्कूल नहीं सिखा सकता था।
35 रुपये से शुरू हुआ सफर, बना अभिनय का साम्राज्य
नाना पाटेकर के लिए अभिनय कोई अचानक मिला हुआ मौका नहीं था। रंगमंच ने उन्हें तराशा और सिनेमा ने उन्हें पहचान दी।
1978 में फिल्म ‘गमन’ से उन्होंने फिल्मों में कदम रखा। इसके बाद ‘अंकुश’, ‘परिंदा’, ‘प्रहार’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘खामोशी’, ‘अब तक छप्पन’, ‘वेलकम’ और मराठी सिनेमा की ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों ने उनकी अलग पहचान बनाई।
उनकी सबसे बड़ी ताकत थी उनकी आवाज, आंखें, संवाद बोलने का अंदाज और किरदार में उतर जाने की क्षमता।
वह खलनायक बने तो डर पैदा किया, गंभीर किरदार निभाया तो दर्शक असहज हो गए और ‘वेलकम’ जैसी फिल्म में हास्य किया तो वही अभिनेता लोगों को हंसा भी गया।
यही वजह है कि नाना को किसी एक तरह के अभिनेता की श्रेणी में रखना मुश्किल रहा।
पर्दे से बाहर भी बेबाक, लेकिन राजनीति से दूरी
नाना पाटेकर को राजनीति में आने के कई मौके मिले। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें मुंबई उत्तर-मध्य सीट से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन नाना ने इसे स्वीकार नहीं किया।
उनका मानना था कि राजनीति उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं है।
लेकिन राजनीति से दूरी का मतलब यह नहीं था कि वह राजनीतिक लोगों से दूर थे।
नाना ने खुद कहा था कि उनके सभी दलों में दोस्त हैं। उन्होंने शरद पवार, उद्धव ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस जैसे नेताओं के साथ अपने संबंधों का जिक्र किया था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि वह किसी नेता से निजी फायदा लेने के लिए दोस्ती नहीं करते।
यही नाना की राजनीतिक पहचान थी। किसी पार्टी के नहीं, लेकिन नेताओं के दोस्त।
शरद पवार को क्यों कहते थे राजनीति का चाणक्य?
नाना पाटेकर का शरद पवार के प्रति सम्मान जगजाहिर था।
एक इंटरव्यू में उन्होंने पवार को अपना ‘हीरो’ बताते हुए उन्हें भारतीय राजनीति का ‘चाणक्य’ कहा था। नाना की नजर में पवार की सबसे बड़ी खासियत उनकी राजनीतिक समझ और बदलते समीकरणों को समझने की क्षमता थी।
नाना पाटेकर ने एक समय यह भी कहा था कि वह शरद पवार को देश का प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते थे और 1996 में उनके प्रधानमंत्री न बन पाने का उन्हें अफसोस था।
वहीं शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे से भी नाना के बेहद करीबी संबंध रहे। उन्होंने बाल ठाकरे को पिता समान बताया था। दिलचस्प बात यह थी कि ठाकरे से करीबी के बावजूद नाना ने कभी उनकी पार्टी से टिकट नहीं लिया।
अभिनेता से आगे, समाज के लिए भी काम
नाना पाटेकर की कहानी सिर्फ फिल्मों और पुरस्कारों तक सीमित नहीं थी।
किसानों और ग्रामीण समाज के मुद्दों को लेकर भी वह खुलकर बोलते थे। किसानों को सिर्फ कर्जमाफी नहीं, बल्कि सम्मान और भावनात्मक सहारे की जरूरत बताने वाले उनके बयान काफी चर्चित रहे।
उन्होंने सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाई और नाम फाउंडेशन के जरिए किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए काम किया। उनकी छवि एक ऐसे कलाकार की बनी जो पर्दे की चमक से ज्यादा जमीन की वास्तविकता को समझता था।
संपत्ति बढ़ी, लेकिन जिंदगी का अंदाज नहीं बदला
जिस अभिनेता ने कभी महीने के 35 रुपये में काम किया, उसने बाद में फिल्म इंडस्ट्री में करोड़ों कमाए। उनकी संपत्ति को लेकर अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में अलग-अलग अनुमान सामने आते रहे हैं, इसलिए 80 करोड़ रुपये का आंकड़ा निश्चित आधिकारिक संपत्ति मानना उचित नहीं होगा। हालिया रिपोर्टों में उनके मुंबई, गोवा और पुणे स्थित संपत्तियों का भी जिक्र है।
लेकिन नाना की असली विरासत उनकी संपत्ति नहीं थी।
उनकी विरासत थी उनका अभिनय।
उनकी विरासत थी उनकी आवाज।
उनकी विरासत थी उनका बेबाक अंदाज।
और सबसे बड़ी बात, उनकी विरासत थी यह विश्वास कि जिस इंसान ने जिंदगी में भूख और अपमान देखा हो, वह अगर अपनी मेहनत पर भरोसा रखे तो 35 रुपये से शुरू हुआ सफर भी इतिहास लिख सकता है।
नाना पाटेकर का जीवन एक ऐसी फिल्म की तरह था, जिसकी पटकथा किसी लेखक ने नहीं, खुद जिंदगी ने लिखी।
13 साल की उम्र में 35 रुपये कमाने वाला लड़का आगे चलकर करोड़ों दिलों का अभिनेता बना।
उन्होंने राजनीति की कुर्सी नहीं चुनी, लेकिन राजनीतिक गलियारों में उनकी दोस्ती रही। उन्होंने सत्ता का हिस्सा बनने से इनकार किया, लेकिन किसानों और आम आदमी की आवाज बनने से कभी पीछे नहीं हटे।
नाना पाटेकर चले गए, लेकिन उनके किरदार, उनकी आवाज और संघर्ष की कहानी लंबे समय तक भारतीय सिनेमा के इतिहास में जिंदा रहेगी।





