देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था में आमतौर पर चर्चा आरोपी, अपराध और मुकदमे की प्रक्रिया के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में जिस व्यक्ति पर अपराध का सबसे सीधा असर पड़ता है, वही पीड़ित कई बार व्यवस्था से दूर होता चला जाता है। पटना में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की टिप्पणी इसी लंबे समय से मौजूद एक महत्वपूर्ण सवाल को सामने लाती है।
आरोपी पर फोकस, पीड़ित पीछे
CJI सूर्यकांत ने कहा कि लंबे समय से आपराधिक न्याय प्रक्रिया का केंद्र आरोपी और अपराध रहे हैं। पीड़ित बयान दर्ज कराने के बाद अक्सर सुनवाई के दिन तक न्यायिक प्रक्रिया की सक्रिय तस्वीर से बाहर हो जाता है। यह सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का सवाल नहीं है। किसी अपराध के बाद पीड़ित या उसके परिवार को आर्थिक सहायता, चिकित्सा सुविधा, मानसिक परामर्श, कानूनी मदद, सुरक्षा और पुनर्वास जैसी कई जरूरतें हो सकती हैं। लेकिन ये सुविधाएं अलग-अलग कानूनों, विभागों और संस्थाओं में बंटी होने के कारण जरूरतमंद व्यक्ति के लिए उन तक पहुंच बनाना मुश्किल हो सकता है।
अपराध के बाद दूसरी चोट
CJI ने इस स्थिति को पीड़ित के लिए प्रक्रिया के दौरान होने वाली “दूसरी चोट” के संदर्भ में रखा। यानी अपराध से मिले आघात के बाद अगर पीड़ित को न्याय पाने के लिए ऐसी व्यवस्था से गुजरना पड़े जिसकी भाषा, प्रक्रिया और जिम्मेदारियां उसके लिए जटिल हों, तो न्याय की राह खुद एक अतिरिक्त बोझ बन सकती है। यहीं से पीड़ित-केंद्रित न्याय व्यवस्था की जरूरत सामने आती है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि आरोपी पर क्या कार्रवाई हुई, बल्कि यह भी कि पीड़ित को न्याय की प्रक्रिया के दौरान किस तरह का संरक्षण और सहयोग मिला।
एक केंद्र, एक फाइल, एक जिम्मेदारी
इसी सोच के तहत पटना में विक्टिम राइट्स सेंटर शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य पीड़ितों के लिए मुआवजा, कानूनी और चिकित्सकीय सहायता, परामर्श, सुरक्षा तथा पुनर्वास जैसी सेवाओं को एक मंच पर उपलब्ध कराना है। CJI ने इसके लिए “एक केंद्र, एक फाइल और एक जवाबदेही” की अवधारणा रखी। इसका महत्व इसलिए है क्योंकि पीड़ित को अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर लगाने के बजाय एक समन्वित व्यवस्था से सहायता मिलने की कोशिश की जा रही है।
न्याय अदालत से बाहर भी पहुंचे
कार्यक्रम में ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए हेल्पलाइन और एक बहुउद्देश्यीय वाहन भी शुरू किया गया। हेल्पलाइन का उद्देश्य उन लोगों तक पहुंच आसान करना है जिन्हें कानूनी सहायता लेने में सामाजिक या संस्थागत बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। वहीं बहुउद्देश्यीय वाहन गांवों और दूरदराज की बस्तियों तक कानूनी जागरूकता, दस्तावेजी सहायता और शुरुआती मदद पहुंचाने का माध्यम बनेगा। इसका मूल विचार यह है कि न्याय तक पहुंच केवल अदालत के दरवाजे खुलने से पूरी नहीं होती, बल्कि जरूरतमंद व्यक्ति उन दरवाजों तक पहुंच भी सके।
न्याय व्यवस्था की बदलती प्राथमिकता
इस पहल का व्यापक महत्व यही है कि आपराधिक न्याय को केवल “अपराध हुआ, आरोपी कौन है और उसे क्या सजा मिलेगी” तक सीमित रखने के बजाय पीड़ित के अधिकार और पुनर्वास को भी प्रक्रिया का हिस्सा बनाने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि किसी भी केंद्र की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पीड़ितों को सहायता कितनी तेजी से मिलती है, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय कितना प्रभावी रहता है और ग्रामीण तथा कमजोर वर्गों तक सेवाएं वास्तव में कितनी पहुंच पाती हैं। न्याय सिर्फ फैसला सुनाने का नाम नहीं है। न्याय की पूरी प्रक्रिया में उस व्यक्ति की आवाज, गरिमा, सुरक्षा और पुनर्वास भी महत्वपूर्ण हैं, जिसने अपराध का सबसे बड़ा खामियाजा भुगता है। पटना का विक्टिम राइट्स सेंटर इसी सोच को संस्थागत रूप देने की एक पहल है।





