राम मंदिर दान विवाद के बीच नई चिंता; 147 किलो वजनी स्वर्णमंडित रामचरितमानस के सार्वजनिक प्रदर्शन से हटने पर दानदाता ने मांगा जवाब, बोले—”लोग पूछ रहे हैं, क्या मेरा दान सुरक्षित है?”
राम मंदिर में दान विवाद के बीच नया सवाल
अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़े कथित अनियमितताओं के मामले की जांच के बीच अब एक और बड़ा सवाल सामने आया है। पूर्व केंद्रीय गृह सचिव एस. लक्ष्मीनारायणन ने मंदिर को दान की गई लगभग 5 करोड़ रुपये मूल्य की स्वर्णमंडित रामचरितमानस की सुरक्षा और वर्तमान स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि जिस रामचरितमानस को शुरुआत में श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए मंदिर परिसर में रखा गया था, उसे बाद में हटा दिया गया। कई बार जानकारी मांगने के बावजूद उन्हें अब तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।
5 करोड़ की रामचरितमानस आखिर है कहां?
पूर्व नौकरशाह लक्ष्मीनारायणन और उनकी पत्नी सरस्वती ने अप्रैल 2024 में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को एक विशेष रामचरितमानस भेंट की थी।
इसकी प्रमुख विशेषताएं—
- अनुमानित मूल्य 4.5 से 5 करोड़ रुपये
- कुल वजन लगभग 147 किलोग्राम
- 522 स्वर्णमंडित पृष्ठ
- सोना, चांदी और तांबे से निर्मित
- गोस्वामी तुलसीदास कृत 10,902 चौपाइयों और श्लोकों का संपूर्ण संकलन
दानदाता का कहना है कि यह केवल एक बहुमूल्य वस्तु नहीं, बल्कि उनके परिवार की दशकों पुरानी आस्था और भगवान राम के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
‘पहले दर्शन होते थे, फिर अचानक हटा दिया गया’
लक्ष्मीनारायणन का दावा है कि दान के बाद इस स्वर्ण रामचरितमानस को मंदिर परिसर में प्रदर्शित किया गया था। श्रद्धालु उसके दर्शन करते थे और नियमित रूप से उसकी पूजा भी होती थी। लेकिन कुछ महीनों बाद उसे वहां से हटा दिया गया।
उनके अनुसार—
“पहले कहा गया कि इसे गर्भगृह के पास रखा जाएगा। बाद में कहा गया कि किसी दूसरे स्थान पर रखा जाएगा। लेकिन आखिरकार वह भी नहीं हुआ और अब तक इसकी स्थिति स्पष्ट नहीं की गई।”उनका कहना है कि यह रामचरितमानस लगभग पांच महीने तक सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित रही, उसके बाद उसे हटा लिया गया।
दानदाता बोले—’अब लोग मुझसे सवाल पूछ रहे हैं’
उन्होंने कहा “जब लोग मुझसे पूछते हैं कि आपकी रामचरितमानस सुरक्षित है या नहीं, तब मेरे मन में भी चिंता पैदा होती है।”
‘मुझे प्रसिद्धि नहीं, केवल पारदर्शिता चाहिए’
पूर्व गृह सचिव का कहना है कि उन्होंने यह दान किसी प्रचार या सम्मान की इच्छा से नहीं दिया था।
उनके अनुसार उनका उद्देश्य केवल इतना है कि—
- दान की गई वस्तुओं का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक हो।
- श्रद्धालुओं को भरोसा रहे कि उनका चढ़ावा सुरक्षित है।
- मंदिर प्रबंधन पूरी पारदर्शिता के साथ काम करे।
उन्होंने कहा कि उन्होंने कई बार मंदिर प्रशासन से संपर्क कर जानकारी मांगी, लेकिन संतोषजनक उत्तर नहीं मिला।
मुख्यमंत्री से लेकर RSS प्रमुख तक पहुंचाई बात
लक्ष्मीनारायणन के अनुसार स्थानीय स्तर पर समाधान न मिलने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों और मंदिर प्रबंधन से भी संपर्क किया। उन्होंने यह भी बताया कि बाद में उनकी मुलाकात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत से भी हुई, जहां उन्होंने अपनी चिंताओं से अवगत कराया। उनका दावा है कि उन्हें आश्वासन तो मिला, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस प्रगति दिखाई नहीं दी।
ऑडिट और जवाबदेही की मांग
पूर्व नौकरशाह ने मांग की है कि—मंदिर में प्राप्त सभी दान का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए।
- बहुमूल्य वस्तुओं का सत्यापन किया जाए।
- रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाएं।
- यदि कहीं कोई अनियमितता हुई है तो जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास तभी कायम रहेगा, जब दान व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह होगी।
आस्था से जुड़ा है पूरा मामला
लक्ष्मीनारायणन का कहना है कि उनका परिवार वर्षों से राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ा रहा है। उनके अनुसार उनकी दिवंगत माता ने वर्षों तक भगवान राम का नाम लिखकर भक्ति साधना की थी और उसी भावना से उन्होंने अपनी जीवनभर की कमाई का एक हिस्सा रामलला को समर्पित किया। वे कहते हैं कि यह केवल आर्थिक दान नहीं, बल्कि उनके परिवार की आजीवन आस्था का प्रतीक है।
सबसे बड़ा सवाल
राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर चल रही जांच के बीच अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या करोड़ों रुपये मूल्य की स्वर्णमंडित रामचरितमानस सुरक्षित है और वर्तमान में कहां रखी गई है? हालांकि, इस संबंध में मंदिर ट्रस्ट की ओर से सार्वजनिक रूप से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। ऐसे में दानदाता की पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग ने इस पूरे मामले को नई चर्चा के केंद्र में ला दिया है।