जयविलास पैलेस से लेकर मुंबई के समुद्र महल और दिल्ली की संपत्तियों तक फैला है विवाद। ज्योतिरादित्य सिंधिया, वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे समेत परिवार के कई सदस्य समझौते की दिशा में आगे बढ़े। अगर सहमति बनी तो देशभर की अदालतों में लंबित एक दर्जन से अधिक मुकदमों का हो सकता है अंत।
ग्वालियर से दिल्ली तक फैली विरासत की लड़ाई अब आखिरी मोड़ पर
देश के सबसे प्रतिष्ठित और समृद्ध राजघरानों में शामिल ग्वालियर के सिंधिया राजपरिवार में वर्षों से चली आ रही विरासत की लड़ाई अब समाप्ति की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। अरबों रुपये मूल्य की ऐतिहासिक संपत्तियों, महलों, ट्रस्टों और निवेश कंपनियों पर अधिकार को लेकर दशकों से चल रहे विवाद में अब पहली बार समझौते की ठोस संभावना बनी है।
सूत्रों के अनुसार केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, मध्यप्रदेश की पूर्व मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया, नेपाल में रहने वाली ऊषा राजे राणा सहित परिवार के अन्य सदस्यों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद एक सहमति का प्रारूप तैयार हो चुका है। ग्वालियर जिला न्यायालय में समझौते की प्रक्रिया शुरू होने से संकेत मिल रहे हैं कि लंबे समय से चली आ रही कानूनी जंग अब समाप्त हो सकती है।
8 जुलाई को होने वाली सुनवाई को इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।
चार दशक पुरानी विरासत की कहानी
राजमाता विजयाराजे सिंधिया के निधन के बाद सिंधिया परिवार की विशाल संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर मतभेद सामने आने लगे थे। समय के साथ यह विवाद अदालतों तक पहुंच गया और परिवार के अलग-अलग सदस्यों ने विभिन्न संपत्तियों पर अपना दावा प्रस्तुत किया। इस दौरान कई महलों, ऐतिहासिक भवनों, ट्रस्टों, कृषि भूमि, व्यावसायिक परिसंपत्तियों और निवेश कंपनियों के स्वामित्व को लेकर अलग-अलग मुकदमे दर्ज हुए। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह देश के सबसे बड़े निजी पारिवारिक संपत्ति विवादों में गिना जाता है।
देश के कई शहरों में फैली है सिंधिया परिवार की संपत्ति
सिंधिया राजघराने की संपत्ति केवल ग्वालियर तक सीमित नहीं है। इसकी विरासत देश के कई प्रमुख शहरों तक फैली हुई है।
ग्वालियर की प्रमुख संपत्तियां
- जय विलास पैलेस
- ऊषा किरण पैलेस
- छोटी विश्रांति
- हिरण्यवन कोठी
- अन्य ऐतिहासिक भवन और राजसी परिसर
अन्य राज्यों की महत्वपूर्ण संपत्तियां
- पुणे का पद्मा विलास पैलेस
- मुंबई के समुद्र महल फ्लैट्स
- दिल्ली स्थित सिंधिया विला
- लेखा विहार
- उज्जैन का ऐतिहासिक कालियादेह पैलेस
इन संपत्तियों का वर्तमान बाजार मूल्य हजारों करोड़ रुपये आंका जाता है।
देशभर की अदालतों में चल रहे हैं मुकदमे
यह विवाद केवल एक अदालत तक सीमित नहीं है।
बताया जाता है कि—
- ग्वालियर
- दिल्ली
- मुंबई
- पुणे
की अदालतों में इस विरासत से जुड़े एक दर्जन से अधिक मुकदमे वर्षों से लंबित हैं।
हालांकि सिंधिया पारिवार में यदि किसी तरह का समझौता अदालत की मंजूरी हासिल कर लेता है तो इन सभी प्रकरणों को अदालत से वापस लेने अथवा प्रकरण समाप्त करने का रास्ता साफ हो सकता है।
‘जो जहां काबिज, वही मालिक’—क्या यही बनेगा समाधान?
पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक सबसे व्यवहारिक समाधान के रूप में एक फार्मूले पर सहमति बनती दिखाई दे रही है। इस फार्मूले के अनुसार— जो सदस्य वर्तमान में जिस संपत्ति पर काबिज है, उसी के नाम उस संपत्ति का स्वामित्व स्वीकार कर लिया जाए। कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि सभी पक्ष इस व्यवस्था को स्वीकार कर लेते हैं तो वर्षों पुराना विवाद बिना लंबी अदालती प्रक्रिया के समाप्त हो सकता है। हालांकि अभी इस फार्मूले की किसी भी पक्ष ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
जयविलास पैलेस पर सबसे अधिक नजर
करीब डेढ़ सौ साल पुराना जयविलास पैलेस सिंधिया राजघराने की पहचान माना जाता है। आज भी इसका एक बड़ा हिस्सा संग्रहालय के रूप में संचालित होता है, जबकि दूसरे हिस्से में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का परिवार निवास करता है। पूर्व मंत्री यशोधरा राजे भी ग्वालियर आने पर इसी परिसर में ठहरती रही हैं। समझौते के बाद इस ऐतिहासिक महल के स्वामित्व की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकती है।
महलों से आगे… ट्रस्ट और कंपनियां भी विवाद का हिस्सा
यह विवाद केवल भवनों तक सीमित नहीं है। सिंधिया परिवार की कई संपत्तियां विभिन्न ट्रस्टों और संस्थाओं के माध्यम से संचालित होती हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
- सर जयाजीराव ट्रस्ट
- कृष्ण माधव ट्रस्ट
इसके अलावा
सिंधिया इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड (SIPL)
जैसी व्यावसायिक संस्थाओं में हिस्सेदारी और नियंत्रण भी लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। कानूनी प्रक्रिया में इन संस्थाओं की संरचना और अधिकारों को लेकर भी कई प्रश्न उठते रहे हैं।
पन्ना का शिवलिंग भी बना चर्चा का विषय
संपत्ति बंटवारे के बीच एक धार्मिक धरोहर भी चर्चा में है। यह है राजमाता विजयाराजे सिंधिया द्वारा नियमित पूजा किया जाने वाला पन्ना (रत्न) से निर्मित शिवलिंग। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार यह फिलहाल वसुंधरा राजे के पास सुरक्षित है। चर्चा है कि प्रस्तावित समझौते में यह शिवलिंग ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंपा जा सकता है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि किसी पक्ष ने नहीं की है।
कौन-कौन हैं इस समझौते के प्रमुख पक्ष?
समझौते से जुड़े प्रमुख नाम हैं—
- ज्योतिरादित्य सिंधिया
- वसुंधरा राजे सिंधिया
- यशोधरा राजे सिंधिया
- ऊषा राजे राणा
- चित्रांगदा राजे
- कनिका देवी
- प्रतिमा देवी
- परिवार के अन्य उत्तराधिकारी
8 जुलाई की सुनवाई क्यों है महत्वपूर्ण?
ग्वालियर जिला न्यायालय में समझौते संबंधी आवेदन प्रस्तुत किया जा चुका है। अपर लोक अभियोजक धर्मेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार अब अगली सुनवाई 8 जुलाई को होगी। यदि उस दिन सभी पक्ष अपनी सहमति अदालत के समक्ष प्रस्तुत करते हैं तो समझौते की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और वर्षों से चले आ रहे मुकदमों के समाप्त होने का रास्ता खुल जाएगा।
राजनीति और विरासत—दोनों पर पड़ेगा असर
सिंधिया परिवार केवल एक राजघराना नहीं बल्कि भारतीय राजनीति का भी प्रभावशाली परिवार रहा है। राजमाता विजयाराजे सिंधिया से लेकर माधवराव सिंधिया, वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे और ज्योतिरादित्य सिंधिया तक इस परिवार ने राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में यदि पारिवारिक विवाद समाप्त होता है तो इसका संदेश केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जाएगा।
क्या खत्म होगी दशकों पुरानी खींचतान?
करीब चार दशकों से अदालतों, दस्तावेजों और दावों के बीच उलझा सिंधिया राजपरिवार का विरासत विवाद अब समाधान की दहलीज पर खड़ा नजर आ रहा है। यदि 8 जुलाई की सुनवाई में प्रस्तावित समझौते को न्यायिक स्वीकृति मिलती है तो यह केवल अरबों रुपये की संपत्तियों का बंटवारा नहीं होगा, बल्कि देश के सबसे चर्चित राजघरानों में से एक की वर्षों पुरानी पारिवारिक खींचतान का भी ऐतिहासिक अंत माना जाएगा। (प्रकाश कुमार पाण्डेय)