दो चरणों में मतदान, 4 मई को फैसला
ममता बेनर्जी ये नाम इन दिनों देश की राजनीति में जोर-शोर से चल रहा है। पश्चिम बंगाल के चुनाव हों औऱ ममता दीदी सुर्खियों में नहीं हो ऐसा कैसे हो सकता है। बंगला के चुनावों की दिलचस्प तस्वीरें फिलहाल देश की जनता के सामने हैं। जिसमें एक तरफ ममता बनर्जी हैं जो मां माटी और मानुष की बातें कर रहीं हैं तो वहीं दूसरी तरफ विश्व का सबेस बड़ा राजनैतिक दल मतलब कि बीजेपी है। सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और उनकी मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी और प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी दोनों पश्चिम बंगाल के ताज के लिए जी जान से जोर लगा रही है। इस बात ये इनकार नहीं किया जा सकता कि ममता बेनर्जी की मजबूत पकड़ के चलते बीजेपी को पश्चिम बंगाल में ज्यादा जोर लगाना पड़ रहा है।
चलिए जानते है ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर के बार में कैसे वो राजनीति में आई। पहले कांग्रेस फिर तृणमूल कांग्रेस पार्टी बनाई। कुछ समय वो एनडीए की घटक दल रही और फिर उसके बाद अब वो इंडिया गठबंधन के साथ है। अपने बेबाक अंदाज और विवादित बयानों से सुर्खियों में रहने वाली ममता बेनर्जी का जन्म कोलकता में हुआ। अपने स्कूल के दिनों से ही ममता बेनर्जीराजनीति से जुड़ गई। स्कूल के जमाने में उन्होंने सबसे पहले बंगाल में कांग्रेस पार्टी का हाथ थामा। 1970 के समय राजनीति शुरू करने वाली ममता बनर्जी 1976 से 1980 तक महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं। फिर इसके बाद वो कोलकता दक्षिण में जिला कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष रही और 1984 में उन्हें लोकसभा का सदस्य चुना गया। 1990 में पश्चिम बंगाल युवा कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं और इसके बाद 1996-97-9899 लगातार लोकसभा की सदस्य बनी और अलग अलग मंत्रालयों की सलाहाकर समिति में भी रही।
1997 में बनाई तृणमूल कांग्रेस
ममता बनर्जी ने 1997 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का साथ थोड़ दिया। यहीं से उनके और कांग्रेस के रास्ते अलग अलग हो गए। इसके बाद ममता बनर्जी ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृ्तव लाी एनडीए सरकार के साथ आ गई। एनडीए की सरकार में ममता बेनर्जी ने रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी सम्हाली । रेल मंत्री रहते हुए ममता बनर्जी ने 2002 में 2002 में, रेलमंत्री बनने के बाद, उन्होंने नई ट्रेनों का प्रस्ताव दिया, कुछ एक्सप्रेस ट्रेन सेवाओं का विस्तार किया, पर्यटन विकसित करने के उद्देश्य से कुछ ट्रेनों की आवृत्ति में वृद्धि की और भारतीय रेलवे खानपान प्रबंध और पर्यटन निगम का प्रस्ताव भी दिया। इसके अलावा उन्होंने 31 मई 2009 से 19 जुलाई 2011 तक रेलवे मंत्री के इनके दूसरे कार्यकाल के दौरान कई नान-स्टॉप टूरंटो एक्सप्रेस ट्रेनों की शुरुआत की जो प्रमुख शहरों को अन्य यात्री गाड़ियों और महिला-विशेष ट्रेनों के माध्यम से आपस में जोड़ती हैं।

पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी
साल 2011 में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी. उन्होंने इस जीत के साथ दो रिकार्ड बनाए एक तो पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री होने का और दूसरा 34 साल पुरानी कम्युनिस्ट सरकार को उखाड फेकने का। ममता बेनर्जी ने अपने करिश्माई नेतृत्व से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)की अगुवाई में 34 वर्ष पुरानी वाम मोर्चा सरकार को उखाड़कर फेंक दिया इसके बाद महिला और युवा वोटरों का मजबूत समर्थन उन्हें मिलता रहा, जिसने टीएमसी को लगातार जीत दिलाई।

सिंगूर प्रदर्शन के दौरान जनता का मिला साथ
ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगला सरकार के खिलाफ 2006-2008 के बीच जमकर प्रर्दशन किया। ये प्रर्दशन सिंगूर में किसानों की जमीन को जबरन अधिग्रहण के खिलाफ था। सरकार यहां पर टाटा का नैनो प्लांट डालना चाहती थी। लेकिन ममता बनेर्जी के प्रदर्शन के चलते ये फसैला वापस लिया गया। सिंगूर प्रदर्शन के दौरान जनता का मिला साथ ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगला सरकार के खिलाफ 2006-2008 के बीच जमकर प्रर्दशन किया। ये प्रर्दशन सिंगूर में किसानों की जमीन को जबरन अधिग्रहण के खिलाफ था। सरकार यहां पर टाटा का नैनो प्लांट डालना चाहती थी। लेकिन ममता बनेर्जी के प्रदर्शन के चलते ये फसैला वापस लिया गया। यहीं सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन यह उनके राजनैतिक जीवन का टर्निंग पॉइंट बना। “मां, माटी, मानुष” का नारा यहीं से निकला, जिसने 34 साल पुराने वामपंथी किले को ढहा दिया।

ममता के नाम कई सियासी रिकार्ड
ममता बेनर्जी के नाम कई सारे सियासी रिकार्ड हैं। वो पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री है। इसके अलावा 1984 में वो उस समय देश की सबसे कम उम्र की सांसद बनीं । ममता बेनर्जी ने जमीनी संघर्ष करके अपना राजनैतिक करियर बनाया है। 1990 के दशक में वामपंथी (Left Front) शासन के खिलाफ उनकी निडरता, लाठियां खाना और जेल जाना उन्हें जनता के करीब ले गया।ममता देश की अकेली ऐसी मुख्यमंत्री है जिनकी पहचान उनकी हवाई चप्पल और सूती साड़ी है। यह सादगी उन्हें बंगाल के आम गरीब तबके और ग्रामीण मतदाताओं से सीधा जोड़ती है। लोग उन्हें आज भी ‘दीदी’ (बड़ी बहन) मानते हैं। इन सबके अलावा ममता बेनर्जी वो देश की अकेली मुख्यमंत्री हैं जो कोई सरकारी सुविधआऐं नहीं लेती।

पश्चिम बंगाल में ममता के लिए अब बीजेपी बड़ी चुनौती
मई 2022 के चुनावों के दौरान ममता बेनर्जी दो सीटों से चुनावी मैदान में थी। जिनमें उन्हें नंदीग्राम से हार का सामना करना पड़ा और इसी चुनाव में बीजेपी प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर उभरर सामने आई। इसके बाद हालिया चुनावों में बीजेपी और ममता के बीच कड़ी टक्कर है । झगड़ा मतदाता सूची को लेकर है तो वहीं ममता लगातार मां मानुष और माटी की बात कर रही हैं।
क्या ‘खेला होगा’ का नारा चलेगा?
ममता बनर्जी का चर्चित नारा “खेला होगा” एक बार फिर चुनावी मैदान में गूंज रहा है। टीएमसी को भरोसा है कि जनता एक बार फिर उन्हें मौका देगी। वहीं बीजेपी इस बार “परिवर्तन” के नारे के साथ चुनावी मैदान में उतरी है और सत्ता परिवर्तन का दावा कर रही है।
सीटों का खेल तय करेगा सत्ता
पश्चिम बंगाल की राजनीति में अक्सर देखा गया है कि वोट शेयर और सीटों का सीधा संबंध नहीं होता। ऐसे में भले ही टीएमसी को थोड़ा बढ़त मिलती दिख रही हो, लेकिन असली तस्वीर सीटों के आंकड़ों से ही साफ होगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी वोट शेयर को सीटों में बदलने में सफल होती है या नहीं।
नतीजों पर टिकी देश की नजरें
4 मई को आने वाले नतीजों पर सिर्फ बंगाल ही नहीं, बल्कि पूरे देश की नजरें टिकी होंगी। यह चुनाव न केवल राज्य की राजनीति बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ा संदेश देगा। अब देखना यह है कि ममत बनर्जी अपनी सत्ता बचाने में कामयाब होती हैं या बीजेपी बंगाल में इतिहास रचती है।




