टूटा पुल, अटकी बारात… और गंगा किनारे ठहर गई ज़िंदगी
भागलपुर के बरारी घाट पर शाम ढल रही थी। गंगा किनारे लोगों की भीड़, नाव पकड़ने की होड़ और चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल था। इसी भीड़ में सिर पर सेहरा सजाए खड़े थे हरेराम मंडल। चेहरे पर खुशी कम और चिंता ज्यादा थी। आज उनकी शादी थी। लेकिन 12 मिनट की देरी ने उनकी पूरी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन संकट में डाल दिया था। नाव सेवा शाम पांच बजे बंद हो चुकी थी और गंगा पार किए बिना बारात आगे नहीं बढ़ सकती थी। हरेराम बार-बार प्रशासन से गुहार लगा रहे थे “बस उस पार पहुँचा दीजिए साहब… नहीं तो शादी का मुहूर्त निकल जाएगा। अगर पुल सही होता तो यह सफर सिर्फ 15 मिनट का था। लेकिन अब वही दूरी 200 किलोमीटर के लंबे चक्कर में बदल चुकी थी।
एक पुल टूटा… और पूरा इलाका ठहर गया
विक्रमशिला सेतु सिर्फ कंक्रीट और लोहे का ढांचा नहीं था। यह भागलपुर, कोसी और सीमांचल की सांसों को जोड़ने वाली लाइफलाइन था। 3 और 4 मई की रात अचानक पुल का एक हिस्सा धंस गया। देर रात स्लैब गंगा में समा गया और देखते ही देखते हजारों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी बदल गई। जो लोग हर दिन नौकरी, पढ़ाई, इलाज या व्यापार के लिए इस पुल से गुजरते थे, अब उन्हें नावों के सहारे सफर करना पड़ रहा है।
बरारी घाट बना अस्थायी शहर
बरारी घाट पर अब हर दिन मेले जैसा दृश्य दिखाई देता है। कहीं लोग मोटरसाइकिल नाव पर चढ़ा रहे हैं, कहीं महिलाएं बच्चों को संभालते हुए नाव पकड़ने की कोशिश कर रही हैं। कोई गैस सिलेंडर लेकर खड़ा है, तो कोई पलंग और अलमारी ढो रहा है। घाट पर “दीदी की रसोई” खुल चुकी है। चूड़ा, चाय, चना और सादा खाना बेचकर जीविका समूह की महिलाएं यात्रियों का सहारा बनी हुई हैं।
“जान हथेली पर रखकर नौकरी कर रहे हैं”
नवगछिया से भागलपुर रोज आने वाले मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव आर्यन मिश्रा कहते हैं “नाव में बैठते वक्त डर लगता है। कहीं पानी ज्यादा है, कहीं भीड़। लेकिन नौकरी भी करनी है। लोगों की सबसे बड़ी शिकायत सुरक्षा को लेकर है। कई नावों में लाइफ जैकेट तक नहीं हैं। मौसम खराब हो जाए तो सफर और खतरनाक हो जाता है।
बच्चों की पढ़ाई, मरीजों की दवाई सब प्रभावित
टीएनबी कॉलेज में परीक्षा देने जा रहे अभिषेक परीक्षा ही नहीं दे सके। उनका कारोबार भी प्रभावित है और पढ़ाई भी। वहीं शंभू प्रसाद अपने बीमार पिता को लेकर परेशान हैं। नाव पर मरीज को कैसे चढ़ाएं? नाव आते ही लोग दौड़ पड़ते हैं। स्कूलों में शिक्षक देर से पहुंच रहे हैं, बच्चे क्लास मिस कर रहे हैं और कई परिवार दोनों किनारों पर बंटकर रह गए हैं।
कारोबार पर पड़ा सबसे बड़ा असर
भागलपुर का बाजार अब आधा खाली नजर आने लगा है। दूध, सब्जी और फल बेचने वालों की मुश्किल सबसे ज्यादा बढ़ गई है। नाव पर सामान चढ़ाने-उतारने में घंटों लग रहे हैं। दूध फटने का डर अलग। व्यापारियों का कहना है कि अगर जल्दी समाधान नहीं हुआ तो भागलपुर का बड़ा व्यापार पूर्णिया और कटिहार की ओर शिफ्ट हो सकता है।
सवालों के घेरे में सिस्टम
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस पुल में महीनों पहले दरारों और धंसने की चेतावनी दी गई थी, उसे समय रहते ठीक क्यों नहीं किया गया? रिपोर्ट्स के मुताबिक पुल में कई तकनीकी खामियों की जानकारी पहले ही विभाग को दी गई थी। बावजूद इसके मरम्मत फाइलों और मंजूरी के बीच अटकी रही। अब राज्य सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं और पुराने पुलों का सेफ्टी ऑडिट शुरू करने की बात कही है।
गंगा के किनारे इंतजार में खड़ा बिहार
गंगा नदी के इस पार और उस पार आज हजारों लोग सिर्फ नाव का इंतजार नहीं कर रहे… वे इंतजार कर रहे हैं अपनी सामान्य जिंदगी लौटने का। किसी की बारात अटकी है। किसी की परीक्षा छूटी है। किसी का इलाज।
किसी की रोजी-रोटी। एक पुल टूटने से सिर्फ रास्ता बंद नहीं हुआ… पूरे इलाके की रफ्तार थम गई है।





