90 के दशक में वीडियोकॉन का नाम भारत के लगभग हर घर में जाना-पहचाना था। रंगीन टीवी और वॉशिंग मशीन जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामानों के साथ इस भारतीय कंपनी ने लोगों के बीच अपनी मजबूत पहचान बनाई थी। महाराष्ट्र के औरंगाबाद से शुरू हुआ यह कारोबार आगे चलकर कई देशों तक पहुंचा। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स के मजबूत कारोबार से आगे निकलकर कई जोखिम भरे क्षेत्रों में तेजी से विस्तार करना कंपनी के लिए भारी पड़ गया। बढ़ता कर्ज, कमजोर कारोबार और कई विवादों ने धीरे-धीरे वीडियोकॉन को संकट में पहुंचा दिया।
छोटे कारोबार से देश के बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रांड तक पहुंचने की कहानी
वेणुगोपाल धूत ने 1979 में वीडियोकॉन की शुरुआत की। उस दौर में भारत में विदेशी कंपनियों का दबदबा था और टीवी बाजार भी तेजी से बदल रहा था। धूत ने भारतीय ग्राहकों की जरूरत और बजट को समझते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स के कारोबार पर ध्यान दिया। धीरे-धीरे कंपनी ने टीवी और घरेलू उपकरणों के बाजार में अपनी जगह बना ली। 1990 के दशक में वीडियोकॉन का नाम भारतीय मध्यम वर्ग के बीच तेजी से लोकप्रिय हुआ और यह एक बड़े घरेलू ब्रांड के रूप में सामने आया।
इलेक्ट्रॉनिक्स से आगे बढ़ने की कोशिश में कंपनी ने कई बड़े जोखिम उठाए
2000 के दशक में वीडियोकॉन अपने कारोबार के ऊंचे दौर में था। भारत के अलावा चीन, पोलैंड, इटली और मैक्सिको में भी कंपनी के मैन्युफैक्चरिंग प्लांट थे। इसी दौरान समूह ने अपने मूल इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबार से बाहर निकलकर कई दूसरे क्षेत्रों में बड़ा निवेश शुरू कर दिया। टेलीकॉम, तेल और गैस, डीटीएच, पावर, इंश्योरेंस और रियल एस्टेट जैसे कारोबार में कंपनी ने पैसा लगाया। लेकिन इनमें से कई कारोबार उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं हुए। टेलीकॉम कारोबार को 2012 के 2जी मामले में बड़ा झटका लगा, जब सुप्रीम कोर्ट ने 122 लाइसेंस रद्द कर दिए।
बढ़ते कर्ज के साथ ICICI बैंक से जुड़े विवाद ने संकट को और गहरा कर दिया
वीडियोकॉन पर आर्थिक दबाव बढ़ता गया और कंपनी भारी कर्ज में फंस गई। इसी दौरान ICICI बैंक से जुड़े लोन विवाद ने भी कंपनी को मुश्किलों में डाल दिया। 2009 से 2012 के बीच वीडियोकॉन समूह को दिए गए बड़े कर्ज को लेकर बाद में सवाल उठे। आरोप लगाया गया कि लोन के बदले हितों के टकराव से जुड़ा फायदा दिया गया। मामले की जांच के बाद यह विवाद काफी बड़ा हो गया और 2018 में चंदा कोचर ने ICICI बैंक के सीईओ पद से इस्तीफा दिया। 2022 के अंत में चंदा कोचर, दीपक कोचर और वेणुगोपाल धूत की गिरफ्तारी भी हुई।
दिवालिया प्रक्रिया में पहुंची कंपनी, हजारों करोड़ के कर्ज ने बढ़ाई मुश्किल
वीडियोकॉन का नाम 2017 में RBI की बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टरों की सूची में भी आया। जून 2018 में NCLT ने SBI की याचिका स्वीकार करते हुए कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू की। कंपनी के खिलाफ करीब ₹64,000 से ₹65,000 करोड़ के दावे सामने आए। 2020-21 में ट्विन स्टार टेक्नोलॉजीज ने करीब ₹2,962 से ₹3,000 करोड़ में कंपनी को खरीदने का प्रस्ताव दिया। हालांकि 2022 में NCLAT ने इस मंजूरी को रद्द कर दिया।
कभी घर-घर की पहचान रही कंपनी का भविष्य अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिका
2025-26 तक वीडियोकॉन से जुड़ा दिवालिया मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है और फिलहाल यथास्थिति बनी हुई है। 2021 से कंपनी के शेयरों की ट्रेडिंग भी सस्पेंड है। वेणुगोपाल धूत ने भी वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज और वीडियोकॉन ऑयल वेंचर्स से जुड़ी अलग-अलग दिवालिया कार्यवाही को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। वीडियोकॉन की कहानी यह बताती है कि बड़ा कारोबार केवल तेजी से विस्तार करने से नहीं चलता। मजबूत मूल कारोबार के साथ कर्ज, जोखिम और नए क्षेत्रों में निवेश का संतुलन बिगड़ जाए तो कभी बाजार पर राज करने वाला ब्रांड भी गंभीर संकट में पहुंच सकता है।





