US-Iran Talks: पाकिस्तान को ट्रंप ने दिखाया ठेंगा! अमेरिका-ईरान वार्ता में बदला समीकरण, क्या मुनीर-शहबाज की कूटनीति हो गई बेअसर?

US-Iran Talks

ट्रंप के एक बयान ने बदल दी पूरी तस्वीर

अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बातचीत की संभावनाएं तेज हो गई हैं, लेकिन इस बार सबसे ज्यादा चर्चा उस नाम की है जिसका जिक्र अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नहीं किया। ट्रंप ने ईरान के साथ संभावित वार्ता में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर की भूमिका की खुलकर सराहना की, लेकिन पाकिस्तान का नाम पूरी तरह गायब रहा। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में यह सवाल उठने लगा है कि क्या पाकिस्तान अब अमेरिका-ईरान वार्ता की मुख्य मध्यस्थता से बाहर हो गया है? हाल के महीनों में पाकिस्तान खुद को इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा बताता रहा था, लेकिन ट्रंप के ताजा बयान ने इस दावे पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

जून में अहम था पाकिस्तान, अब क्यों नहीं आया नाम?

जून 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की कोशिशों के दौरान पाकिस्तान और कतर को मध्यस्थ देशों के रूप में देखा गया था। स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में हुई उच्चस्तरीय बैठक में दोनों देशों की भागीदारी की चर्चा हुई थी। उस समय परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और आगे की वार्ता का रोडमैप तैयार करने पर बातचीत हुई थी। पाकिस्तान ने भी इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश किया था।

लेकिन अब ट्रंप ने जब नई वार्ता प्रक्रिया का जिक्र किया तो उन्होंने केवल सऊदी अरब, यूएई और कतर का नाम लिया। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि मौजूदा दौर में अमेरिका की प्राथमिकता खाड़ी देशों के साथ तालमेल बढ़ाने की है। हालांकि, केवल नाम न लेने के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि पाकिस्तान पूरी तरह प्रक्रिया से बाहर हो चुका है। यह संभव है कि उसकी भूमिका सीमित हो गई हो या वह पर्दे के पीछे संपर्क बनाए हुए हो।

खाड़ी देशों की भूमिका क्यों हुई सबसे मजबूत?

सऊदी अरब, यूएई और कतर इस पूरे संकट से सीधे प्रभावित होते हैं। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि इस क्षेत्र में सैन्य टकराव बढ़ता है तो सबसे पहले खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा प्रभावित होगी।

इसी कारण इन देशों ने लगातार अमेरिका और ईरान दोनों से संयम बरतने और सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की है। ट्रंप ने भी अपने बयान में स्वीकार किया कि इन्हीं देशों ने अमेरिका को बड़े सैन्य हमले के बजाय कूटनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। यही वजह है कि वर्तमान वार्ता में इन देशों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण दिखाई दे रही है।

पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

पाकिस्तान की विदेश नीति लंबे समय से संतुलन साधने की कोशिश करती रही है। एक ओर उसकी सीमा ईरान से लगती है और दोनों देशों के बीच धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक संबंध हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान के अमेरिका, सऊदी अरब और खाड़ी देशों के साथ भी रणनीतिक रिश्ते हैं।

यही दोहरी स्थिति उसकी ताकत भी है और कमजोरी भी। यदि वह किसी एक पक्ष के ज्यादा करीब दिखाई देता है तो दूसरे पक्ष का भरोसा प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि कई विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान के लिए लंबे समय तक प्रमुख मध्यस्थ बने रहना आसान नहीं है। ट्रंप के ताजा बयान ने इस धारणा को और मजबूत किया है कि वॉशिंगटन फिलहाल उन देशों पर ज्यादा भरोसा जता रहा है जिनका इस क्षेत्र की स्थिरता से सीधा आर्थिक और सुरक्षा संबंध है।

क्या पाकिस्तान के लिए यह कूटनीतिक झटका है?

ट्रंप के बयान को पाकिस्तान के लिए एक कूटनीतिक संकेत जरूर माना जा रहा है। हाल के महीनों में इस्लामाबाद लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा था कि वह अमेरिका और ईरान के बीच संवाद कायम रखने में अहम भूमिका निभा रहा है। लेकिन जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान का उल्लेख नहीं किया तो उसकी कूटनीतिक स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हालांकि, यह भी सच है कि अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में कई बार औपचारिक और अनौपचारिक दोनों स्तरों पर अलग-अलग देशों की भूमिका होती है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान पूरी तरह बाहर हो चुका है। आने वाले दौर की वार्ताओं में यदि इस्लामाबाद फिर सक्रिय भूमिका निभाता है तो तस्वीर बदल सकती है।

अमेरिका-ईरान संबंधों में एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज है और इस बार खाड़ी देश केंद्र में दिखाई दे रहे हैं। ट्रंप के बयान ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि सऊदी अरब, यूएई और कतर फिलहाल अमेरिका की प्राथमिकता हैं। पाकिस्तान का नाम न आने से उसके प्रभाव को लेकर बहस जरूर तेज हुई है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी।

अब सबकी नजर अगले दौर की वार्ता पर रहेगी। यदि पाकिस्तान दोबारा सक्रिय भूमिका हासिल करता है तो उसकी कूटनीतिक साख बनी रह सकती है। लेकिन यदि भविष्य की बैठकों में भी उसका नाम प्रमुखता से सामने नहीं आता, तो इसे इस्लामाबाद के लिए एक बड़े कूटनीतिक झटके के रूप में देखा जाएगा। फिलहाल इतना तय है कि अमेरिका-ईरान वार्ता का नया अध्याय शुरू हो चुका है और इसमें बदलते समीकरण आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।

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