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Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act, 2026: ट्रंप का 100% टैरिफ हथियार, भारत की ‘बैकअप’ रणनीति क्या है?

DigitalDesk by DigitalDesk
September 20, 2026
in बिजनेस, मुख्य समाचार
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Trump 100% tariffs
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अमेरिका ने भारत के सामने रूस से तेल खरीदने को लेकर एक बार फिर बड़ा दबाव खड़ा कर दिया है। 18 सितंबर को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act, 2026 पर हस्ताक्षर कर दिए। इस कानून के तहत ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है। भारत और चीन इस प्रावधान से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकने वाले देशों में हैं।

लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। 100 प्रतिशत टैरिफ अभी भारत पर लगा नहीं है। कानून ने अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया है कि परिस्थितियों के आधार पर वह ऐसा टैरिफ लगा सकते हैं। साथ ही कानून में कुछ परिस्थितियों में छूट और टैरिफ लागू करने को लेकर राष्ट्रपति को व्यापक विवेकाधिकार भी दिया गया है।

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ट्रंप के हाथ में नया हथियार, निशाने पर भारत-चीन

अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से पारित कानून का घोषित मकसद रूस की ऊर्जा आय को कमजोर करना और यूक्रेन युद्ध के बीच मॉस्को पर दबाव बढ़ाना है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने इसे 262-159 के वोट से पारित किया था। इसके बाद ट्रंप ने 18 सितंबर को इस पर हस्ताक्षर किए। कानून का असर इसलिए भारत तक पहुंचता है क्योंकि भारत रूस से कच्चे तेल का बड़ा खरीदार है। यानी वॉशिंगटन के पास अब भारत के खिलाफ सिर्फ बयान या चेतावनी का विकल्प नहीं, बल्कि टैरिफ का एक कानूनी रास्ता भी मौजूद है। लेकिन टैरिफ का अधिकार मिलना और उसे भारत पर लागू कर देना दो अलग-अलग बातें हैं।

भारत के सामने असली चुनौती क्या है?

भारत के लिए मामला सिर्फ अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले सामान का नहीं है। असली चुनौती ऊर्जा सुरक्षा की है। रूस से मिलने वाला कच्चा तेल भारत की रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। यदि अचानक रूसी तेल की खरीद कम करनी पड़े और उसकी जगह दूसरे देशों से महंगा तेल खरीदना पड़े, तो इसका असर रिफाइनिंग लागत, आयात बिल और अंततः घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यही कारण है कि भारत की रणनीति केवल यह तय करने की नहीं हो सकती कि रूस से तेल खरीदना है या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत के पास पर्याप्त वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता और व्यापारिक बाजार मौजूद हैं?

भारत ने एक साथ कई दरवाजे क्यों खोले?

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने यूरोप, खाड़ी देशों, एशिया-प्रशांत और अन्य बाजारों के साथ व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को विस्तार दिया है। यूरोपीय संघ के साथ व्यापार वार्ता, ब्रिटेन के साथ आर्थिक साझेदारी, EFTA देशों के साथ समझौते, UAE के साथ ऊर्जा और निवेश सहयोग तथा फ्रांस और इटली के साथ व्यापार एवं तकनीकी संबंधों का विस्तार इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि भारत अमेरिका से दूरी बना रहा है। बल्कि तस्वीर इसके उलट है। अमेरिका भारत के लिए अभी भी एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार है। लेकिन समानांतर रूप से भारत के लिए संदेश यह है कि किसी एक बाजार या एक सप्लाई लाइन पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा कर सकती है।

100% टैरिफ की सबसे बड़ी काट क्या हो सकती है?

अगर अमेरिका वास्तव में भारत के किसी बड़े निर्यात वर्ग पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाता है, तो उसका सीधा असर अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ेगा। ऐसी स्थिति में भारत के पास कई स्तरों पर विकल्प हो सकते हैं। पहला, अमेरिका के साथ बातचीत और संभावित छूट। दूसरा, रूस के साथ ऊर्जा व्यापार की शर्तों और मात्रा में व्यावसायिक बदलाव। तीसरा, खाड़ी, अफ्रीका और अमेरिका सहित अन्य स्रोतों से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाना। चौथा, यूरोप, ब्रिटेन, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और एशिया में भारतीय उत्पादों के लिए नए बाजार तलाशना। यानी भारत की रणनीति का मूल सवाल यह बनता है कि अगर एक बड़ा बाजार महंगा हो जाए, तो क्या दूसरे बाजार तैयार हैं?

अमेरिका के सामने भी है एक पेच

इस पूरे विवाद में एक दिलचस्प पहलू अमेरिकी ऊर्जा सुरक्षा का भी है। अमेरिकी रिएक्टर ईंधन आपूर्ति में रूस की भूमिका को तेजी से कम करने की कोशिश चल रही है, लेकिन यह बदलाव तत्काल नहीं हो सकता। इसी वजह से नए कानून में कुछ सिविलियन न्यूक्लियर गतिविधियों को लेकर अपवादों की गुंजाइश भी रखी गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ऊर्जा सुरक्षा की मजबूरी सिर्फ भारत की नहीं है। अमेरिका के सामने भी ऊर्जा और आपूर्ति श्रृंखला का अपना गणित है।

भारत के लिए अगला बड़ा सवाल

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि ट्रंप ने 100 प्रतिशत टैरिफ का अधिकार क्यों लिया। सवाल यह है कि क्या और कब उस अधिकार का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया जाता है? अगर टैरिफ लगाया जाता है तो भारत-अमेरिका व्यापार पर सीधा असर पड़ेगा। अगर टैरिफ नहीं लगाया जाता या छूट दी जाती है, तो यह बातचीत और रणनीतिक दबाव के बीच समझौते का रास्ता खोल सकता है। इसलिए फिलहाल ‘100 प्रतिशत टैरिफ लग गया’ कहना सही नहीं होगा। सही तस्वीर यह है कि 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का कानूनी हथियार ट्रंप के हाथ में आ गया है।

भारत की असली तैयारी क्या है?

भारत की तैयारी को किसी एक ‘सीक्रेट प्लान’ के तौर पर देखना मुश्किल है। उपलब्ध घटनाक्रम एक व्यापक रणनीति की ओर इशारा करते हैं—ऊर्जा के लिए कई स्रोत, निर्यात के लिए कई बाजार और कूटनीति में कई साझेदार। अमेरिका भारत के लिए बड़ा बाजार है। रूस महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्तिकर्ता है। खाड़ी देश ऊर्जा और निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।

अमेरिका भारत के लिए बड़ा बाजार है। रूस महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्तिकर्ता है। खाड़ी देश ऊर्जा और निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। यूरोप बड़ा व्यापारिक बाजार है और एशिया-प्रशांत भविष्य की सप्लाई चेन में अहम भूमिका रखता है। यानी भारत के सामने चुनौती बड़ी जरूर है, लेकिन तस्वीर सिर्फ ‘ट्रंप बनाम मोदी’ की नहीं है।

यह असल में ऊर्जा सुरक्षा बनाम व्यापारिक दबाव का सवाल है। और आने वाले दिनों में सबसे ज्यादा नजर इस बात पर होगी कि ट्रंप अपने नए कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करते हैं या इसे भारत और चीन पर दबाव बनाने के लिए बातचीत के औजार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। 100 प्रतिशत टैरिफ का कानून बन चुका है, लेकिन 100 प्रतिशत टैरिफ की जंग अभी शुरू नहीं हुई है। असली कहानी अब शुरू होगी—वॉशिंगटन के अगले फैसले और नई दिल्ली के जवाब से। 

Tags: #Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act#Trump's 100% tariffs: What is #India's backup strategy?2026
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