इंदौर में राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम छात्रों के सवालों से ज्यादा मंच पर हुई एक मिमिक्री को लेकर चर्चा में आ गया है। 19 सितंबर को हुए इस कार्यक्रम में कॉमेडियन पुलकित मणि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैली और हाव-भाव की नकल की। प्रदर्शन में प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं, उनकी मां और बच्चों के साथ किए गए सिक्के वाले प्रसंग का भी संदर्भ आया। इसके बाद भाजपा नेताओं ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर निशाना साधा।
मंच पर मिमिक्री, बाहर सियासी वार
विवाद की सबसे बड़ी वजह यह बनी कि मिमिक्री राहुल गांधी की मौजूदगी वाले मंच पर हुई और राहुल गांधी उस दौरान हंसते हुए नजर आए। भाजपा नेताओं ने इसी को आधार बनाकर सवाल उठाए। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत कई भाजपा नेताओं ने प्रधानमंत्री की दिवंगत मां से जुड़े कथित आपत्तिजनक संदर्भ को लेकर राहुल गांधी की आलोचना की। यानी जिस कार्यक्रम का घोषित केंद्र छात्र और उनके मुद्दे थे, उसका एक हिस्सा अब राजनीतिक मर्यादा और मंच से हुई प्रस्तुति की बहस में बदल गया है।
राहुल गांधी ने छात्रों से क्या कहा?
मिमिक्री के विवाद से अलग कार्यक्रम का मुख्य राजनीतिक संदेश ‘सिस्टम बनाम छात्र’ के इर्द-गिर्द रहा। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मौजूदा व्यवस्था सवाल पूछने वाले छात्रों से डरती है और छात्रों के बजाय ‘अंधभक्तों’ को बढ़ावा देती है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और दूसरे प्रभावशाली लोगों को लेकर देश की व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए। छात्रों ने भी चिकित्सा शिक्षा, नर्सिंग, प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी अपनी समस्याएं राहुल गांधी के सामने रखीं। एक छात्र ने एमपीपीएससी की तैयारी के दौरान उम्र सीमा से जुड़ी समस्या बताई, जबकि नर्सिंग की छात्रा ने 2020 में प्रवेश लेने के बावजूद 2026 तक तीसरे वर्ष में होने की बात रखी।
सवाल सिर्फ मिमिक्री का नहीं, मंच के संदेश का भी
इंदौर का कार्यक्रम कांग्रेस की युवा पहुंच की एक बड़ी कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। पार्टी ने इस पहल को पारंपरिक राजनीतिक भाषण के बजाय छात्रों से सीधे संवाद, संगीत, खेल और अनौपचारिक बातचीत के जरिए आगे बढ़ाने की कोशिश की है। इससे पहले भी ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम अलग-अलग शहरों में आयोजित हो चुका है। यानी रणनीति का एक हिस्सा साफ दिखाई देता है—छात्रों की समस्याओं को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाना और युवा मतदाताओं के साथ सीधा संवाद बढ़ाना। लेकिन जैसे ही मंच पर प्रधानमंत्री की मिमिक्री या राजनीतिक कटाक्ष आता है, कार्यक्रम का फोकस छात्रों के मुद्दों से हटकर राजनीतिक टकराव पर चला जाता है।
क्या विवाद राहुल के लिए नुकसान या प्रचार का माध्यम?
इसका निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त स्वतंत्र प्रमाण नहीं हैं कि हर विवाद जानबूझकर कार्यक्रम की रणनीति का हिस्सा होता है। लेकिन राजनीतिक संचार के स्तर पर एक बात स्पष्ट है—विवादित दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से फैलते हैं और कार्यक्रम की पहुंच मूल मंच से बाहर तक बढ़ जाती है। इंदौर में भी यही हुआ। छात्रों के सवालों और राहुल गांधी के भाषण के साथ-साथ मिमिक्री का वीडियो राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा बन गया। भाजपा ने इसे मुद्दा बनाया, जबकि कांग्रेस की ओर से कार्यक्रम को छात्र संवाद के रूप में पेश किया गया।
पुणे से इंदौर तक, राहुल का ‘स्टूडेंट कनेक्ट’
राहुल गांधी की छात्र-केंद्रित मुहिम में शिक्षा, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मुद्दे लगातार प्रमुखता से उठते रहे हैं। इंदौर में भी उन्होंने इन्हीं सवालों को व्यापक राजनीतिक आरोपों के साथ जोड़ा। यही इस पूरे अभियान का सबसे अहम राजनीतिक पहलू है—छात्रों की स्थानीय समस्याओं को ‘सिस्टम’ के बड़े सवाल से जोड़ना। लेकिन इसके साथ चुनौती भी है। जब मंच पर कोई प्रस्तुति प्रधानमंत्री या किसी राजनीतिक व्यक्ति की मिमिक्री में बदलती है, तो छात्र मुद्दों की जगह राजनीतिक विवाद सुर्खियां बटोरने लगता है।
इंदौर के मंच से निकले दो अलग संदेश
इंदौर के कार्यक्रम से एक तरफ राहुल गांधी का संदेश सामने आया—छात्र सवाल पूछें, शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाएं और व्यवस्था से जवाब मांगें। दूसरी तरफ मंच की मिमिक्री ने भाजपा को राहुल गांधी पर हमला करने का मौका दिया। यानी ‘छात्रों की गूंज’ का मंच दो अलग-अलग नैरेटिव लेकर सामने आया—एक तरफ छात्रों के सवाल, दूसरी तरफ मिमिक्री का विवाद। ब इस कार्यक्रम की राजनीतिक अहमियत इसी बात से तय होगी कि आने वाले दिनों में बहस छात्रों के वास्तविक मुद्दों—शिक्षा, परीक्षा, रोजगार और भर्ती—पर टिकती है या फिर मिमिक्री और राजनीतिक बयानबाजी पर।





