मप्र में बीजेपी की सरकार दिसंबर में तीन साल पूरे करने जा रही है। 13 दिसंबर 2023 को डॉ.मोहन यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। इस दौरान बीजपी संगठन में काफी कुछ बदला और पार्टी पदाधिकारियों के बीच खुलकर विरोध भी देखने को मिला। इस असमंजस के बीच भी मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव अपने कार्यकाल के तीन साल पूरे करने जा रहे हैं। बता दें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 13 दिसंबर 2023 को शपथ ली थी, लिहाजा 13 दिसंबर 2026 को उनके कार्यकाल के तीन साल पूरे होने जा रहे हैं।
- तीन साल की सत्ता, संगठन में टकराव
- मोहन यादव के तीन साल, बीजेपी में बदलाव
- संगठन में उठापटक, सरकार ने तय किया सफर
- बीजेपी की अंदरूनी खींचतान के बीच तीन साल
- सत्ता के तीन साल, संगठन के कई सवाल
संगठन में बदलाव, पदाधिकारियों के बीच मतभेद और राजनीतिक खींचतान के बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सरकार कैसे चलाई? सत्ता और संगठन के रिश्तों ने इन तीन वर्षों में क्या रूप लिया?
- तीन साल की सत्ता, संगठन में बदलाव
- मंत्रियों और विधायकों के बीच मतभेद
- हारी हुई 60 सीटों पर बीजेपी की नजर
- 2027 के निकाय चुनाव, 2028 की तैयारी
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के तीन साल 13 दिसंबर 2026 को पूरे होंगे। इन तीन वर्षों का राजनीतिक आकलन केवल सरकार के कामकाज तक सीमित नहीं है। इसके साथ भाजपा संगठन में नेतृत्व परिवर्तन, वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद और सत्ता-संगठन के तालमेल की चुनौतियां भी चर्चा के केंद्र में रही हैं।
भाजपा ने जुलाई 2025 में अपने वरिष्ठ विधायक हेमंत खंडेलवाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। इसके बाद जून 2026 में प्रदेश कार्यकारिणी का गठन हुआ और सितंबर 2026 में संगठन प्रभारी बिप्लब कुमार देब और संगठन महामंत्री चंद्रशेखर तिवारी की नियुक्तियों के साथ संगठनात्मक समीकरणों में नए बदलाव भी सामने आए। लेकिन सवाल यह है कि संगठन में इन बदलावों के बीच सरकार और पार्टी के बीच समन्वय कितना प्रभावी रहा?
संगठन की खींचतान और सरकार की चुनौती
जी हां संगठन की खींचतान और सरकार की चुनौती की बात करें तो भाजपा के भीतर मतभेदों की खबरें केवल प्रदेश स्तर तक सीमित नहीं रहीं। अक्टूबर 2026 में इंदौर, सागर, रीवा और ग्वालियर जैसे क्षेत्रों में मंत्रियों, विधायकों और उनके समर्थकों के बीच मतभेद सामने आए। जो सोशल मीडिया की सुर्खियां बने। पार्टी नेतृत्व ने इन परिस्थितियों में समन्वय बैठकें करने की योजना भी बनाई।
दरअसल, इंदौर में जल संकट को लेकर हुई बैठक से कुछ मंत्रियों और विधायकों की दूरी, सागर में मंत्री गोविंद सिंह राजपूत और विधायक भूपेंद्र सिंह के समर्थकों के बीच विवाद के साथ रीवा में नेताओं के समर्थकों के बीच खींचतान ने पार्टी की आंतरिक चुनौतियों को उजागर किया है। ग्वालियर और अन्य क्षेत्रों में भी नेताओं के बीच मतभेद की खबरें सामने आई हैं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने नवंबर में संभागवार बैठकें करने की बात कही है। इन बैठकों में सरकार और संगठन की प्राथमिकताओं पर भी चर्चा होगी।
अब सवाल यह है कि क्या समन्वय बैठकों से नेताओं के बीच मतभेद कम होंगे और कार्यकर्ताओं तक एकजुटता का संदेश पहुंचेगा? आगामी स्थानीय चुनावों से पहले भाजपा के लिए यह तालमेल अहम माना जा रहा है।
इन घटनाक्रम से एक अहम राजनीतिक सवाल यह भी सामने आ रहा है कि क्या सरकार की प्रशासनिक प्राथमिकताओं और संगठन की राजनीतिक अपेक्षाओं के बीच पर्याप्त तालमेल बन पा रहा है? मुख्यमंत्री के सामने एक ओर विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने, विभागों की समीक्षा करने और प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर पार्टी के जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बनाए रखने की चुनौती भी है।
सत्ता और संगठन के बीच संतुलन
सत्ता और संगठन के बीच संतुलन की बात करें तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने मंत्रियों तथा संगठन के बीच समन्वय बढ़ाने के लिए अलग-अलग स्तरों पर बैठकें की हैं। मई 2026 में मंत्रियों से एक-एक कर चर्चा के दौरान उनके प्रभार वाले जिलों में संपर्क, विकास कार्यों और संगठन के साथ तालमेल की समीक्षा की गई थी। इससे साफ है कि पार्टी नेतृत्व के सामने केवल सरकार के कामकाज का आकलन नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर संगठन को सक्रिय रखने का सवाल भी है।
2027 और 2028 में असली परीक्षा
मध्यप्रदेश में 2027 में नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव होंगे, जिन पर पार्टी पदाधिकारियों की निगाहें हैं। ये चुनाव भाजपा के लिए संगठन की जमीनी ताकत, स्थानीय नेताओं के तालमेल और सरकार के कामकाज को परखने का अवसर होंगे। इसके बाद 2028 में होने वाले विधानसभा चुनाव की चुनौती सामने होगी। मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2028 में होने हैं, हालांकि भाजपा ने अभी से चुनावी तैयारियों की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। पार्टी का खास फोकस उन करीब 60 विधानसभा सीटों पर है, जहां 2023 के चुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा था। मकसद साफ है—कमजोर क्षेत्रों की राजनीतिक स्थिति समझना, जनता का रुझान जानना और संगठन की कमियों को दूर करना।
भाजपा नेतृत्व ने खास तौर पर उन विधानसभा क्षेत्रों का फीडबैक लिया, जहां कांग्रेस के विधायक हैं। इन क्षेत्रों में कांग्रेस विधायकों की सक्रियता, स्थानीय भाजपा नेताओं की भूमिका और पार्टी की भविष्य की संभावनाओं को समझने की कोशिश की गई। यह कवायद चुनाव से पहले सरकार और संगठन की जमीनी पकड़ परखने की कोशिश भी मानी जा रही है। बैठकों के आधार पर विस्तृत रिपोर्ट केंद्रीय नेतृत्व को भेजे जाने की बात सामने आई है।
वहीं जुलाई 2027 में प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव भाजपा के लिए अगली बड़ी परीक्षा होंगे। इनके नतीजे स्थानीय नेतृत्व की सक्रियता, संगठनात्मक समन्वय और सरकारी योजनाओं के असर के संकेत दे सकते हैं। कुल मिलाकर, भाजपा की रणनीति 2028 से पहले कमजोर सीटों की पहचान, कार्यकर्ताओं से बेहतर संवाद और सरकार के कामकाज की जमीनी समीक्षा पर केंद्रित दिखाई देती है। सवाल यह है कि बैठकों में सामने आने वाला फीडबैक क्या वास्तव में संगठनात्मक बदलाव और चुनावी रणनीति में दिखाई देगा?
ऐसे में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के शुरुआती तीन वर्षों का आकलन दो स्तरों पर होगा—सरकार ने विकास और प्रशासन के मोर्चे पर क्या हासिल किया और भाजपा संगठन के भीतर समन्वय की चुनौतियों से कैसे निपटा। सत्ता का संचालन और संगठन को साथ लेकर चलना, दोनों अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं। आने वाले चुनाव बताएंगे कि इन दोनों के बीच तालमेल जमीन पर कितना प्रभावी साबित होता है।