महिला आरक्षण का भविष्य: क्या मानसून सत्र में आगे बढ़ेगी बात?

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महिला आरक्षण का भविष्य: क्या मानसून सत्र में आगे बढ़ेगी बात?

और क्या देश में चल रही राजनीतिक हलचल का इससे कोई संबंध है?

जब 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम संसद से पारित हुआ, तब इसे भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक क्षण बताया गया। इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया। लेकिन कानून बनने के लगभग तीन साल बाद भी सबसे बड़ा सवाल वही है — आखिर यह लागू कब होगा?

मानसून सत्र के करीब आते ही यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। विपक्ष सरकार से लगातार यह पूछ रहा है कि जब कानून बन चुका है, तो महिलाओं को उसका लाभ कब मिलेगा। वहीं सरकार का कहना है कि संविधान में तय प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही आरक्षण लागू किया जा सकता है।

असल में महिला आरक्षण का लागू होना दो महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं से जुड़ा हुआ है — जनगणना और परिसीमन (Delimitation)। नए परिसीमन के बाद ही यह तय होगा कि कौन-कौन सी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यही कारण है कि कानून बनने के बावजूद इसका प्रभाव अभी जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है।

मानसून सत्र में संभावना है कि विपक्ष इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाए। सरकार से यह पूछा जा सकता है कि जनगणना कब होगी, परिसीमन की प्रक्रिया कब शुरू होगी और महिलाओं को आरक्षण का लाभ कब तक मिलेगा। हालांकि फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि इस सत्र में कोई नया विधेयक लाया जाएगा, क्योंकि कानूनी रूप से कानून पहले ही पारित हो चुका है। बहस का केंद्र अब इसके क्रियान्वयन की समय-सीमा होगी।

लेकिन क्या देश में चल रही राजनीतिक उठापटक का संबंध महिला आरक्षण से भी है?

सीधे तौर पर शायद नहीं। शिवसेना, एनसीपी और तृणमूल कांग्रेस में जो राजनीतिक संघर्ष देखने को मिल रहे हैं, उनके पीछे मुख्य कारण नेतृत्व, सत्ता और संगठनात्मक नियंत्रण की लड़ाई है। फिर भी राजनीतिक दलों के भीतर महिला आरक्षण को लेकर चिंताएं और रणनीतिक चर्चाएं लगातार चल रही हैं।

कारण साफ है। यदि भविष्य में लोकसभा और विधानसभा की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होती हैं, तो अनेक वर्तमान सांसदों और विधायकों की राजनीतिक जमीन बदल सकती है। कई ऐसे नेता जो वर्षों से किसी सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, अचानक यह देख सकते हैं कि उनकी सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो गई है।

यही वजह है कि लगभग सभी दल भविष्य की राजनीति का नया गणित समझने में जुटे हैं।

राजनीतिक सूत्र कुछ ऐसा बनता है:

परिसीमन + महिला आरक्षण = राजनीतिक पुनर्संतुलन

यानी सिर्फ महिलाओं की भागीदारी नहीं बढ़ेगी, बल्कि कई स्थापित नेताओं की राजनीतिक यात्रा भी नए मोड़ पर पहुंच सकती है।

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असली बदलाव महिला आरक्षण से भी ज्यादा परिसीमन के कारण आएगा। जनसंख्या में बदलाव के आधार पर कई राज्यों की सीटों की संख्या बदल सकती है। उसके बाद जब उन्हीं नई सीटों पर महिला आरक्षण लागू होगा, तो भारतीय राजनीति का पूरा नक्शा बदल सकता है।

यही कारण है कि राजनीतिक दल अभी से अपने संगठनात्मक ढांचे, संभावित उम्मीदवारों और भविष्य के नेतृत्व पर विचार कर रहे हैं। कई दल महिलाओं को अधिक प्रमुख भूमिकाओं में आगे लाने की तैयारी भी शुरू कर चुके हैं।

आने वाले महीनों में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या सरकार जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर कोई स्पष्ट रोडमैप देती है या नहीं।

फिलहाल स्थिति यह है कि कानून बन चुका है, लेकिन उसका लाभ मिलने का इंतजार जारी है।

भारतीय राजनीति में लंबे समय तक बहस इस बात पर होती रही कि महिला आरक्षण होना चाहिए या नहीं। अब बहस बदल चुकी है। सवाल यह नहीं है कि महिला आरक्षण होगा या नहीं।

सवाल यह है कि महिला आरक्षण आखिर कब होगा?

और शायद यही सवाल आने वाले मानसून सत्र की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक चर्चाओं में से एक बन सकता है।

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