संसद का मानसून सत्र और दसवीं अनुसूची, दल-बदल: जानें क्या संसद में इस बार फिर छिड़ेगी राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई?
संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है, लेकिन इस बार बहस केवल महंगाई, विदेश नीति या आर्थिक मुद्दों तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के विभाजन के बाद अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर उठ रही बगावत की खबरों ने एक बार फिर संविधान की दसवीं अनुसूची (टेंथ शेड्यूल) को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। करीब चार दशक पहले जिस कानून को राजनीतिक दल-बदल रोकने के लिए बनाया गया था, आज उसी कानून की व्याख्या को लेकर देश की राजनीति में नई लड़ाई छिड़ी हुई है।
ऐसे में सवाल तो यह भी खड़ा होता है कि आखिर कब कोई सियासी बगावत “विलय” कहलाती है और कब इस विलय को “दल-बदल” माना जाता है?
दसवीं अनुसूची को 1985 में इसलिए लागू किया गया था ताकि विधायक और सांसद व्यक्तिगत लाभ के लिए बार-बार दल न बदल सकें। उस समय राजनीतिक अस्थिरता इतनी बढ़ गई थी कि “आया राम, गया राम” भारतीय राजनीति का प्रतीक बन गया था। बाद में इस कानून में संशोधन कर एक-तिहाई सदस्यों के आधार पर विभाजन की छूट समाप्त कर दी गई और केवल दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन से होने वाले विलय को मान्यता दी गई।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति ने इस प्रावधान को नए सिरे से चर्चा में ला दिया।
सबसे पहले शिवसेना में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी बगावत हुई। इसके बाद सवाल उठा कि असली शिवसेना कौन है? उद्धव ठाकरे की या शिंदे की? मामला चुनाव आयोग, विधानसभा अध्यक्ष और अदालतों तक पहुंचा। अंततः शिंदे गुट ने संगठन और विधायकों की संख्या के आधार पर बड़ी राजनीतिक सफलता हासिल की।
इसके तुरंत बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में भी लगभग वैसा ही घटनाक्रम देखने को मिला। अजित पवार ने पार्टी के भीतर शक्ति प्रदर्शन किया और राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए। इन दोनों घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि आज की राजनीति में लड़ाई केवल चुनाव मैदान में नहीं, बल्कि संविधान की धाराओं और कानूनी व्याख्याओं के जरिए भी लड़ी जा रही है।
अब निगाहें पश्चिम बंगाल पर हैं।
तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और संभावित टूट की खबरों ने ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अगर पार्टी के भीतर कोई बड़ा समूह अलग रास्ता चुनता है, तो स्वाभाविक रूप से दसवीं अनुसूची और विलय संबंधी प्रावधानों की चर्चा फिर तेज हो जाएगी। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या बंगाल में भी महाराष्ट्र जैसी स्थिति बन सकती है।
यहीं से कानूनी और संवैधानिक बहस शुरू होती है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि केवल दो-तिहाई विधायक साथ आ जाने से मामला समाप्त नहीं हो जाता। असली प्रश्न यह है कि क्या मूल राजनीतिक दल का भी वास्तविक विलय हुआ है या केवल विधायक दल ने अपना पक्ष बदला है। शिवसेना मामले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी “मूल राजनीतिक दल” और “विधायक दल” के बीच अंतर को रेखांकित किया था। यही वह मुद्दा है जो भविष्य में और बड़े संवैधानिक विवादों को जन्म दे सकता है।
मानसून सत्र में विपक्ष संभवतः इन मामलों को जोर-शोर से उठाएगा। विपक्ष का तर्क है कि जिस कानून को राजनीतिक स्थिरता के लिए बनाया गया था, उसी का इस्तेमाल अब निर्वाचित सरकारों को अस्थिर करने या राजनीतिक समीकरण बदलने के लिए किया जा रहा है। दूसरी ओर, सत्तापक्ष का कहना है कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को अपनी राजनीतिक राय बदलने और नए गठबंधन बनाने का अधिकार होना चाहिए।
इसी बहस के बीच एक बड़ा सवाल भी उभर रहा है — क्या भारत को अब दल-बदल कानून की पुनर्समीक्षा करनी चाहिए?
कई संवैधानिक विशेषज्ञ मानते हैं कि वर्तमान व्यवस्था में खामियां हैं। विधानसभा अध्यक्ष या लोकसभा अध्यक्ष द्वारा फैसले में होने वाली देरी, विलय की अस्पष्ट परिभाषा और राजनीतिक दबाव जैसे मुद्दों को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। कुछ लोग चाहते हैं कि ऐसे मामलों का फैसला किसी स्वतंत्र न्यायाधिकरण या संवैधानिक संस्था द्वारा किया जाए।
मानसून सत्र में भले ही सरकार का ध्यान अपने विधायी एजेंडे पर हो, लेकिन शिवसेना, एनसीपी और अब तृणमूल कांग्रेस से जुड़े घटनाक्रम इस सत्र को राजनीतिक रूप से बेहद दिलचस्प बना सकते हैं।
क्योंकि यह लड़ाई केवल कुछ नेताओं या दलों की नहीं है।
यह लड़ाई इस बात की है कि भारत का लोकतंत्र राजनीतिक असहमति, बगावत और दल-बदल के बीच संतुलन कैसे बनाए। यह लड़ाई इस बात की है कि क्या अनुसूची वास्तव में राजनीतिक नैतिकता को संरक्षण दे रही है या फिर केवल और केवल राजनीति में दल-बदल के तरीके बदल गए हैं। चार दशक बाद भी यह सवाल उतना ही प्रासंगिक है जितना 1985 में था। और संभव है कि मानसून सत्र के दौरान यही बहस भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बन जाए।