मध्यप्रदेश की मोहन सरकार ने पेयजल आपूर्ति को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा है। मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की समीक्षा बैठक में स्पष्ट किया कि प्रदेश के किसी भी नागरिक को पानी की कमी का सामना नहीं करना चाहिए। गर्मी के मौसम में जल संकट की आशंका को देखते हुए सरकार ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि जहां भी जल अभाव की स्थिति बने, वहां तत्काल वैकल्पिक व्यवस्थाएं लागू की जाएं।
यह पहल केवल मौसमी संकट से निपटने तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में दीर्घकालिक जल सुरक्षा का ढांचा तैयार करने की दिशा में भी काम कर रही है। हालांकि चुनौती यह है कि मध्यप्रदेश जैसे विशाल राज्य में जल स्रोतों की भौगोलिक असमानता और भूजल पर अत्यधिक निर्भरता अभी भी बड़ी समस्या बनी हुई है।
जल जीवन मिशन की रफ्तार और सरकार का दावा
राज्य सरकार का सबसे बड़ा दावा जल जीवन मिशन को लेकर है। सरकार के अनुसार मिशन का लगभग 80 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है और मार्च 2028 से पहले हर घर नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा।
दिसंबर 2023 से अब तक 16.50 लाख से अधिक नए घरेलू नल कनेक्शन दिए जा चुके हैं। करीब 1 करोड़ 11 लाख परिवारों तक नल से जल पहुंचाने का दावा किया गया है, जबकि प्रदेश के लगभग 75 प्रतिशत परिवार इस योजना के दायरे में आ चुके हैं। 14 हजार 200 गांवों को “हर घर जल” घोषित किया जा चुका है और उज्जैन संभाग सहित 11 जिलों में मिशन का कार्य शत-प्रतिशत पूरा होने की बात कही गई है।
हालांकि जल जीवन मिशन की सफलता केवल पाइपलाइन बिछाने या कनेक्शन देने से नहीं मापी जाएगी। वास्तविक चुनौती यह होगी कि आने वाले वर्षों में इन योजनाओं का संचालन, रखरखाव और जल स्रोतों की उपलब्धता कितनी स्थायी रहती है।
केंद्र से मिलने वाले 5 हजार करोड़ और बुनियादी ढांचे पर फोकस
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने समीक्षा बैठक में बताया कि केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय से मध्यप्रदेश को जल जीवन मिशन के तहत लगभग 5 हजार करोड़ रुपये का आवंटन मिलना है। यह राशि प्रदेश में पेयजल अधोसंरचना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। राज्य सरकार अब केवल नई योजनाएं शुरू करने पर नहीं, बल्कि पहले से संचालित नल-जल योजनाओं को बिना बाधा चलाने के लिए भी तंत्र विकसित करने की बात कर रही है। इसके लिए डिजिटल मॉनिटरिंग, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, आईओटी सेंसर और ऑनलाइन जल दर्पण पोर्टल जैसे तकनीकी उपायों पर काम किया जा रहा है।
यदि इन तकनीकों का प्रभावी उपयोग होता है तो जल आपूर्ति की निगरानी और शिकायत निवारण व्यवस्था में बड़ा सुधार देखने को मिल सकता है। हालांकि सरकारी परियोजनाओं में तकनीक आधारित मॉनिटरिंग की सफलता उसके क्रियान्वयन और रखरखाव पर निर्भर करेगी।
ट्यूबवेल से आगे बढ़कर जल संरक्षण की नई सोच
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की समीक्षा बैठक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि प्रदेश केवल ट्यूबवेल आधारित जल व्यवस्था पर निर्भर नहीं रह सकता। उन्होंने विभाग को निर्देश दिए कि तालाब, सरोवर और जल संग्रहण संरचनाओं के निर्माण को प्राथमिकता दी जाए। यह सोच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्यप्रदेश के कई जिलों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। यदि जलापूर्ति का पूरा ढांचा केवल बोरवेल और ट्यूबवेल पर आधारित रहेगा तो भविष्य में जल संकट और गंभीर हो सकता है।
सरकार का मानना है कि तालाबों और जलाशयों के निर्माण से जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज और जल संग्रहण क्षमता बढ़ेगी। इससे नल-जल योजनाओं के लिए स्थायी जल स्रोत भी उपलब्ध होंगे। विशेषज्ञ भी लंबे समय से इसी मॉडल की वकालत करते रहे हैं कि जल प्रबंधन का आधार केवल दोहन नहीं बल्कि संरक्षण होना चाहिए।
बोरवेल अधिनियम और जल प्रबंधन में नया प्रयोग
मध्यप्रदेश ने बोरवेल दुर्घटनाओं को रोकने के लिए बोरवेल अधिनियम लागू किया है। सरकार का दावा है कि ऐसा कानून बनाने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य है। हाल के वर्षों में खुले और असुरक्षित बोरवेल में बच्चों के गिरने की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोरा था। इसके अलावा राज्य सरकार जल गंगा संवर्धन अभियान, जल महोत्सव, जल गुणवत्ता परीक्षण और ऑपरेटर प्रशिक्षण जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से जनभागीदारी बढ़ाने का प्रयास कर रही है। यह संकेत है कि सरकार जल प्रबंधन को केवल सरकारी योजना नहीं बल्कि सामाजिक अभियान के रूप में स्थापित करना चाहती है।
उपलब्धियां बड़ी, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
डॉ.मोहन यादव सरकार की जल नीति में अधोसंरचना विस्तार, तकनीकी नवाचार और जल संरक्षण के तीन प्रमुख आयाम दिखाई देते हैं। सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पेयजल क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब हर गांव और हर घर में सालभर नियमित और गुणवत्तापूर्ण जल आपूर्ति सुनिश्चित हो सके।
जल जीवन मिशन की समयसीमा, भूजल संरक्षण, योजनाओं का रखरखाव और जल स्रोतों की स्थिरता आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी परीक्षा होंगे। यदि सरकार पाइपलाइन विस्तार के साथ-साथ जल संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी को समान महत्व देती है, तो मध्यप्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल हो सकता है जहां पेयजल संकट के स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं।





