तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलापति विजय ने नवजात शिशुओं को सोने की अंगूठी देने का ऐलान किया है। ये अंगूठी एक ग्राम सोने की बनी होंगी और 22 कैरेट की होंगी। थलापति विजय ने कटऑफ डेट 22 जून, 2026 तय की है। 22 जून 2026 के बाद सरकारी अस्पताल में जन्म लेने वाले सभी बच्चे इस योजना के लिए योग्य होंगे। योजना 15 सितंबर 2026 से शुरू होगी। इस योजना को ‘थैमामन गोल्ड रिंग स्कीम’ का नाम दिया है। तमिल में थैमामन का अर्थ होता है मामा।
सीएम बनते ही किया था ऐलान
थलापति विजय ने सीएम बनते ही इस योजना का ऐलान किया था। माना जा रहा है कि इस योजना के जरिए सीएम थलापति विजय खुद को प्रदेश की महिलाओं का भाई और बच्चों का मामा की छवि को बनाने की कोशिश करेंगे, जिसे आने वाले समय में चुनावों के दौरान भुनाया जा सके।
सरकारें लगातार ला रही हैं लुभावनी स्कीम
ये पहला मौका नहीं है जब देश में कोई सरकार लुभावनी स्कीम ला रही हो। इससे पहले देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्री इस तरह की योजनाओं को अमली जामा पहना चुके हैं। शुरुआत मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से करें। शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना स्कीम की शुरुआत की थी। मध्यप्रदेश में ये योजना 2023 के चुनावों के समय शुरू हुई। इसके बाद देश के लगभग हर राज्य में खासकर चुनावी राज्यों में इस तरह की योजनाओं की शुरुआत हो गई। दिल्ली में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी इस तरह की स्कीम शुरू की, जिसमें हजार रुपये महीने दिए जाते थे। महिलाओं को इसे बढ़ाकर बाद में 2100 रुपये कर दिया गया था। केजरीवाल ने स्कीम शुरू करने के साथ ही खुद को दिल्ली का बेटा बताया। पंजाब में आप सरकार ने महिलाओं के लिए सम्मान राशि 3000 रुपये की शुरू की, जो जातिगत आधार पर भी बांटी गई थी, इसके अलावा हरियाणा में लाडो लक्ष्मी योजना ₹2100 प्रतिमाह दिया जाता है। बिहार में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना, जिसमें ₹10,000 पहली किस्त और बाद में ₹2 लाख तक मदद और छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन योजना, जिसमें ₹1000 प्रतिमाह दिया जाता है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल की अन्नपूर्णा योजना महिलाओं के लिए शुरू की, जिसमें हर महीने 3000 रुपये महिलाओं को दिया जाता है।
महिला सशक्तिकरण..या छवि तराशने की कोशिश
ज्यादातर राज्यों में उस तरह की योजनाओं को महिला सशक्तिकरण का नाम दिया जाता है। मजेदार बात ये है कि इस तरह की योजनाएं अब हर पार्टी की सरकार के राज में शुरू हो रही हैं और सरकार बदलने पर भी उन्हें बंद नहीं किया जा रहा है। इस तरह की योजना ये ज्यादातर छवि को तराशने की कोशिश की जाती है। फिर चाहे जनता का बेटा बनने की बात हो या फिर बच्चों का मामा। कुल मिलाकर इस तरह की योजनाएं एक तीर से कई निशाने साधने जैसी होती हैं। महिलाएं तो आर्थिक तौर पर सशक्त होती ही हैं, लेकिन इसके साथ-साथ पूरे परिवार को, परिवार के बच्चों सभी के बीच सरकार और लीडर की एक अच्छी छवि बनाने की कोशिश होती है, जो समय-समय पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भुनाई जा सके।
बुनियादी सुविधाएं जरूरी
सबसे बड़ी बात ये है कि कोई भी चुनी सरकार की जिम्मेदारी है कि वो जनता को बुनियादी सुविधाएं दें। रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं इसके लिए जरूरी हैं। लेकिन चुनावी राजनीति और छवि चमकाने की होड़ कुछ ऐसी शुरू हुई कि सशक्तिकरण के नाम पर अब मुफ्त की रेवड़ियां बांटी जा रही हैं, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी हैं।