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दिल को चुपचाप नुकसान पहुंचा रहा तनाव और सूजन! हार्ट अटैक से वर्षों पहले शुरू हो सकता है खतरा, करीब 4.80 लाख लोगों पर हुई स्टडी में खुलासा

DigitalDesk by DigitalDesk
October 22, 2026
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दिल की बीमारी का खतरा हमेशा सीने में दर्द, सांस फूलने या अचानक बेचैनी के रूप में सामने नहीं आता। कई बार शरीर के भीतर चल रही एक धीमी प्रक्रिया दिल को वर्षों तक नुकसान पहुंचाती रहती है और व्यक्ति को इसका पता भी नहीं चलता। ब्रिटेन में करीब 4 लाख 80 हजार लोगों के आंकड़ों पर आधारित एक बड़े अध्ययन में लंबे समय तक बनी रहने वाली सूजन और हृदय रोग के जोखिम के बीच संबंध सामने आया है। शोध के मुताबिक, जिन लोगों में सूजन का स्तर सबसे अधिक था, उनमें सबसे कम सूजन वाले लोगों की तुलना में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम 43 प्रतिशत अधिक पाया गया। अध्ययन में मानसिक तनाव, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और जीवनशैली जैसे कारकों का भी सूजन से संबंध सामने आया है। सवाल है कि शरीर में लगातार बनी रहने वाली यह सूजन दिल की बनावट को कैसे प्रभावित कर सकती है? और क्या समय रहते इसके संकेत पहचानकर हृदय रोग के खतरे को कम किया जा सकता है?

  • दिल को चुपचाप नुकसान पहुंचा रही सूजन

  • हार्ट अटैक का खतरा 43 प्रतिशत अधिक

  • तनाव और दिल की बीमारी का कनेक्शन

  • लक्षणों से पहले दिल में बदलाव के संकेत

  • दिल की सेहत के लिए समय रहते सावधानी

शरीर में सूजन, दिल पर असर

आमतौर पर सूजन को शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा प्रक्रिया माना जाता है। चोट लगने या संक्रमण होने पर प्रतिरक्षा प्रणाली सक्रिय होती है और शरीर को ठीक करने में मदद करती है। लेकिन जब प्रतिरक्षा प्रणाली लंबे समय तक कम स्तर पर सक्रिय बनी रहती है, तो इसे दीर्घकालिक सूजन यानी क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन कहा जाता है। ब्रिटेन के एमआरसी लेबोरेटरी ऑफ मेडिकल साइंसेज और इम्पीरियल कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं ने यूके बायोबैंक के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें रक्त में मौजूद सूजन से जुड़े संकेतक ग्लाइकोप्रोटीन एसिटाइल्स यानी ग्लाइकए के स्तर के साथ हृदय की इमेजिंग और आनुवंशिक आंकड़ों का भी अध्ययन किया गया। शोध में अधिक सूजन और हृदय की संरचना में होने वाले कुछ बदलावों के बीच संबंध पाया गया। इनमें हृदय की दीवारों का मोटा होना, हृदय के कक्षों का छोटा होना और उनमें रक्त भरने की क्षमता का प्रभावित होना शामिल था। ऐसे बदलाव समय के साथ हृदय की कार्यक्षमता पर असर डाल सकते हैं।

हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा 43 प्रतिशत अधिक

इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि सूजन का स्तर सबसे अधिक रखने वाले लोगों में सबसे कम स्तर वाले लोगों की तुलना में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम 43 प्रतिशत अधिक पाया गया। किन यहां एक बात समझना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अधिक सूजन वाले हर व्यक्ति को हार्ट अटैक आएगा या सूजन ही हर हृदय रोग का कारण है। यह आंकड़ा अध्ययन में देखे गए दो समूहों के बीच जोखिम का तुलनात्मक अंतर दर्शाता है। शोध के निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि शरीर में लंबे समय तक बनी सूजन हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं में से एक हो सकती है। हालांकि, किसी व्यक्ति का वास्तविक जोखिम उसकी उम्र, रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल, मधुमेह, धूम्रपान, पारिवारिक इतिहास और अन्य स्वास्थ्य कारकों पर भी निर्भर करता है। यानी दिल की सेहत का आकलन केवल एक सूचक या एक जांच के आधार पर नहीं किया जा सकता।

तनाव और आर्थिक परिस्थितियों का कनेक्शन

इस शोध का एक उल्लेखनीय पहलू मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि अधिक सूजन का संबंध मानसिक परेशानी, आर्थिक-सामाजिक वंचना, धूम्रपान और  शरीर में अतिरिक्त वसा जैसे कारकों से भी था। लगातार तनाव, आर्थिक असुरक्षा और प्रतिकूल सामाजिक परिस्थितियां व्यक्ति की नींद, खानपान, शारीरिक गतिविधियों और समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। ये परिस्थितियां शरीर की तनाव प्रतिक्रिया और प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी प्रक्रियाओं के साथ भी संबंध रख सकती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि तनाव या आर्थिक कठिनाई अपने आप हृदय रोग पैदा कर देती है। बल्कि अध्ययन यह समझने में मदद करता है कि जैविक प्रक्रियाएं, जीवनशैली और सामाजिक परिस्थितियां मिलकर हृदय स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं। यह पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हृदय रोग से बचाव की चर्चा में अक्सर केवल खानपान और व्यायाम पर जोर दिया जाता है, जबकि मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक परिस्थितियों की भूमिका भी ध्यान देने योग्य है।

क्या खून की जांच से पहले ही मिल सकता है संकेत?

शोधकर्ताओं ने ग्लाइकए नामक रक्त संकेतक का इस्तेमाल किया, जो शरीर में दीर्घकालिक सूजन के स्तर का आकलन करने में मदद कर सकता है। अध्ययन में आनुवंशिक जोखिम से जुड़े आंकड़ों का भी विश्लेषण किया गया। शोध में इंटरल्यूकिन-1 और टीएनएफ परिवार से जुड़े कुछ सूजनकारी प्रोटीन भी संभावित रूप से हृदय में होने वाले बदलावों से जुड़े पाए गए। इन प्रोटीनों को लक्षित करने वाली कुछ दवाओं पर पहले से अनुसंधान और चिकित्सकीय परीक्षण चल रहे हैं। भविष्य में रक्त जांच, आनुवंशिक जानकारी और हृदय की इमेजिंग को मिलाकर उन लोगों की पहचान करने में मदद मिल सकती है, जिन्हें शुरुआती स्तर पर अधिक ध्यान या हस्तक्षेप की जरूरत है। हालांकि, ग्लाइकए जांच को अभी हर व्यक्ति के लिए नियमित हृदय जांच का स्थापित विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। इस अध्ययन से यह भी साबित नहीं होता कि सूजन कम करने वाली दवाएं स्वस्थ लोगों में हार्ट अटैक को निश्चित रूप से रोक देंगी। इसके लिए अतिरिक्त शोध और चिकित्सकीय परीक्षण आवश्यक हैं।

दिल की सुरक्षा के लिए क्या करें?

शोधकर्ताओं का कहना है कि आनुवंशिक कारण किसी व्यक्ति की संवेदनशीलता को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हृदय रोग होना तय है। जीवनशैली और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों पर ध्यान देकर खतरे को कम करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इसके लिए नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित खानपान, धूम्रपान से दूरी, पर्याप्त नींद और रक्तचाप, रक्त शर्करा तथा कोलेस्ट्रॉल की निगरानी महत्वपूर्ण है। लगातार मानसिक तनाव या भावनात्मक परेशानी होने पर उचित सहायता लेना भी समग्र स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकता है। जिन लोगों को पहले से हृदय रोग, मधुमेह या उच्च रक्तचाप है, उन्हें अपने चिकित्सक की सलाह के अनुसार जांच और उपचार जारी रखना चाहिए। केवल सूजन के स्तर के आधार पर कोई दवा शुरू करना या बंद करना उचित नहीं है। सीने में दबाव या दर्द, अचानक सांस फूलना, ठंडा पसीना या स्ट्रोक के संकेत दिखाई दें, तो तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

दिल की बीमारी से पहले जोखिम को समझना जरूरी

यूरोपियन जर्नल ऑफ प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी में प्रकाशित यह अध्ययन दीर्घकालिक सूजन और हृदय स्वास्थ्य के बीच संबंध को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण जानकारी देता है। इसके निष्कर्ष बताते हैं कि दिल को स्वस्थ रखने के लिए केवल लक्षणों का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है। जीवनशैली, मानसिक स्वास्थ्य और पारंपरिक हृदय जोखिम कारकों पर समय रहते ध्यान देना भी जरूरी है। हालांकि, शोध से सामने आए संबंधों को व्यक्तिगत बीमारी की निश्चित भविष्यवाणी नहीं समझना चाहिए। भविष्य में अधिक अनुसंधान यह स्पष्ट कर सकता है कि सूजन की जांच से हृदय रोग की शुरुआती पहचान और रोकथाम को कितना बेहतर बनाया जा सकता है।

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