UCC पर NDA में बढ़ी हलचल, BJP के ‘मिशन 2029’ के सामने सहयोगियों की सहमति सबसे बड़ी चुनौती
अमित शाह के 2029 से पहले NDA शासित सभी 21 राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के बयान के बाद सियासत गर्म हो गई है। बीजेपी जहां UCC को अपने बड़े वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे के तौर पर आगे बढ़ाने की तैयारी में दिखाई दे रही है, वहीं उसके सहयोगी दलों ने इस मुद्दे पर अपनी-अपनी शर्तों और चिंताओं को सामने रखना शुरू कर दिया है। सबसे ज्यादा चर्चा बिहार की सत्ताधारी सहयोगी JDU के रुख को लेकर है।
संजय झा का अमित शाह से मिलने का समय मांगना सिर्फ एक सामान्य राजनीतिक मुलाकात नहीं माना जा रहा। इसके पीछे UCC को लेकर JDU की उस चिंता को समझा जा सकता है, जिसमें पार्टी कानून से पहले व्यापक संवाद और सहमति की मांग कर रही है। यानी NDA के भीतर सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि UCC लागू होगा या नहीं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि सहयोगियों को साथ लेकर बीजेपी किस तरह आगे बढ़ेगी?
1. शाह का बयान और सहयोगियों की चिंता
13 सितंबर को अमित शाह ने स्पष्ट संकेत दिया कि बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA के सभी 21 राज्यों में 2029 से पहले UCC लागू किया जाएगा। बीजेपी के लिए यह बयान भविष्य की राजनीतिक दिशा का संकेत है। लेकिन इसी के साथ NDA के भीतर सहयोगी दलों के लिए चुनौती भी पैदा हो गई है।
JDU का कहना है कि वह UCC पर चर्चा के खिलाफ नहीं है, लेकिन इतने संवेदनशील विषय पर फैसला व्यापक विचार-विमर्श के बाद होना चाहिए। पार्टी के नेता पुराने रुख का हवाला दे रहे हैं और कह रहे हैं कि अलग-अलग समुदायों, राज्यों और हितधारकों की चिंताओं को सुना जाना जरूरी है। यानी बीजेपी के एजेंडे और सहयोगियों की राजनीतिक जमीन के बीच सहमति का रास्ता तलाशना अब सबसे महत्वपूर्ण हो गया है।
2. JDU की आपत्ति विरोध नहीं, प्रक्रिया को लेकर
JDU के रुख को सीधे UCC के विरोध के तौर पर देखना शायद जल्दबाजी होगी। पार्टी की मुख्य आपत्ति प्रक्रिया और व्यापक सहमति को लेकर है। संजय झा की अमित शाह से संभावित मुलाकात इसी वजह से महत्वपूर्ण हो जाती है। पार्टी गृह मंत्री के सामने यह स्पष्ट करना चाहती है कि UCC का कोई अंतिम मसौदा सार्वजनिक होने से पहले ही उसके संभावित प्रभावों पर चर्चा होनी चाहिए। JDU नेता नीरज कुमार ने भी नीतीश कुमार के पुराने पत्र का हवाला देकर कहा है कि किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। यानी JDU का संदेश साफ है—UCC पर बातचीत हो, लेकिन भरोसे के साथ हो।
3. चिराग के बयान ने बढ़ाई राजनीतिक दिलचस्पी
JDU के बाद चिराग पासवान का बयान भी महत्वपूर्ण है। चिराग ने समानता और विविधता दोनों के प्रति प्रतिबद्धता जताते हुए कहा कि UCC का प्रारूप सामने आने के बाद उनकी पार्टी अपना पक्ष रखेगी। यह बयान बीजेपी के लिए एक राजनीतिक संकेत है। NDA के भीतर सहयोगी दल UCC को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहे, लेकिन वे मसौदा देखे बिना समर्थन की घोषणा करने से बच रहे हैं। यही स्थिति बीजेपी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकती है। क्योंकि सरकार के पास संख्या और राजनीतिक ताकत हो सकती है, लेकिन सहयोगियों के साथ तालमेल NDA की राजनीति की बुनियादी जरूरत है।
4. TDP पर भी टिकी निगाहें
अब नजर TDP के रुख पर भी है। अतीत में TDP की तरफ से UCC जैसे संवेदनशील विषयों पर व्यापक चर्चा और सहमति की जरूरत बताई गई है। इसलिए अगर UCC का मसौदा सामने आता है तो सिर्फ JDU ही नहीं, बल्कि NDA के दूसरे सहयोगी भी अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक आधार को ध्यान में रखकर प्रतिक्रिया दे सकते हैं। यहां बीजेपी के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाना, दूसरी तरफ गठबंधन की एकजुटता बनाए रखना। यही कारण है कि आने वाले दिनों में UCC की बहस सिर्फ कानून और संविधान तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह NDA के भीतर राजनीतिक प्रबंधन की भी बड़ी परीक्षा बनेगी।
5. उत्तराखंड मॉडल बन सकता है BJP का जवाब
बीजेपी सहयोगी दलों की आशंकाओं को दूर करने के लिए उत्तराखंड के मॉडल का उदाहरण सामने रख सकती है। उत्तराखंड में UCC लागू किया जा चुका है और बीजेपी इसे अपने प्रयोग के तौर पर पेश करती रही है। बीजेपी का तर्क हो सकता है कि UCC को केवल धार्मिक पहचान के नजरिए से नहीं, बल्कि विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत कानूनों में समानता के नजरिए से देखा जाना चाहिए। लेकिन सहयोगियों के लिए असली सवाल यही रहेगा कि प्रस्तावित राष्ट्रीय या राज्य स्तर के कानून का वास्तविक स्वरूप क्या होगा। इसलिए मसौदा सामने आना इस पूरी बहस का निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
6. असली परीक्षा 2029 से पहले सहमति की
UCC को लेकर अमित शाह ने 2029 की समयसीमा का संकेत देकर बीजेपी की राजनीतिक प्राथमिकता स्पष्ट कर दी है। अब इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सबसे अहम होगा—NDA के भीतर सहमति। JDU की संभावित शाह-संजय झा मुलाकात इसी बड़ी राजनीतिक तस्वीर का पहला महत्वपूर्ण पड़ाव हो सकती है। अगर बातचीत के जरिए सहयोगियों की चिंताओं का समाधान निकलता है तो बीजेपी UCC के मुद्दे पर तेजी से आगे बढ़ सकती है। लेकिन अगर सहयोगी दलों की आपत्तियां बढ़ती हैं तो UCC का मुद्दा NDA के भीतर ही एक बड़ा राजनीतिक विमर्श बन सकता है।
दरअसल, UCC पर मौजूदा सियासी हलचल को केवल बीजेपी बनाम विपक्ष की लड़ाई के तौर पर देखना अधूरा होगा। असली कहानी अब बीजेपी और उसके सहयोगियों के बीच सहमति बनाने की है। अमित शाह ने 2029 से पहले 21 NDA शासित राज्यों का लक्ष्य सामने रख दिया है। JDU ने संवाद की मांग कर दी है। चिराग पासवान ने मसौदा आने तक इंतजार का संकेत दिया है और TDP का पुराना रुख भी व्यापक चर्चा की जरूरत पर रहा है। यानी मिशन UCC का अगला चरण संसद या राज्यों की विधानसभा से पहले NDA की बैठक और बंद कमरे की बातचीत में तय हो सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या बीजेपी अपने ‘मिशन UCC 2029’ को सहयोगियों की सहमति के साथ आगे बढ़ा पाएगी, या UCC NDA के भीतर ही नई सियासी परीक्षा खड़ी करेगा?