वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर में शरद पूर्णिमा का पर्व विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस अवसर पर ठाकुर जी के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास किया था। इसी कारण इस पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। बांके बिहारी मंदिर की परंपराओं में इस दिन का विशेष स्थान है, क्योंकि मान्यता के अनुसार ठाकुर जी इस अवसर पर अपने हाथों में बांसुरी धारण करते हैं। श्वेत वस्त्रों और विशेष शृंगार में उनके दर्शन भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र होते हैं।
शरद पूर्णिमा पर बांके बिहारी के दर्शन क्यों हैं खास?
श्री बांके बिहारी जी को भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। मंदिर में ठाकुर जी की सेवा बाल स्वरूप की तरह की जाती है। शरद पूर्णिमा पर बांसुरी धारण करने की परंपरा इस दिन के दर्शन को और खास बनाती है। श्रद्धालु इस अवसर पर भगवान के दिव्य स्वरूप के दर्शन कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
श्वेत पोशाक, मोर मुकुट और बांसुरी से होता है विशेष शृंगार
शरद पूर्णिमा पर ठाकुर जी को श्वेत धवल पोशाक, मोर मुकुट, कटि-काछनी और सुंदर आभूषणों से सजाया जाता है। मंदिर के जगमोहन को भी फूलों और हरियाली से वन जैसा रूप दिया जाता है। ठाकुर जी को चांदी के सिंहासन पर विराजमान कर भक्तों को विशेष दर्शन दिए जाते हैं। इस दिन उनके हाथों में मुरली देखना सालभर में मिलने वाला दुर्लभ अवसर माना जाता है।
महारास की पौराणिक कथा क्या कहती है?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की चांदनी रात में भगवान श्रीकृष्ण ने वंशीवट पर बांसुरी की मधुर धुन से गोपियों को आकर्षित किया और उनके साथ दिव्य महारास रचाया। भक्त इस लीला को भगवान और उनके भक्तों के प्रेम तथा भक्ति का प्रतीक मानते हैं। बांके बिहारी मंदिर में होने वाले विशेष शृंगार और बांसुरी दर्शन को इसी दिव्य लीला की स्मृति से जोड़ा जाता है।





