सावरकर की रिहाई दया याचिका से नहीं, राजनीतिक दबाव से हुई’—राहुल गांधी मानहानि केस में पोते का बड़ा दावा
पुणे कोर्ट में सत्याकी सावरकर की गवाही; कहा- 1937 में राजनीतिक प्रयासों के चलते मिली रिहाई, राहुल गांधी पर इतिहास तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप।
राहुल गांधी बनाम सावरकर परिवार: अदालत में इतिहास पर नई बहस
स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर को लेकर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और सावरकर परिवार के बीच चल रहे मानहानि विवाद में बुधवार को पुणे की अदालत में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। सावरकर के पोते सत्याकी सावरकर ने न्यायालय में दावा किया कि उनके दादा की रिहाई ब्रिटिश सरकार को भेजी गई कथित दया याचिकाओं का परिणाम नहीं थी, बल्कि उस समय बने राजनीतिक दबाव और विभिन्न सार्वजनिक प्रयासों का नतीजा थी। यह बयान ऐसे समय आया है जब राहुल गांधी के लंदन में दिए गए भाषण को लेकर दायर आपराधिक मानहानि मामले की सुनवाई जारी है।
‘रिहाई का कारण दया याचिका नहीं, राजनीतिक अभियान था’
पुणे के न्यायिक मजिस्ट्रेट अमोल शिंदे की अदालत में गवाही देते हुए सत्याकी सावरकर ने कहा कि 1937 में सावरकर की रिहाई राजनीतिक हस्तक्षेप और जनदबाव के कारण संभव हुई। अदालत की कार्यवाही के दौरान दर्ज टिप्पणी के अनुसार, गवाह ने स्वेच्छा से कहा कि सावरकर की रिहाई दया याचिकाओं के कारण नहीं हुई, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक प्रयासों की वजह से हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि उस समय विभिन्न संगठनों और नेताओं ने उनकी रिहाई की मांग उठाई थी।
राहुल गांधी के किस बयान पर दर्ज हुआ मामला?
यह मामला मार्च 2023 में राहुल गांधी द्वारा लंदन में दिए गए एक भाषण से जुड़ा है। अपने संबोधन में राहुल गांधी ने दावा किया था कि सावरकर ने अपनी लिखी सामग्री में एक मुस्लिम व्यक्ति के साथ मारपीट की घटना का उल्लेख किया था और उसे लेकर खुशी जताई थी। सत्याकी सावरकर ने इस दावे को पूरी तरह निराधार बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना है कि सावरकर के प्रकाशित साहित्य, लेखों और उपलब्ध दस्तावेजों में ऐसी किसी घटना का उल्लेख नहीं मिलता। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने सावरकर की छवि धूमिल करने के उद्देश्य से ऐतिहासिक तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया।
मानहानि कानून के तहत कार्रवाई की मांग
सत्याकी सावरकर ने भारतीय दंड संहिता की मानहानि संबंधी धारा के तहत राहुल गांधी के खिलाफ कार्रवाई और क्षतिपूर्ति की मांग की है। फिलहाल अदालत में राहुल गांधी के अधिवक्ताओं द्वारा सत्याकी सावरकर से जिरह की जा रही है। अगली सुनवाई में बचाव पक्ष अपनी पूछताछ आगे बढ़ाएगा।
दया याचिकाओं पर क्या बोले सत्याकी?
सुनवाई के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या सावरकर ने ब्रिटिश सरकार को दया याचिकाएं भेजी थीं और राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहने का आश्वासन दिया था, तो सत्याकी सावरकर ने इस पर स्पष्ट टिप्पणी करने से परहेज किया। उन्होंने अदालत में कहा कि वह यह निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि 14 नवंबर 1913 की याचिका ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादारी का संकेत थी या उसमें अंग्रेजों के साथ सहयोग करने की इच्छा व्यक्त की गई थी। यानी उन्होंने इस विषय पर कोई अंतिम निष्कर्ष देने से इनकार किया।
कांग्रेस प्रस्ताव और रिहाई का संदर्भ भी रखा
सत्याकी सावरकर ने अपनी गवाही में यह भी कहा कि 1923 के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में उनकी रिहाई के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया गया था। उनके अनुसार उस समय सावरकर की लोकप्रियता बढ़ रही थी और जनता के बीच उनकी रिहाई की मांग तेज हो चुकी थी। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि यदि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अन्य क्रांतिकारियों के समर्थन में भी इसी प्रकार राजनीतिक पहल होती, तो संभवतः कई ऐतिहासिक घटनाओं का परिणाम अलग हो सकता था।
अदालत में सत्याकी सावरकर की जिरह अभी पूरी नहीं हुई है। मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई को होगी, जिसमें राहुल गांधी की ओर से अधिवक्ता आगे की जिरह करेंगे। यह मुकदमा केवल एक मानहानि विवाद नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास, सावरकर की भूमिका और उनके जीवन से जुड़े दस्तावेजों की व्याख्या को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इतिहास और राजनीति के बीच जारी है कानूनी लड़ाई
सावरकर को लेकर देश में लंबे समय से राजनीतिक और वैचारिक मतभेद रहे हैं। एक पक्ष उन्हें महान क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी विचारक मानता है, जबकि दूसरा उनकी कुछ ऐतिहासिक भूमिकाओं और दस्तावेजों पर सवाल उठाता रहा है।अब यह बहस अदालत तक पहुंच चुकी है, जहां कानूनी प्रक्रिया के तहत दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के समर्थन में साक्ष्य और तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं। अदालत का अंतिम निर्णय इस मामले के कानूनी पहलुओं के आधार पर होगा।





