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₹10-₹20 वाले साबुन, शैंपू और बिस्किट के पैकेट क्यों हो रहे छोटे? डाबर के CEO ने खोला राज

DigitalDesk by DigitalDesk
May 20, 2026
in बिजनेस, मुख्य समाचार
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₹10-₹20 वाले साबुन, शैंपू और बिस्किट के पैकेट क्यों हो रहे छोटे? डाबर के CEO ने खोला राज

 

कीमत वही, वजन कम: FMCG सेक्टर का नया ‘साइकोलॉजी गेम’

क्या आपको भी ऐसा महसूस हो रहा है कि गली-मोहल्ले या स्थानीय किराना दुकान से खरीदा जाने वाला ₹10 या ₹20 का बिस्किट, नमकीन, साबुन या शैंपू का पैकेट अब पहले की तुलना में हल्का या छोटा हो गया है? यदि हाँ, तो आपका यह अंदाजा बिल्कुल सटीक है। देश की दिग्गज एफएमसीजी (FMCG – फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) कंपनियां इन दिनों एक खास रणनीति के तहत काम कर रही हैं। वे अपने प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ाए बिना, चुपके से पैकेट के भीतर मौजूद सामग्री का वजन (ग्राम) कम कर रही हैं।

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इस छिपी हुई महंगाई को अर्थशास्त्र की भाषा में ‘श्रिंकफ्लेशन’ (Shrinkflation) कहा जाता है। कंपनियां सीधे तौर पर उत्पाद की कीमत में बढ़ोतरी करने से बच रही हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि ऐसा करने से उनका बड़ा कस्टमर बेस हाथ से निकल सकता है। इसका परिणाम यह है कि उपभोक्ता आज भी जेब से ₹10 का नोट ही निकाल रहा है, लेकिन उस नोट के बदले घर आने वाले सामान की मात्रा काफी घट चुकी है।

डाबर इंडिया के CEO मोहित मल्होत्रा ने किया बड़ा खुलासा

रोजमर्रा के उत्पाद बनाने वाली देश की अग्रणी कंपनी डाबर इंडिया (Dabur India) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) मोहित मल्होत्रा ने कंपनी की तिमाही बैठक में इस छिपे हुए खेल से पर्दा उठाया है। उन्होंने साफ तौर पर स्वीकार किया कि ₹10 और ₹20 वाले पैकेट्स में कंपनियां तेजी से वजन कम कर रही हैं।

मोहित मल्होत्रा के मुताबिक कंपनियां किसी भी हाल में इन ‘मैजिक प्राइस पॉइंट्स’ (Magic Price Points) को पार नहीं करना चाहती हैं। छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों के उपभोक्ता ₹10 या ₹20 के मनोवैज्ञानिक आंकड़े को छोड़कर महंगा सामान खरीदने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होते। ऐसे में ग्राहकों को नाराज किए बिना और अपनी बिक्री को बरकरार रखते हुए मुनाफे (Profit Margin) को बचाने का एकमात्र तरीका यही बचता है कि पैकेट का साइज छोटा कर दिया जाए।

आखिर क्यों बढ़ा कंपनियों पर लागत का दबाव?

एफएमसीजी कंपनियों के सामने इस समय कच्चे माल की आसमान छूती कीमतों को संभालने की बड़ी चुनौती है। इसके पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण जिम्मेदार हैं:

  • वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव: पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संकट और युद्ध के हालातों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें लगातार अस्थिर बनी हुई हैं।
  • पैकेजिंग खर्च में भारी उछाल: कच्चे तेल के महंगे होने का सीधा असर प्लास्टिक और पैकेजिंग से जुड़ी सामग्रियों पर पड़ता है। डाबर के अनुसार, कंपनियों के कुल उत्पादन खर्च का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ आकर्षक और सुरक्षित पैकेजिंग तैयार करने में चला जाता है।
  • लागत में 10% तक की वृद्धि: कंपनी के आंतरिक आकलनों के मुताबिक, कई प्रोडक्ट कैटेगरीज में इनपुट कॉस्ट (उत्पादन लागत) की महंगाई दर करीब 10% के स्तर तक पहुंच चुकी है।

इस चौतरफा दबाव के कारण कंपनियों के पास या तो सीधे दाम बढ़ाने का विकल्प था या फिर मात्रा घटाने का। डाबर ने खुद संतुलन बनाने के लिए हाल के दिनों में अपने कई चुनिंदा प्रोडक्ट्स की कीमतों में लगभग 4% तक का इजाफा भी किया है।

क्या है ‘श्रिंकफ्लेशन’ और यह कैसे काम करता है?

‘श्रिंकफ्लेशन’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘श्रिंक’ (यानी सिकुड़ना या छोटा होना) और ‘इन्फ्लेशन’ (यानी महंगाई)। जब कोई कंपनी अपने उत्पाद के मूल्य में बदलाव किए बिना उसकी मात्रा या वजन को कम कर देती है, तो उसे श्रिंकफ्लेशन कहते हैं।

श्रिंकफ्लेशन का व्यावहारिक उदाहरण:
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पहले: ₹10 का बिस्किट पैकेट  ➡️  वजन: 100 ग्राम
अब:   ₹10 का बिस्किट पैकेट  ➡️  वजन: 85-90 ग्राम
परिणाम: कीमत में 0% बदलाव, लेकिन सामग्री में 10% से 15% की कटौती!

कंपनियां इस फॉर्मूले का इस्तेमाल इसलिए धड़ल्ले से करती हैं क्योंकि उपभोक्ता का दिमाग कीमतों के प्रति बेहद संवेदनशील होता है। यदि ₹10 का बिस्किट अचानक ₹12 का हो जाए, तो ग्राहक तुरंत उसे खरीदने से मना कर सकता है या किसी दूसरे ब्रांड पर शिफ्ट हो सकता है। इसके विपरीत, पैकेट के भीतर से 10-15 ग्राम वजन कम होने पर सामान्य उपभोक्ता का ध्यान तुरंत उस बारीक बदलाव पर नहीं जाता।

ग्रामीण और अर्ध-शहरी बाजारों पर टिका है दांव

भारतीय एफएमसीजी बाजार की रीढ़ देश के गांव, कस्बे और मध्यमवर्गीय परिवार हैं। इन बाजारों में ₹5, ₹10 और ₹20 के ‘सैशे’ (Sachet) और छोटे पैकेट सबसे ज्यादा बिकते हैं। इसे कॉरपोरेट जगत में ‘लो-यूनिट प्राइस पैक’ कहा जाता है। दैनिक मजदूरी करने वाले या सीमित आय वाले परिवारों के लिए एक बार में ₹100 या ₹200 का बड़ा डिब्बा या पैकेट खरीदना मुमकिन नहीं होता। वे दैनिक आधार पर छोटे पैकेट्स पर निर्भर रहते हैं। इसी मजबूरी और मनोविज्ञान का फायदा उठाकर कंपनियां अपनी बैलेंस शीट को घाटे से बचा रही हैं।

चुनौतियां…क्या और महंगे होंगे रोजमर्रा के सामान?

बाजार विशेषज्ञों और डाबर इंडिया के बयानों से संकेत मिलते हैं कि उपभोक्ताओं को आने वाले समय में राहत मिलने के आसार कम हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में नरमी नहीं आई और पैकेजिंग लागत इसी तरह बढ़ती रही, तो आने वाले महीनों में यह संकट और गहरा सकता है।

स्थिति संभावित परिणाम
यदि पैकेजिंग लागत बढ़ती रही आगामी त्योहारों और तिमाहियों में पैकेट्स का साइज और ज्यादा छोटा किया जा सकता है।
वजन घटाने की सीमा समाप्त होने पर यदि वजन और कम करना संभव न हुआ, तो अंततः मुख्य कीमतों में 5% से 8% की सीधी बढ़ोतरी करनी होगी।

कुल मिलाकर, आम आदमी की रसोई से लेकर बाथरूम तक इस्तेमाल होने वाली आवश्यक वस्तुएं अब उसकी जेब पर अदृश्य कैंची चला रही हैं। कंपनियां भले ही इसे ‘मार्जिन मैनेजमेंट’ का नाम दें, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि उपभोक्ता को समान पैसे खर्च करने के बाद भी अब कम सामान से ही संतोष करना पड़ रहा है।

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