मध्य प्रदेश के राज्यसभा चुनाव अचानक बेहद दिलचस्प हो गए हैं। जिन तीन सीटों पर चुनाव को पहले औपचारिकता माना जा रहा था, वहां अब सियासी शह-मात का खेल शुरू हो गया है। इसकी वजह है भाजपा द्वारा तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को मैदान में उतारना। इस कदम ने कांग्रेस उम्मीदवार और राहुल गांधी की करीबी मानी जाने वाली मीनाक्षी नटराजन की राह में नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
राज्यसभा चुनाव ..क्या क्रॉस वोटिंग होगी? क्या बिगड़ेगा नटराजन का गेम…मैदान में बीजेपी का तीसरा कैंडिडेट
राज्यसभा चुनाव: क्या क्रॉस वोटिंग होगी? क्या बिगड़ेगा मीनाक्षी नटराजन का गेम? मैदान में बीजेपी का तीसरा कैंडिडेट
राजनीतिक गलियारों में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग होगी? क्या भाजपा का दांव कांग्रेस की गणित बिगाड़ देगा? और क्या एक बार फिर मध्य प्रदेश की राजनीति में ‘अंतरात्मा की आवाज’ वाला फैक्टर देखने को मिलेगा?
क्या है राज्यसभा चुनाव का पूरा गणित?
मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 230 सीटें हैं, लेकिन वर्तमान में सदन की प्रभावी संख्या 228 है। भाजपा के पास 164 विधायक हैं जबकि कांग्रेस के पास 64 विधायक हैं।
राज्यसभा चुनाव में एक सीट जीतने के लिए 58 प्रथम वरीयता वोटों की जरूरत है। इसी गणित के आधार पर अब तक माना जा रहा था कि भाजपा आसानी से दो सीटें और कांग्रेस एक सीट जीत लेगी।
भाजपा को दो सीटें जीतने के लिए 116 वोट चाहिए। इसके बाद उसके पास 48 वोट बचते हैं। वहीं कांग्रेस के पास एक सीट जीतने के लिए पर्याप्त संख्या बल मौजूद है। लेकिन भाजपा के तीसरे उम्मीदवार के उतरने से मुकाबला सीधा गणित से निकलकर राजनीतिक रणनीति के दायरे में पहुंच गया है।
कांग्रेस की चिंता क्यों बढ़ी?
कांग्रेस की सैद्धांतिक संख्या 64 विधायकों की है, लेकिन वास्तविक स्थिति थोड़ी अलग है। विजयपुर के विधायक मुकेश मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट द्वारा मतदान से रोका गया है। वहीं बीना विधायक निर्मला सप्रे लंबे समय से भाजपा के साथ खड़ी नजर आ रही हैं और उनकी सदस्यता को लेकर विवाद बना हुआ है। इसके अलावा दतिया के विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता पहले ही समाप्त हो चुकी है। ऐसे में कांग्रेस के प्रभावी वोट घटकर 62 रह जाते हैं। हालांकि यह संख्या अभी भी एक सीट जीतने के लिए पर्याप्त है, लेकिन यदि एक-दो विधायक भी क्रॉस वोटिंग कर दें या मतदान से दूरी बना लें तो तस्वीर बदल सकती है।
बीजेपी का तीसरा उम्मीदवार क्या संकेत देता है?
राजनीति में कोई भी दल बिना गणित के जोखिम नहीं उठाता। भाजपा द्वारा महेश केवट को तीसरा उम्मीदवार बनाए जाने को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है। भाजपा जानती है कि उसके पास अपने दम पर तीसरी सीट जीतने के लिए आवश्यक वोट नहीं हैं। इसके बावजूद उम्मीदवार उतारने का मतलब है कि पार्टी को या तो अतिरिक्त समर्थन मिलने की उम्मीद है या फिर उसे कांग्रेस में संभावित असंतोष और क्रॉस वोटिंग की संभावना दिखाई दे रही है।यही वजह है कि चुनाव अब संख्या बल से ज्यादा रणनीति और पार्टी अनुशासन की परीक्षा बन गया है।
मीनाक्षी नटराजन के सामने सबसे बड़ी चुनौती
कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव में पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन पर दांव लगाया है। उन्हें राहुल गांधी का करीबी माना जाता है और पार्टी नेतृत्व का पूरा समर्थन प्राप्त है। लेकिन प्रदेश कांग्रेस के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच इस चयन को लेकर असंतोष की चर्चा भी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह नाराजगी मतदान तक बनी रहती है तो भाजपा इसे अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी। ऐसे में मीनाक्षी नटराजन की जीत अब सिर्फ संख्या बल का मामला नहीं रह गई है, बल्कि कांग्रेस विधायकों की एकजुटता की भी परीक्षा बन गई है।
मध्य प्रदेश में क्रॉस वोटिंग का पुराना इतिहास
मध्य प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव और क्रॉस वोटिंग का रिश्ता नया नहीं है। सबसे बड़ा उदाहरण मार्च 2020 का है, जब राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक विधायकों के इस्तीफों ने कमलनाथ सरकार गिरा दी थी। उस घटनाक्रम ने न केवल प्रदेश की राजनीति बदल दी थी बल्कि राज्यसभा चुनाव का पूरा समीकरण भी पलट दिया था। इसी इतिहास को देखते हुए कांग्रेस इस बार किसी भी तरह की टूट-फूट या बगावत को लेकर अतिरिक्त सतर्क है।
भाजपा पहले भी खेल चुकी है ऐसा दांव
राज्यसभा चुनाव में अतिरिक्त उम्मीदवार उतारना भाजपा की पुरानी रणनीति रही है। सबसे चर्चित मामला 2017 के गुजरात राज्यसभा चुनाव का था। उस समय भाजपा ने दो सुरक्षित सीटों के अलावा तीसरे उम्मीदवार के रूप में बलवंतसिंह राजपूत को मैदान में उतारा था। मुकाबला कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल से था। भाजपा के पास पर्याप्त संख्या नहीं थी, लेकिन उसने क्रॉस वोटिंग और राजनीतिक प्रबंधन के जरिए चुनाव को बेहद रोमांचक बना दिया था। हालांकि अंत में अहमद पटेल जीत गए थे। इसके बाद राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में भी भाजपा संख्या बल से अधिक सीटों पर उम्मीदवार उतारकर विपक्ष को चुनौती देती रही है।
क्या हो सकता है आगे?
फिलहाल आंकड़े कांग्रेस के पक्ष में दिखाई देते हैं और मीनाक्षी नटराजन की जीत संभव नजर आती है। लेकिन भाजपा के तीसरे उम्मीदवार ने चुनाव को पूरी तरह खुला बना दिया है।
अब नजरें मतदान के दिन पर रहेंगी। कौन विधायक किसके साथ खड़ा रहता है, कौन अनुपस्थित रहता है और क्या कहीं क्रॉस वोटिंग होती है—यही तय करेगा कि यह चुनाव सिर्फ औपचारिकता रहेगा या फिर मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नया सियासी उलटफेर देखने को मिलेगा। एक बात तय है, भाजपा के तीसरे उम्मीदवार महेश केवट ने राज्यसभा चुनाव को सामान्य प्रक्रिया से निकालकर प्रदेश की सबसे चर्चित राजनीतिक लड़ाई बना दिया है।





