एक गांव का सरकारी स्कूल। कुछ बच्चे। कुछ स्थानीय लोग। कुछ कैमरे। और फिर बहस, धक्का-मुक्की, आरोप और राजनीति।
राजस्थान में CJP के ‘School Thik Karo’ अभियान के दौरान जो हुआ, उसने एक बहुत सीधा सवाल अचानक बहुत जटिल बना दिया है। सवाल था स्कूल की हालत कैसी है? लेकिन कुछ ही देर में सवाल बदल गया CJP को रोका किसने? हमला किसने किया? BJP का हाथ है या नहीं? स्थानीय लोग क्यों नाराज़ थे?
यानी जिस बच्चे और उसके स्कूल की बात से कहानी शुरू हुई थी, वह धीरे-धीरे पीछे छूट गया। यहीं इस पूरे विवाद को समझना जरूरी है।
स्कूल देखने गए थे, विवाद लेकर लौटे
CJP की टीम राजस्थान के एक सरकारी स्कूल की स्थिति देखने पहुंची थी। अभियान का दावा है कि वह सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं का social audit कर रही है पानी है या नहीं, toilet ठीक है या नहीं, बच्चों के बैठने की व्यवस्था कैसी है, building सुरक्षित है या नहीं। सुनने में यह काम सीधा लगता है।
लेकिन सरकारी स्कूल में जाना सिर्फ building देखने जैसा नहीं है। वहां बच्चे होते हैं। शिक्षक होते हैं। स्थानीय संवेदनशीलताएं होती हैं। और कई बार राजनीति भी बहुत जल्दी वहां पहुंच जाती है। राजस्थान में भी कुछ ऐसा ही हुआ। CJP का कहना है कि उसकी टीम के साथ बदसलूकी और मारपीट हुई, गाड़ियों को नुकसान पहुंचाया गया और उन्हें वहां से हटाया गया। CJP ने आरोप लगाया कि हमला करने वालों में BJP से जुड़े लोग शामिल थे। दूसरी तरफ BJP ने इस आरोप को नकार दिया। स्थानीय लोगों का भी अपना पक्ष है।
पूरे घटनाक्रम ने खड़े किए सवाल
इस पूरे घटनाक्रम से कई सारे सवाल खड़े हो गए ।
पहला सवाल: हमला किसने किया?
अगर किसी ने सचमुच CJP कार्यकर्ताओं पर हमला किया, तो यह गंभीर मामला है। और इस मामले पर यह फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि हमला करने वाला BJP से जुड़ा है, Congress से, किसी स्थानीय संगठन से या किसी से भी नहीं।
लेकिन CJP के लिए भी उतना ही जरूरी यह भी है कि BJP आरोप प्रमाण के साथ लगाए जाएं।
अगर CJP कहती है कि BJP से जुड़े लोगों ने हमला किया, तो नाम, पहचान, वीडियो और तथ्य सामने आने चाहिए। हर विरोध करने वाले ग्रामीण को राजनीतिक कार्यकर्ता मान लेना भी सही नहीं होगा।
दूसरा सवाल: CJP वहां गई कैसे?
यह सवाल भी उतना ही जरूरी है।
क्या CJP ने स्कूल में जाने से पहले अनुमति ली?
क्या school administration को जानकारी थी?
क्या बच्चों को record किया गया?
अगर किया गया, तो उनकी privacy कैसे बचाई गई?
Social audit का मतलब यह नहीं हो सकता कि कोई भी व्यक्ति कभी भी कैमरा लेकर किसी स्कूल में पहुंच जाए। हांलाकि यह भी नहीं हो सकता कि permission और security के नाम पर सरकारी स्कूलों को किसी भी public scrutiny से बाहर कर दिया जाए।
जरूरत अब CJP को रोकने की नहीं, स्पष्ट नियम बनाने की है।
“सरकारी स्कूल जनता के पैसे से चलता है, इसलिए जनता को अंदर जाने का हक है।” यह बात आधी सही है।
हां, जनता को सवाल पूछने का अधिकार है। लेकिन स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे भी उसी जनता का हिस्सा हैं। उनकी safety, dignity और privacy की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है।इसलिए accountability और access दोनों के बीच संतुलन चाहिए।अगर कोई social audit करना चाहता है, तो वह हो। लेकिन नियमों के साथ।अगर सरकार inspection रोकना चाहती है, तो उसे यह भी बताना होगा कि public accountability का वैकल्पिक तरीका क्या है।
तीसरा सवाल: स्कूल की हालत कैसी थी?
यही सवाल सबसे ज्यादा पूछा जाना चाहिए। क्योंकि पूरा विवाद इसी वजह से शुरू हुआ था।
अगर school building में समस्या थी, अगर बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही थी, अगर basic facilities पूरी नहीं थीं तो इसका जवाब कौन देगा? अगर CJP ने स्कूल की बदहाली की बात बढ़ा-चढ़ाकर कही, तो उसका तथ्यात्मक खंडन होना चाहिए।अगर बात सही थी, तो school administration और education department को जवाब देना चाहिए।
राजनीति इतनी जल्दी क्यों आ गई?
CJP का campaign अब सिर्फ education campaign नहीं रह गया है। उसके दौरों, उसके videos, उसके slogans और उसके राजनीतिक तेवर ने उसे सीधे mainstream political debate में ला दिया है। अब CJP सरकार से सवाल पूछ रही है। सरकार और BJP उससे सवाल पूछ रहे हैं। और यहीं एक दिलचस्प बात सामने आती है। क्या School Thik Karo केवल school reform है? या CJP इस अभियान के जरिए गांव-गांव अपनी राजनीतिक मौजूदगी भी बना रही है?
यह सवाल गलत नहीं है। अगर कोई संगठन लगातार public issues उठाता है, लोगों को जोड़ता है, स्थानीय स्तर पर volunteers खड़े करता है और सरकार को challenge करता है, तो राजनीतिक capital बनना स्वाभाविक है।
सरकार से भी कुछ कठिन सवाल हैं
अगर सरकार का कहना है कि outsiders को school में जाने से पहले permission लेनी चाहिए, तो यह बात समझ में आती है।लेकिन फिर सरकार को यह भी बताना होगा । अगर parent, citizen या local group को school की हालत खराब लगती है, तो वह शिकायत कहां करे?
कितने दिनों में जवाब मिलेगा?
इस पूरे मुद्दे पर सरकार के साथ साथ CJP से भी कठिन सवाल होना चाहिए। सरकार के साथ सवाल में क्या complaint public record बनेगी? क्या school inspection report जनता देख सकती है? अगर public accountability का कोई आसान रास्ता नहीं है, तो ऐसे campaigns बार-बार पैदा होंगे। CJP से भी कठिन सवाल होने चाहिए मसलन CJP को भी अपनी credibility बचाने के लिए जवाब देना होगा। क्या वह केवल खराब सरकारी स्कूल दिखाएगी? क्या अच्छे सरकारी स्कूल भी दिखाएगी?
क्या वह हर school का follow-up करेगी? क्या शिकायत के बाद वापस जाकर देखेगी कि सुधार हुआ या नहीं? क्या वह school staff का पक्ष भी दिखाएगी? और सबसे जरूरी
क्या उसका मकसद problem solve करना है या confrontation पैदा करना?
क्योंकि social audit तभी meaningful है जब उसके बाद solution और follow-up भी हो।
वरना वह सिर्फ viral content बनकर रह जाएगा।
बच्चे को इस लड़ाई से क्या मिला?
यह सवाल सबसे मानवीय है।मान लीजिए CJP सही साबित हो गई।या मान लीजिए BJP का पक्ष सही साबित हो गया।उससे उस बच्चे की जिंदगी में क्या बदला?क्या उसकी class सुरक्षित हुई? क्या उसे proper bench मिली? क्या teacher आया? क्या पानी मिला? क्या toilet काम करने लगा?
अगर नहीं, तो पूरी बहस अधूरी है। असल जीत किसकी होनी चाहिए? इस मामले में तीन चीजें एक साथ संभव हैं। CJP से नियम तोड़ने पर सवाल हो सकते हैं।,सरकार से transparency पर सवाल हो सकते हैं।
और हिंसा करने वालों पर कार्रवाई भी हो सकती है। लेकिन इन सबके बीच school का मुद्दा गायब नहीं होना चाहिए।क्योंकि आखिर में यह CJP बनाम BJP की कहानी नहीं है। यह उस बच्चे की कहानी है जो अगली सुबह फिर उसी स्कूल में जाएगा। उसके लिए politics नहीं, classroom महत्वपूर्ण है।
इसलिए इस पूरे विवाद का सबसे जरूरी सवाल वही है जिससे कहानी शुरू हुई थी स्कूल ठीक है या नहीं?
बाकी राजनीति बाद में होती रहेगी।





