दिल्ली में 12 अक्टूबर 2026 को INDIA ब्लॉक के सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च के दौरान महिला पत्रकार ऋचा पराशर के साथ कथित धक्का-मुक्की का मामला राजनीतिक विवाद से आगे बढ़कर कानूनी चर्चा का विषय बन गया है। पत्रकार ने आरोप लगाया कि मार्च के दौरान राहुल गांधी ने उनका हाथ पकड़कर खींचा और इसके बाद हुई धक्का-मुक्की में वह सीढ़ियों पर गिर गईं। उन्होंने बताया कि वह तीन महीने की गर्भवती हैं और उन्हें अस्पताल में उपचार लेना पड़ा। दूसरी ओर, कांग्रेस नेताओं ने आरोपों को खारिज किया है और घटना के वीडियो को लेकर सवाल उठाए हैं। 15 अक्टूबर की रिपोर्टों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने 12 अक्टूबर के मार्च से संबंधित याचिकाओं पर राहुल गांधी और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए हैं। हालांकि, नोटिस जारी होना किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च के दौरान क्या हुआ और गर्भवती पत्रकार ने क्या आरोप लगाए?
12 अक्टूबर को विपक्षी दलों के नेता चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुद्दों को लेकर मार्च करते हुए सुप्रीम कोर्ट की ओर पहुंचे थे। इसी दौरान वनइंडिया से जुड़ी पत्रकार ऋचा पराशर ने आरोप लगाया कि वह राहुल गांधी से प्रतिक्रिया लेने के लिए उनके पास गई थीं। उनके अनुसार, कथित तौर पर उनका हाथ खींचा गया और सुरक्षाकर्मियों की धक्का-मुक्की के बीच वह सीढ़ियों पर गिर गईं। पत्रकार ने चोट लगने और फोन तथा माइक को नुकसान पहुंचने की बात भी कही। उन्होंने मीडिया को बताया कि वह गर्भावस्था के शुरुआती चरण में हैं। इन आरोपों की पुष्टि और घटना के पूरे क्रम का निर्धारण जांच तथा उपलब्ध वीडियो और अन्य साक्ष्यों के आधार पर होना बाकी है।
कांग्रेस ने आरोपों को नकारा, वीडियो की स्पष्टता पर भी उठे सवाल
पत्रकार के आरोप सामने आने के बाद भाजपा नेताओं ने राहुल गांधी पर निशाना साधा और मामले में जवाबदेही की मांग की। दूसरी ओर, कांग्रेस नेताओं ने आरोपों को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक प्रचार बताया। कांग्रेस पक्ष का कहना है कि उपलब्ध वीडियो में कथित धक्का देने की घटना स्पष्ट रूप से साबित नहीं होती। इस तरह मामले में दो अलग-अलग दावे सामने हैं—पत्रकार की शिकायत और कांग्रेस का खंडन। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज, वीडियो की प्रमाणिकता, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और मेडिकल रिकॉर्ड जैसे साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच महत्वपूर्ण होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने मार्च से जुड़ी याचिकाओं पर नोटिस जारी किया, लेकिन दोष तय नहीं किया
15 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने 12 अक्टूबर के मार्च से संबंधित याचिकाओं पर केंद्र सरकार, कांग्रेस और राहुल गांधी सहित अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए। याचिकाओं में अदालतों के आसपास राजनीतिक प्रदर्शनों के लिए नियम बनाने, परिसर की सुरक्षा और घटना से संबंधित सीसीटीवी व डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं ने कुछ नेताओं के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही पर भी विचार करने का अनुरोध किया है। अदालत का नोटिस संबंधित पक्षों से जवाब मांगने की प्रक्रिया है; इसे राहुल गांधी के खिलाफ अपराध सिद्ध होने या उन्हें दोषी घोषित किए जाने के रूप में नहीं देखा जा सकता।
कानून के तहत राहुल गांधी पर मुकदमा बन सकता है या नहीं, यह किन तथ्यों पर निर्भर करेगा?
कानून के अनुसार, यदि जांच में किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर चोट पहुंचाने, आपराधिक बल का इस्तेमाल करने या अन्य दंडनीय कृत्य के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो परिस्थितियों के मुताबिक प्राथमिकी और आपराधिक कार्यवाही का रास्ता खुल सकता है। लेकिन केवल आरोप लगने से किसी के खिलाफ अपराध साबित नहीं होता। पुलिस को शिकायत, उपलब्ध वीडियो, गवाहों और अन्य साक्ष्यों की जांच करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट में मार्च को लेकर दायर याचिका में अवमानना की मांग भी अलग कानूनी प्रश्न है; अदालत के आदेशों या न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोपों का मूल्यांकन उसके अपने कानूनी मानकों पर होगा। इस समय उपलब्ध जानकारी के आधार पर राहुल गांधी को दोषी कहना उचित नहीं होगा।
जांच में आरोप सही साबित हुए तो क्या कार्रवाई हो सकती है और राहुल गांधी की मुश्किलें कितनी बढ़ेंगी?
यदि सक्षम जांच में कथित धक्का-मुक्की और चोट पहुंचाने के आरोपों की पुष्टि होती है, तो घटना के तथ्यों और लागू कानून के अनुसार पुलिस कार्रवाई, आरोपपत्र और अदालत में मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। दूसरी ओर, यदि पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलते, तो आरोपों पर कार्रवाई का आधार कमजोर पड़ सकता है। राहुल गांधी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने के लिए यह भी देखना होगा कि उन्होंने स्वयं क्या किया और दूसरे लोगों की भूमिका क्या थी। सुप्रीम कोर्ट की ओर से नोटिस जारी होने और साक्ष्य सुरक्षित रखने की बात इस मामले को गंभीरता से देखने का संकेत है, लेकिन इससे अपने आप गिरफ्तारी या सजा तय नहीं होती। अंतिम निर्णय जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।





