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रामायण में कव्वाली? ‘मंगल रंग’ के संगीत पर सवाल, आस्था और सिनेमाई स्वतंत्रता के बीच बहस…

DigitalDesk by DigitalDesk
October 29, 2026
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Qawwali in the Ramayana Questions raised over the music of Mangal Rang a debate between faith and cinematic freedom
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रणबीर कपूर की ‘रामायण’ के विवाह गीत पर विवाद का केंद्र सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि धार्मिक प्रस्तुति की प्रामाणिकता, लोक परंपराओं और फिल्मकारों की जिम्मेदारी भी है। सवाल यह है कि क्या किसी धार्मिक महाकाव्य पर आधारित फिल्म में आधुनिक संगीत शैलियों का इस्तेमाल रचनात्मक स्वतंत्रता है, या इससे उस युग की सांस्कृतिक छवि को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है? फिल्म के गीत ‘मंगल रंग’ को लेकर सोशल मीडिया पर ऐसी ही बहस छिड़ने का दावा किया जा रहा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, कुछ दर्शकों को गीत में कव्वाली और सूफी संगीत की झलक महसूस हुई है। उनका सवाल है कि भगवान राम और माता सीता के विवाह जैसे पवित्र प्रसंग को प्रस्तुत करते समय संगीत की शैली और सांस्कृतिक संदर्भों का कितना ध्यान रखा जाना चाहिए। यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा। किसी गीत का कव्वाली जैसा सुनाई देना और उसका वास्तव में कव्वाली शैली में रचा जाना दो अलग बातें हैं। इसी तरह, संगीत की किसी शैली से समानता अपने आप में धार्मिक अपमान का प्रमाण नहीं बनती। विवाद को समझने के लिए गीत की वास्तविक संगीत संरचना, फिल्मकारों की मंशा और धार्मिक प्रसंग की प्रस्तुति—तीनों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

  • रामायण में आधुनिक संगीत का प्रयोग रचनात्मक स्वतंत्रता या सांस्कृतिक चूक?

  • क्या धार्मिक फिल्मों में परंपराओं का प्रमाणिक चित्रण अनिवार्य होना चाहिए?

  • कव्वाली जैसी धुन सुनाई देना क्या धार्मिक अपमान का प्रमाण है?

  • ‘चुमावन’ और हल्दी के विवाद पर निर्माताओं को स्पष्टीकरण देना चाहिए?

  • धार्मिक आस्था, दर्शकों की अपेक्षाएं और फिल्मकारों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बने?

त्रेतायुग में कव्वाली? ‘मंगल रंग’ पर विवाद के 5 बड़े सवाल

1. राम-सीता विवाह गीत में कव्वाली के सुर क्यों?

फिल्म ‘रामायण’ का गीत ‘मंगल रंग’ 25 अक्टूबर को जारी हुआ। इसे ए.आर. रहमान ने संगीतबद्ध किया है, जबकि अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल ने आवाज दी है। गीत के बोल कुमार विश्वास ने लिखे हैं। इसमें रणबीर कपूर भगवान राम और साई पल्लवी माता सीता की भूमिका में नजर आते हैं। गीत राम-सीता के विवाह से लेकर उनके वैवाहिक जीवन और वनवास तक के प्रसंगों को समेटता है।

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गीत सामने आते ही सोशल मीडिया पर इसके संगीत को लेकर सवाल उठने लगे। कुछ श्रोताओं ने इसके समूह गायन, मुखड़े और संगीत संयोजन में कव्वाली जैसी झलक होने की बात कही। कुछ ने इसकी तुलना रहमान के पुराने गीत ‘कुन फाया कुन’ और तमिल गीत ‘एन्ना सोल्ला पोगिराई’ से भी की। वहीं, दूसरे श्रोताओं ने इस तुलना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई प्रतिक्रिया बताया। यानी विवाद केवल धार्मिक भावनाओं का नहीं, संगीत की मौलिकता और उसकी उपयुक्तता का भी है।

2. त्रेतायुग में कव्वाली थी या नहीं?

यही इस पूरे विवाद का सबसे चर्चित सवाल है। कव्वाली को सामान्यतः सूफी परंपरा से जुड़ी संगीत शैली माना जाता है। दूसरी ओर, रामायण की कथा त्रेतायुग की धार्मिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में स्थापित है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। आज किसी गीत में सुनाई देने वाली संगीत शैली को सीधे प्राचीन काल की वास्तविक संगीत परंपरा का प्रमाण नहीं माना जा सकता। फिल्मों में संगीतकार आधुनिक वाद्ययंत्रों, अलग-अलग गायन शैलियों और पारंपरिक धुनों का मिश्रण करके रचना तैयार करते हैं। इसलिए असली प्रश्न यह नहीं कि आज के संगीत की कोई शैली प्राचीन काल में बिल्कुल इसी रूप में मौजूद थी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उसका इस्तेमाल रामायण जैसे धार्मिक महाकाव्य के भाव, परिवेश और चरित्रों के अनुरूप किया गया है? आलोचकों को लगता है कि विवाह जैसे पवित्र प्रसंग में अधिक पारंपरिक भारतीय संगीत शैली अपनाई जा सकती थी। दूसरी ओर, संगीत में भारतीय शास्त्रीय परंपरा, लोकधुनों और अलग-अलग गायन शैलियों के मेल को भी रचनात्मक प्रयोग के रूप में देखा जा सकता है।

संगीत की शैली पर सवाल उठाना दर्शकों का अधिकार है, लेकिन केवल शैली के आधार पर किसी रचना को धार्मिक अपमान घोषित कर देना अलग बात है।

3. क्या मनोज मुंतशिर वाला विवाद दोहराया जा रहा है?

रामायण पर आधारित फिल्मों में संवाद, संगीत, वेशभूषा और पात्रों के चित्रण को लेकर दर्शकों की अपेक्षाएं सामान्य फिल्मों से अलग होती हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि रामायण करोड़ों लोगों के लिए केवल कथा नहीं, बल्कि आस्था, आदर्श और सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है।

फिल्म ‘आदिपुरुष’ के समय भी संवादों और पात्रों के चित्रण को लेकर बड़ा विवाद हुआ था। उस अनुभव के बाद रामायण पर बनने वाली नई फिल्मों के प्रति दर्शकों की संवेदनशीलता और सतर्कता बढ़ना स्वाभाविक है। ‘मंगल रंग’ को लेकर भी कुछ दर्शक यही सवाल उठा रहे हैं कि क्या फिल्मकार धार्मिक प्रसंगों की प्रस्तुति में पर्याप्त सांस्कृतिक सावधानी बरत रहे हैं। लेकिन दोनों फिल्मों के विवादों को एक जैसा मानने से पहले उनके अलग-अलग दृश्यों, संवादों और संगीत का स्वतंत्र मूल्यांकन जरूरी है।  यहां फिल्मकारों के सामने चुनौती है कि वे दृश्यात्मक भव्यता और आधुनिक संगीत के साथ-साथ मूल कथा की गरिमा तथा दर्शकों की धार्मिक संवेदनाओं का भी ध्यान रखें।

4. विवाह की रस्म या राज्याभिषेक? एक दृश्य ने बढ़ाया विवाद

‘मंगल रंग’ के एक दृश्य में भगवान राम के रूप में रणबीर कपूर को पीला लेप लगाते हुए दिखाया गया है, जबकि माता सीता के रूप में साई पल्लवी भी वहां मौजूद हैं। कुछ दर्शकों ने इसे हल्दी की रस्म समझकर सवाल उठाए कि विवाह की पारंपरिक रस्म में वधू की उपस्थिति का क्या संदर्भ है। इसके बाद सोशल मीडिया पर इस दृश्य को मिथिला और पूर्वी उत्तर प्रदेश की परंपरा ‘चुमावन’ से जोड़कर देखने की चर्चा भी हुई। कुछ लोगों ने इसे राम के संभावित राज्याभिषेक की तैयारी से जुड़ा दृश्य बताया।

हालांकि, उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, इस दृश्य की सटीक रस्म को लेकर निर्माताओं की ओर से स्पष्ट आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए इसे निश्चित रूप से हल्दी, चुमावन या राज्याभिषेक की रस्म बताना अभी उचित नहीं होगा। यह विवाद एक महत्वपूर्ण बात सामने लाता है। धार्मिक फिल्मों में किसी दृश्य का अर्थ केवल निर्देशक की कल्पना से नहीं, बल्कि उसके सांस्कृतिक संदर्भ और दर्शकों की समझ से भी तय होता है। यदि दृश्य अस्पष्ट है, तो स्पष्ट व्याख्या देना निर्माताओं के हित में हो सकता है।

5. साधु-संतों की नाराजगी और बहिष्कार की चेतावनी

फिल्म के संगीत को लेकर सोशल मीडिया पर आलोचना के साथ अयोध्या के कुछ साधु-संतों की नाराजगी और बहिष्कार की चेतावनी से जुड़ी खबरें भी सामने आई हैं। उनकी आपत्ति का केंद्र धार्मिक प्रसंगों की प्रस्तुति और राम-सीता की मर्यादा के प्रति संवेदनशीलता बताया जा रहा है। हालांकि, किसी फिल्म का बहिष्कार करने की मांग और यह निष्कर्ष कि फिल्म देखना पाप है, दोनों अलग बातें हैं। धार्मिक संगठनों को अपनी आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार है। वहीं, दर्शकों को भी फिल्म देखकर, उसके संदर्भ को समझकर और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अपनी राय बनाने की स्वतंत्रता है। निर्माताओं के लिए भी जरूरी है कि वे आलोचना को केवल विरोध समझकर खारिज न करें। यदि दर्शकों के मन में किसी दृश्य या संगीत को लेकर वास्तविक भ्रम है, तो उसका स्पष्टीकरण देना संवाद का बेहतर रास्ता हो सकता है।

विवाद संगीत का या आस्था की प्रस्तुति का?

‘मंगल रंग’ पर उठे सवाल तीन स्तरों पर हैं। पहला, क्या संगीत अपनी मौलिक पहचान बनाए रखता है? दूसरा, क्या उसकी शैली राम-सीता के विवाह जैसे धार्मिक प्रसंग के अनुकूल लगती है? और तीसरा, क्या फिल्मकारों ने दृश्यात्मक प्रस्तुति में क्षेत्रीय परंपराओं और धार्मिक संदर्भों को पर्याप्त स्पष्टता से दिखाया है?

इन सवालों के उत्तर केवल सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाओं से नहीं मिल सकते। इसके लिए गीत के संगीत संयोजन, फिल्म के कथानक और संबंधित परंपराओं के संदर्भ को देखना होगा। रामायण जैसे महाकाव्य पर फिल्म बनाना केवल मनोरंजन नहीं, एक बड़ी सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है। रचनात्मक स्वतंत्रता फिल्मकारों का अधिकार है, लेकिन धार्मिक आस्था से जुड़े विषयों पर संवेदनशीलता और शोध भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। अंततः, ‘मंगल रंग’ पर उठी बहस का निर्णायक पहलू यह नहीं होना चाहिए कि किसी संगीत शैली को किस धर्म से जोड़कर देखा जा रहा है, बल्कि यह होना चाहिए कि प्रस्तुत रचना कथा की गरिमा, सांस्कृतिक संदर्भ और कलात्मक गुणवत्ता के साथ कितना न्याय करती है।

Tags: #Qawwali in Ramayana #Mangal Rang a debate between faith and cinematic freedomQawwali in the Ramayana Questions raised over the music of Mangal Rang a debate between faith and cinematic freedom
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