राष्ट्रपति मुर्मू का स्वतंत्रता दिवस संदेश: विकास को लोगों के केंद्र में रखने का आह्वान

President Murmu Independence Day

राष्ट्रपति मुर्मू का स्वतंत्रता दिवस संदेश: विकास को लोगों के केंद्र में रखने का आह्वान

भारत के स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में प्रवेश करते हुए, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का 15 अगस्त की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन केवल उपलब्धियों के उत्सव तक सीमित नहीं था। इसके केंद्र में एक सरल लेकिन गहरा विचार था: भारत की प्रगति को केवल आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे या वैश्विक प्रभाव से नहीं मापा जा सकता; इसे अंततः उसके लोगों के जीवन से मापा जाना चाहिए।

उनके पूरे संबोधन में यह विचार बार-बार उभरता रहा। छात्रों और किसानों से लेकर महिलाओं, श्रमिकों, सैनिकों, वरिष्ठ नागरिकों और वंचित वर्गों तक राष्ट्रपति ने लगातार ध्यान आम भारतीयों और देश निर्माण में उनकी भूमिका पर केंद्रित रखा। (राष्ट्रपति भवन)

स्वतंत्रता का अर्थ अवसर है

राष्ट्रपति मुर्मू ने 15 अगस्त 1947 को याद करते हुए शुरुआत की, लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता को आज के संदर्भ से जोड़ा। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ नागरिकों को उनकी आकांक्षाएँ पूरी करने के अवसर उपलब्ध कराना है।

यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत 2047 और विकसित भारत के लक्ष्य की ओर देख रहा है। राष्ट्रपति के संदेश ने संकेत दिया कि एक विकसित भारत केवल बड़े राजमार्गों, मजबूत आर्थिक आंकड़ों या उन्नत तकनीक वाला देश नहीं हो सकता। विकास को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना होगा—यही अंत्योदय का सिद्धांत है। (राष्ट्रपति भवन)

उन्होंने राष्ट्र-निर्माताओं की परिभाषा को भी व्यापक किया। शिक्षक, छात्र, डॉक्टर, वैज्ञानिक, किसान, श्रमिक, कलाकार, खिलाड़ी, निवेशक, सरकारी कर्मचारी, सफाईकर्मी, सशस्त्र बलों के सदस्य और अनगिनत अन्य लोगों को भारत की प्रगति में भागीदार बताया गया। (राष्ट्रपति भवन)

लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं है

संबोधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा लोकतंत्र और संविधान से जुड़ा था।

राष्ट्रपति ने जनभागीदारी, अवसरों की समानता और व्यक्तिगत गरिमा पर जोर दिया। उन्होंने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए यह भी कहा कि संसाधनों की कमी किसी भी नागरिक को न्याय से वंचित नहीं कर सकती।

साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों द्वारा असाधारण योगदान देने का उनका उल्लेख एक बड़े लोकतांत्रिक संदेश को दर्शाता है: आज के भारत में जन्म की परिस्थितियाँ किसी व्यक्ति की आकांक्षाओं की सीमा तय नहीं कर सकतीं। (राष्ट्रपति भवन)

विकास, लेकिन समावेश के साथ

संबोधन में भारत के आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन का उल्लेख किया गया, जिसमें वित्तीय समावेशन, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, बुनियादी ढांचा, डिजिटल भुगतान और गरीबी में कमी शामिल हैं।

राष्ट्रपति मुर्मू ने लगभग 59 करोड़ जन धन खाते, 80 करोड़ से अधिक मुफ्त अनाज लाभार्थियों और आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य कवरेज का उल्लेख किया। उन्होंने बढ़ते राजमार्गों, रेलवे, जलमार्गों, विमानन ढांचे और डिजिटल भुगतान के व्यापक विस्तार की भी बात की। (राष्ट्रपति भवन)

लेकिन उनका व्यापक संदेश यह था कि आंकड़ों का अर्थ तभी है जब वे अवसर और गरिमा में बदलें।

उन्होंने विकास को भारत की सांस्कृतिक पहचान से भी जोड़ा। परंपरा और आधुनिकता को विरोधी मानने के बजाय, उन्होंने भारत की विरासत और तकनीकी प्रगति के संतुलन की बात की। (राष्ट्रपति भवन)

महिलाएँ भागीदारी से नेतृत्व की ओर

संबोधन में महिलाओं को विशेष स्थान दिया गया।

राष्ट्रपति ने शिक्षा में लड़कियों की उपलब्धियों, महिलाओं की बढ़ती आर्थिक स्वतंत्रता और कृषि से लेकर सशस्त्र बलों तक उनकी उपस्थिति का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि हाल ही में ग्लासगो में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के 13 में से 8 स्वर्ण पदक महिलाओं ने जीते, और 10 करोड़ से अधिक महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं।

उन्होंने नारी शक्ति वंदन अधिनियम और विधायिकाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी की संभावना का भी उल्लेख किया। (राष्ट्रपति भवन)

यह बदलाव महत्वपूर्ण है अब चर्चा केवल महिलाओं की भागीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके नेतृत्व की ओर बढ़ रही है।

भारत के युवाओं के लिए विशेष संदेश

संबोधन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा युवाओं से जुड़ा था।

भारत की 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। राष्ट्रपति ने युवाओं को देश की सबसे बड़ी संपत्ति बताया। उन्होंने नवाचार, उद्यमिता, स्टार्टअप और नौकरी चाहने वालों से नौकरी देने वालों बनने की बढ़ती प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला। (राष्ट्रपति भवन)

उन्होंने सार्वजनिक परीक्षाओं के मुद्दे पर भी बात की जो लाखों छात्रों को प्रभावित करता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि परीक्षाएँ अवसरों के द्वार हैं और इन्हें पारदर्शी, सुरक्षित और विश्वसनीय बनाना आवश्यक है, साथ ही नकल जैसी अनियमितताओं को समाप्त करना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी पूरे समाज की है। (राष्ट्रपति भवन)

यह संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का जनसांख्यिकीय लाभ तभी सार्थक होगा जब युवाओं को अवसरों में निष्पक्षता और भविष्य में विश्वास मिलेगा।

विकास प्रकृति की कीमत पर नहीं

राष्ट्रपति ने पर्यावरण संरक्षण को देशभक्ति का हिस्सा बताया।

उनका स्पष्ट संदेश था: भविष्य की पीढ़ियों का प्राकृतिक संसाधनों पर उतना ही अधिकार है जितना वर्तमान पीढ़ी का। आज का विकास कल की विरासत को नुकसान नहीं पहुँचा सकता।

एक संथाली गीत का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रकृति के विनाश को मानवीय मूल्यों के क्षरण से जोड़ा और व्यक्तिगत तथा सामूहिक पर्यावरणीय जिम्मेदारी पर जोर दिया। (राष्ट्रपति भवन)

सुरक्षा और आतंकवाद पर सख्त संदेश

राष्ट्रीय सुरक्षा भी संबोधन का एक महत्वपूर्ण विषय था। राष्ट्रपति ने भारतीय सशस्त्र बलों के साहस को याद किया और ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे आतंकवाद और उसके समर्थकों को स्पष्ट संदेश गया है। उन्होंने नक्सलवाद में कमी और प्रभावित क्षेत्रों में हो रहे विकास की भी चर्चा की। (राष्ट्रपति भवन)

विदेश नीति पर उन्होंने राष्ट्रीय हित को आधार बताते हुए शांति, सहयोग, संवाद और वसुधैव कुटुंबकम् को मार्गदर्शक सिद्धांत बताया। उन्होंने नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था और अधिक प्रतिनिधिक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के समर्थन को भी दोहराया। (राष्ट्रपति भवन)

स्वराज से विकसित भारत तक

संबोधन का सबसे यादगार विचार अंत में सामने आया।

तेलुगु लेखक गुरजाड़ा अप्पाराव का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि देश केवल उसकी भूमि नहीं होता देश उसके लोग होते हैं।

यही पूरे संबोधन का सार है।

भारत की यात्रा स्वतंत्र भारत से विकसित भारत तक केवल सरकारों या संस्थाओं की नहीं हो सकती। इसमें गाँव का किसान, परीक्षा की तैयारी करता छात्र, छोटा उद्यम चलाती महिला, नई तकनीक पर काम करता वैज्ञानिक, सफाईकर्मी, सीमा पर तैनात सैनिक और अपने कर्तव्यों का पालन करता हर नागरिक शामिल होना चाहिए।

इस स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति का संदेश एक महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ता है: एक विकसित भारत वास्तव में कैसा होना चाहिए?

उनका उत्तर स्पष्ट है एक ऐसा भारत जो आर्थिक और तकनीकी रूप से मजबूत हो, लेकिन साथ ही जहाँ अवसर समान हों, महिलाएँ नेतृत्व करें, युवा बिना डर के सपने देख सकें, प्रकृति सुरक्षित रहे, न्याय सुलभ हो और विकास उन तक पहुँचे जो अब तक पीछे रह गए हैं।

यही विकसित भारत को केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक जन-केंद्रित राष्ट्रीय परियोजना बनाता है।

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