लखनऊ। राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले के आरोपी टिन्नू यादव को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक दावे ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। दावा किया जा रहा है कि टिन्नू यादव ने पिछले ढाई वर्षों में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को 980 बार फोन किया। इस दावे को समाजवादी पार्टी ने पूरी तरह भ्रामक, निराधार और राजनीतिक दुष्प्रचार करार देते हुए संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।
सपा का आरोप है कि बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के इस तरह की जानकारी सोशल मीडिया और कुछ अन्य माध्यमों से प्रसारित कर पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि इस तरह के दावों का उद्देश्य राजनीतिक माहौल को प्रभावित करना और जनता के बीच भ्रम फैलाना है।
इसी सिलसिले में समाजवादी पार्टी के निवर्तमान महानगर अध्यक्ष श्याम कृष्ण श्रीवास्तव ने लखनऊ के कोतवाली नगर थाना पहुंचकर लिखित शिकायत दी है। शिकायत में सांसद निशिकांत दुबे, कुछ अन्य व्यक्तियों, एक टीवी चैनल और अज्ञात लोगों पर कथित रूप से भ्रामक और अपुष्ट जानकारी प्रसारित करने का आरोप लगाया गया है। सपा नेताओं का कहना है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जा रहे ऐसे दावे लोकतांत्रिक राजनीति को प्रभावित करते हैं और बिना प्रमाण किसी भी व्यक्ति या राजनीतिक दल की छवि धूमिल करने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इस बीच सपा नेता एवं पूर्व मंत्री तेज नारायण पांडेय ने भी बयान जारी कर कहा कि यदि 980 कॉल किए जाने का दावा सही है तो उसके प्रमाण सार्वजनिक किए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल सोशल मीडिया पोस्ट या राजनीतिक आरोपों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। उनके अनुसार यदि किसी के पास ठोस साक्ष्य हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाए, अन्यथा इस तरह के दावे बंद होने चाहिए।
उधर, नगर कोतवाल मनोज शर्मा ने पुष्टि की है कि इस मामले में शिकायत प्राप्त हुई है। पुलिस का कहना है कि तहरीर के आधार पर पूरे मामले की जांच की जाएगी और उपलब्ध तथ्यों एवं साक्ष्यों के अनुसार आगे की विधिक कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल, टिन्नू यादव द्वारा अखिलेश यादव को 980 कॉल किए जाने के दावे की किसी स्वतंत्र आधिकारिक एजेंसी या जांच एजेंसी द्वारा पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में यह मामला अभी जांच के दायरे में है और पुलिस तथ्यों का सत्यापन कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित अपुष्ट दावे अक्सर राजनीतिक विवाद का कारण बनते हैं। ऐसे मामलों में जांच पूरी होने और आधिकारिक तथ्यों के सामने आने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित माना जाता है। फिलहाल यह मामला राजनीतिक बयानबाजी और कानूनी कार्रवाई, दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है।