मुख्य समीक्षा: माटी की महक और कभी न टूटने वाले इरादों की दास्तान
सिनेमा की सबसे बड़ी कामयाबी इसी बात में छिपी होती है कि वह एक बेहद साधारण और आम इंसान के रोजाना के संघर्षों को पर्दे पर इस कदर उकेरे कि वह दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणा की एक मिसाल बन जाए। पेड्डी की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह किसी सुपरहीरो की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे और आपके बीच के एक ऐसे शख्स की जिद है जो हालातों के आगे झुकना नहीं जानता।
स्टार रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐☆ (4/5 स्टार)
निर्देशक: बुची बाबू सना
मुख्य कलाकार: राम चरण, जाह्नवी कपूर, शिव राजकुमार
संगीत: ए. आर. रहमान
फिल्म जॉनर: स्पोर्ट्स ड्रामा / एक्शन
निर्देशक बुची बाबू सना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे केवल एक फिल्म नहीं बनाते, बल्कि वे एक पूरी संस्कृति और परिवेश को स्क्रीन पर इस तरह जीवंत करते हैं कि उसकी महक सीधे दर्शकों के दिलों तक पहुंचती है। उनकी यह नई पेशकश भारतीय मिट्टी और यहां के समाज की वास्तविकताओं में गहराई से धंसी हुई है, लेकिन इसके भीतर जो संदेश छिपा है वह हर देश, हर संस्कृति और हर पीढ़ी के इंसान को अपना सा महसूस होता है। यही वजह है कि यह फिल्म एक खास इलाके की पृष्ठभूमि पर आधारित होने के बावजूद एक सार्वभौमिक सिनेमाई रूप अख्तियार कर लेती है।
अक्सर व्यावसायिक सिनेमा की चकाचौंध में लोग कहानी की सादगी और उसकी आत्मा को भूल जाते हैं, लेकिन पेड्डी इस जाल में फंसने से पूरी तरह बच जाती है। फिल्म की पटकथा को इतनी बारीकी और समझदारी से बुना गया है कि नायक की जिंदगी में आने वाला हर एक उतार-चढ़ाव दर्शकों की अपनी निजी यात्रा जैसा लगने लगता है। हम पर्दे पर केवल एक खिलाड़ी को नहीं देखते, बल्कि हम उस इंसान के आत्मसम्मान, उसकी अस्मिता और उसके पूरे वजूद की लड़ाई को महसूस करते हैं। निर्देशक ने व्यावसायिक मनोरंजन के तमाम जरूरी मसालों को इस तरह से कहानी में घोला है कि कहीं भी कहानी की गंभीरता कम नहीं होती। थिएटर्स के अंधेरे कमरे में जब यह कहानी अपने पूरे शबाब पर होती है, तो दर्शकों का इसके साथ एक ऐसा गहरा नाता जुड़ जाता है जो फिल्म के खत्म होने के बाद भी टूटता नहीं है।
इस पूरी फिल्म के सबसे मजबूत स्तंभ और इसके प्राण बनकर उभरे हैं अभिनेता राम चरण, जिन्होंने अपने इस किरदार को केवल जिया नहीं है, बल्कि उसमें अपनी पूरी रूह फूंक दी है। उनके करियर के ग्राफ को देखा जाए तो यह प्रदर्शन उनके सबसे बेहतरीन और यादगार कामों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर शुमार किया जाएगा। उन्होंने इस साधारण से दिखने वाले किरदार को एक गजब की गरिमा और ठहराव दिया है। पर्दे पर उनकी आंखों की मासूमियत, उनका गुस्सा, और उनका दर्द इतना असली लगता है कि दर्शक हर दृश्य में उनके लिए दुआ करने लगते हैं। जब वे टूटते हैं तो थियेटर में एक सन्नाटा पसर जाता है और जब वे पूरी ताकत के साथ वापस उठ खड़े होते हैं तो हॉल तालियों और सीटियों से गूंज उठता है। एक अभिनेता के तौर पर उनकी यही सबसे बड़ी जीत है कि उन्होंने इस भव्य पैमाने की फिल्म में भी अपनी भावनात्मक ईमानदारी को खोने नहीं दिया।
फिल्म का स्क्रीनप्ले एक बेहद सधे हुए अंदाज में नायक की इस पूरी जीवन यात्रा को पर्दे पर उतारता है। निर्देशक ने यहां किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं दिखाई है। नायक को मिलने वाली हर एक छोटी कामयाबी या नाकामी के पीछे के संघर्षों को बहुत ही तार्किक और भावनात्मक रूप से स्थापित किया गया है। यही वजह है कि जब अंत में नायक को अपनी अंतिम जीत मिलती है, तो वह दर्शकों को अचानक से मिली हुई या बिना मेहनत की नहीं लगती, बल्कि लगता है कि इस इंसान ने अपनी इस जीत का एक-एक कतरा अपनी मेहनत और बलिदान से कमाया है। कहानी का यही भावनात्मक जुड़ाव फिल्म के सबसे दमदार और भारी दृश्यों में अपना असर दिखाता है, जहां दर्शक खुद को पूरी तरह से फिल्म के हवाले कर देते हैं।
स्पोर्ट्स ड्रामा के तौर पर देखा जाए तो इस फिल्म के भीतर खेल के मैदान और अखाड़े के दृश्यों को बेहद उम्दा और अनोखे तरीके से फिल्माया गया है। आमतौर पर खेल पर आधारित फिल्मों में निर्देशक केवल रोमांच और जीत-हार की हड़बड़ाहट पर ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन बुची बाबू सना ने यहां एक अलग रास्ता चुना है। उन्होंने खेल के मैदान पर होने वाले हर एक मुकाबले के पीछे एक बहुत बड़ा भावनात्मक दांव लगाया है। यहां होने वाली हर भिड़ंत केवल एक ट्रॉफी जीतने के लिए नहीं है, बल्कि वह नायक के पूरे परिवार और उसके समाज की उम्मीदों को जिंदा रखने की आखिरी कोशिश है। यही वजह है कि फिल्म में जब नायक हारता है तो दर्शकों का दिल टूट जाता है और जब वह जीतता है तो वह जीत बेहद खास और मायने रखने वाली बन जाती है। मैदान के भीतर की मनोवैज्ञानिक लड़ाई और ट्रेनिंग के सीन्स इतने बेहतरीन हैं कि वे दर्शकों के भीतर एक नया जोश भर देते हैं।
इस बेहद महत्वाकांक्षी और बड़े सिनेमाई प्रोजेक्ट को पर्दे पर पूरी खूबसूरती से उतारने का श्रेय इसकी पूरी राइटिंग और टेक्निकल टीम को भी जाता है। बुची बाबू सना, कृष्ण हरि, नागेंद्र कासी और वारा प्रकाश तोलेटी द्वारा लिखे गए संवाद फिल्म के सबसे अहम दृश्यों में एक नई जान फूंकने का काम करते हैं। ये संवाद बहुत ही स्वाभाविक हैं और आम बोलचाल की भाषा के करीब होते हुए भी गहरा असर छोड़ते हैं। इसके साथ ही, हरि, चिंताकिंदी श्रीनिवास, वेमा रेड्डी और सुनील माधव की संयुक्त लेखन टीम ने एक ऐसा चुस्त स्क्रीनप्ले तैयार किया है जो ढाई-तीन घंटे की इस फिल्म में दर्शकों को एक पल के लिए भी बोर होने का मौका नहीं देता। कहानी का प्रवाह इतना सहज है कि समय का पता ही नहीं चलता।
फिल्म का संगीत और इसकी धुनें इस कहानी की आत्मा को और ज्यादा समृद्ध करती हैं। अनंत श्रीराम, बालाजी, गणेश और सालादी के लिखे गीत केवल फिल्म की लंबाई बढ़ाने के लिए नहीं रखे गए हैं, बल्कि वे कहानी के नैरेटिव को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। ये गीत नायक के दिल की बात को दर्शकों तक पहुंचाने का एक जरिया बनते हैं। वहीं दूसरी तरफ, मशहूर कोरियोग्राफर बोस्को मार्टिस ने फिल्म में बेहद दमदार और ऊर्जा से भरपूर नृत्य दृश्य तैयार किए हैं, जो राम चरण की बेमिसाल डांसिंग स्टाइल का पूरा फायदा उठाते हैं। यह संगीत और विजुअल्स का एक ऐसा बेहतरीन कॉम्बिनेशन है जो बड़े पर्दे पर देखने में बेहद खूबसूरत और आनंददायक लगता है।
बॉक्स ऑफिस और आम दर्शकों की पसंद के लिहाज से बात करें तो पेड्डी सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि यह साहस, कभी न हार मानने वाले जज्बे और उम्मीद की कभी न बुझने वाली लौ का एक खुला जश्न है। यह फिल्म समाज के हर तबके को अपनी तरफ खींचने का माद्दा रखती है। जहां आम सिनेमाप्रेमियों के लिए इसमें भरपूर एक्शन, कड़क डायलॉग्स और शानदार गाने हैं, वहीं दूसरी तरफ गंभीर सिनेमा देखने वालों के लिए इसमें एक बहुत ही मजबूत और दिल को छू लेने वाली इंसानी कहानी है। अंततः, पेड्डी एक ऐसी मुकम्मल और दिलकश फिल्म बनकर सामने आती है जो आपको हंसाती है, रुलाती है और सिनेमाघर से बाहर निकलते वक्त आपके भीतर जिंदगी से लड़ने का एक नया हौसला भर देती है। इस बेमिसाल थिएट्रिकल अनुभव को किसी भी हाल में मिस नहीं किया जाना चाहिए, इसे अपने पूरे परिवार के साथ थियेटर की बड़ी स्क्रीन पर ही देखा जाना चाहिए।