सुरों पर सियासत का साया: दिखाई थी आशा भोसले की खबर…पाकिस्तानी सरकार ने इस चैनल को थमाया नोटिस

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सुरों पर सियासत का साया: आशा भोसले की खबर पर पाकिस्तान में विवाद

संगीत की दुनिया की महान आवाज आशा भोसले के निधन ने पूरी दुनिया को भावुक कर दिया। भारत ही नहीं, पाकिस्तान में भी उनके चाहने वालों ने गहरा दुख जताया। लेकिन इस संवेदनशील मौके पर भी सियासत हावी हो गई, जब पाकिस्तानी मीडिया चैनल जियो न्यूज को उनकी खबर दिखाने पर नोटिस थमा दिया गया।

संगीत की कोई सरहद नहीं होती

आशा भोसले की आवाज ने दशकों तक पीढ़ियों को जोड़ा। उनके गीत सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और दुनिया के कई देशों में लोकप्रिय रहे। संगीत वह भाषा है, जो धर्म, देश और राजनीति की सीमाओं से परे जाकर दिलों को जोड़ती है। यही वजह है कि उनके निधन को हर संगीत प्रेमी ने निजी क्षति माना।

नोटिस ने खड़ा किया बड़ा सवाल

पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नियामक पेमरा ने जियो न्यूज को नोटिस जारी किया। आरोप था कि चैनल ने न सिर्फ आशा भोसले के निधन की खबर दिखाई, बल्कि उनके गीत भी प्रसारित किए। यह सवाल उठता है कि एक महान कलाकार को श्रद्धांजलि देना कैसे गलत हो सकता है? क्या कला और संस्कृति भी अब राजनीतिक सीमाओं में बांधी जाएंगी?

पाकिस्तान की जनता बनाम हुकूमत

जहां एक ओर आम पाकिस्तानी नागरिकों और कलाकारों ने सोशल मीडिया पर आशा भोसले को श्रद्धांजलि दी, वहीं सरकारी रवैया इसके उलट नजर आया। यह विरोधाभास बताता है कि जनता के दिलों में कला के लिए सम्मान है, लेकिन नीतिगत स्तर पर सख्ती और प्रतिबंध का माहौल बना रहता है।

कला पर नियंत्रण: क्या यह सही दिशा है?

इतिहास गवाह है कि जब-जब कला और अभिव्यक्ति पर नियंत्रण लगाया गया, समाज में दूरी और बढ़ी है।
आशा भोसले जैसी कलाकार, जिन्होंने अपने गीतों से प्रेम और संवेदनशीलता का संदेश दिया, उनके नाम पर भी विवाद खड़ा होना चिंताजनक है।

सुरों को सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता

आशा भोसले की विरासत किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की धरोहर है। उनकी आवाज आज भी लोगों को जोड़ती है और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। ऐसे में यह जरूरी है कि कला को राजनीति से ऊपर रखा जाए। क्योंकि जब सुर बोलते हैं, तो सरहदें खामोश हो जाती हैं।

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