यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी समर्थित ताकतों के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान की सैन्य भूमिका अब सिर्फ कूटनीतिक समर्थन तक सीमित दिखाई नहीं दे रही है। रॉयटर्स की 2 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने सितंबर में चार कार्गो विमान अदन भेजे, जिनमें एयर डिफेंस सिस्टम, हल्की तोपें, ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम शामिल थे। साथ ही पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी और सलाहकार सऊदी समर्थित यमनी बलों के साथ काम कर रहे हैं।
सबसे बड़ा दावा पाकिस्तान के एक अधिकारी की ओर से आया है, जिसके मुताबिक 30 से 40 हजार पाकिस्तानी सैन्यकर्मी सऊदी अरब में तैनात हैं। हालांकि उसी अधिकारी ने कहा कि इन सैनिकों की भूमिका मुख्य रूप से सऊदी सीमा की सुरक्षा और ड्रोन-मिसाइल हमलों से बचाव की है और पाकिस्तान ने यमन के भीतर लड़ाकू भूमिका में सैनिक भेजने का फैसला नहीं किया है।
पाकिस्तान की रणनीति: यमन में सीधे उतरना नहीं, सऊदी की ढाल बनना
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि पाकिस्तान फिलहाल यमन के भीतर सीधे जमीनी युद्ध में उतरने से बचता हुआ अपनी भूमिका को सऊदी अरब की रक्षा तक सीमित रख रहा है। चार कार्गो विमानों में भेजे गए उपकरणों में एयर डिफेंस और एंटी-ड्रोन प्रणाली विशेष महत्व रखती है। वजह साफ है—हूती लंबे समय से ड्रोन और मिसाइलों को अपने प्रमुख हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं। ऐसे में सऊदी के सैन्य ठिकानों, तेल प्रतिष्ठानों और सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा के लिए एयर डिफेंस सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में से एक बन गई है। क्षेत्रीय अधिकारियों के मुताबिक रियाद की बड़ी चिंता अपने तेल और दूसरे महत्वपूर्ण ढांचे को ड्रोन और मिसाइल हमलों से बचाना है। यानी पाकिस्तान की मौजूदा भूमिका को एक लाइन में समझें तो—
यमन में हमला करने से ज्यादा सऊदी को हमले से बचाने की तैयारी।
लेकिन 30-40 हजार सैनिकों का आंकड़ा क्यों अहम है?
अगर पाकिस्तान की ओर से बताए गए 30-40 हजार सैनिकों के आंकड़े को सही माना जाए, तो यह मामूली सैन्य सहायता नहीं है। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। रिपोर्ट के अनुसार यह पूरा आंकड़ा अचानक सितंबर में यमन सीमा पर नहीं पहुंचा। पाकिस्तानी अधिकारी के मुताबिक सैनिक अलग-अलग चरणों में पिछले साल से सऊदी अरब पहुंचते रहे हैं और हालिया तनाव के बाद भी तैनाती हुई है। उनकी घोषित भूमिका सऊदी की सीमा सुरक्षा और एयर डिफेंस में सहायता की है।
इसलिए इसे सीधे “पाकिस्तान ने यमन में 40 हजार सैनिक उतार दिए” कहना उपलब्ध रिपोर्टों से ज्यादा बड़ा दावा होगा। असल तस्वीर यह है कि पाकिस्तान की सैन्य मौजूदगी सऊदी अरब में बढ़ी है और उसकी भूमिका अब यमन संघर्ष की सुरक्षा गणित से सीधे जुड़ गई है।
हूती मोर्चे पर सऊदी की तैयारी क्यों बढ़ी?
रॉयटर्स के मुताबिक सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ यमन में एक बड़े अभियान की तैयारी कर रहा है। संभावित अभियान का लक्ष्य लाल सागर के रणनीतिक बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर नियंत्रण मजबूत करना है। प्रस्तावित अभियान में 1 लाख से अधिक यमनी जमीनी बलों की भूमिका बताई गई है, जबकि सऊदी हवाई समर्थन देने की तैयारी में है। यहीं पाकिस्तान की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
अगर सऊदी समर्थित यमनी बल आगे बढ़ते हैं तो हूतियों की तरफ से जवाबी ड्रोन और मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ सकता है। पाकिस्तान की एयर डिफेंस और एंटी-ड्रोन क्षमता ऐसी स्थिति में सऊदी के पीछे के इलाकों को सुरक्षित रखने के काम आ सकती है। यानी संभावित युद्ध सिर्फ यमन के अंदर की लड़ाई नहीं रहेगा। इसका एक हिस्सा सऊदी सीमा और सऊदी के महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा का भी होगा।
मक्का रक्षा समझौते का पहला बड़ा इम्तिहान
इस घटनाक्रम को अगस्त 2026 में हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते से अलग करके देखना मुश्किल है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने सामूहिक रक्षा सहयोग का समझौता किया है। सितंबर में तीनों देशों के सैन्य प्रमुखों की रियाद में बैठक भी हुई थी। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने इसे समझौते के राजनीतिक आश्वासन से आगे बढ़कर सैन्य व्यवस्था लागू करने की दिशा में कदम बताया था। यमन का बढ़ता तनाव इस समझौते की व्यावहारिक परीक्षा बन गया है।
लेकिन अभी उपलब्ध जानकारी यह नहीं दिखाती कि पाकिस्तान ने हूतियों के खिलाफ सीधे हमले या यमन में जमीनी अभियान का फैसला किया है। डॉन की रिपोर्ट में भी तीनों देशों के सैन्य प्रमुखों की बैठक के बाद ऐसा कोई संकेत नहीं बताया गया था।
पाकिस्तान के सामने सबसे कठिन संतुलन
पाकिस्तान के लिए यह मामला केवल सैन्य नहीं, रणनीतिक भी है। एक तरफ सऊदी अरब पाकिस्तान का महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक साझेदार है। दूसरी तरफ यमन युद्ध में सीधे उतरने का मतलब क्षेत्रीय संघर्ष में गहराई से शामिल होना होगा। इसीलिए अभी जो मॉडल दिखाई दे रहा है, उसमें पाकिस्तान—
सऊदी को हथियार देता है,
एयर डिफेंस मजबूत करता है,
सैन्य सलाहकार भेजता है,
सीमा सुरक्षा में मदद करता है,
लेकिन यमन में सीधे युद्ध से दूरी बनाए रखता है।
यही संतुलन आगे कितना कायम रहता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सऊदी का प्रस्तावित अभियान कितना व्यापक होता है और हूती उसके जवाब में सऊदी क्षेत्र को किस स्तर तक निशाना बनाते हैं।
अब असली खतरा सिर्फ यमन तक सीमित नहीं
यमन में संघर्ष बढ़ने का असर सिर्फ सऊदी-पाकिस्तान समीकरण तक सीमित नहीं रहेगा। बाब-अल-मंदेब दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। वहां अस्थिरता का सीधा असर लाल सागर में जहाजों की आवाजाही, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है। रॉयटर्स ने भी इस जलमार्ग को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताया है।
यही वजह है कि अमेरिका, तुर्किये, पाकिस्तान और दूसरे देशों की भूमिका इस संघर्ष में महत्वपूर्ण होती जा रही है। अमेरिका सऊदी हवाई अभियानों को खुफिया और सलाहकार सहायता दे रहा है, जबकि तुर्किये और पाकिस्तान की सैन्य सहायता मुख्य रूप से सऊदी की रक्षा क्षमता से जुड़ी बताई गई है।
पाकिस्तान की भूमिका बदल रही है, लेकिन युद्ध में उतरने की पुष्टि नहीं
ताजा रिपोर्टों से जो तस्वीर निकलती है, उसमें पाकिस्तान यमन युद्ध में सीधे लड़ाकू पक्ष बनने के बजाय सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की भूमिका में है। चार कार्गो विमानों से भेजे गए सैन्य उपकरण, एयर डिफेंस और एंटी-ड्रोन प्रणालियां तथा सऊदी में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैन्यकर्मियों की मौजूदगी इस साझेदारी के बढ़ते सैन्य आयाम को जरूर दिखाती है। लेकिन 30-40 हजार सैनिकों को यमन में लड़ने के लिए भेजा गया है, यह कहना अभी उपलब्ध स्रोतों से समर्थित नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल अब यही है— अगर सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ बड़ा जमीनी अभियान शुरू करता है और जवाब में हूती सऊदी शहरों, सैन्य ठिकानों या तेल प्रतिष्ठानों पर हमले बढ़ाते हैं, तो पाकिस्तान की मौजूदा ‘रक्षा सहायता’ कितनी दूर तक जाएगी? यहीं से मक्का रक्षा समझौते की असली परीक्षा शुरू होगी।