महंगाई की नई आहट? अनाज से खाद तक बढ़ी ग्लोबल टेंशन

Signs of fresh inflation Global tensions rise from grain to fertilizer

खाने-पीने की चीजों की महंगाई को लेकर आने वाले महीनों में चिंता बढ़ सकती है। इसकी वजह सिर्फ भारत में बारिश की कमी नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर खाद, अनाज, ऊर्जा और सप्लाई चेन पर बढ़ता दबाव भी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी के कार्यक्रम में आने वाले महीनों में बड़े खाद्य संकट की आशंका जताई है। दूसरी ओर कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने देश के कई राज्यों में सूखे और बाढ़ से फसलों को हुए नुकसान की जानकारी दी है।

जयशंकर का अलर्ट: 4F संकट

जयशंकर की चिंता सिर्फ अनाज तक सीमित नहीं है। उन्होंने Food, Fuel, Fertiliser और Finance यानी 4F के एक साथ दबाव में आने की बात कही। रूस-यूक्रेन और ईरान-खाड़ी क्षेत्र के संघर्षों के कारण ऊर्जा आपूर्ति, खाद की उपलब्धता और अनाज की शिपमेंट प्रभावित होने की आशंका है। खासकर ब्लैक सी क्षेत्र से अनाज निर्यात में व्यवधान वैश्विक खाद्य बाजार पर दबाव बढ़ा सकता है।

इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि भारत में तत्काल अनाज की कमी होने वाली है। जयशंकर की टिप्पणी वैश्विक जोखिम की चेतावनी है, न कि भारत में खाद्य संकट शुरू होने की घोषणा।

भारत में मौसम ने बढ़ाई चिंता

भारत के मोर्चे पर भी तस्वीर पूरी तरह सामान्य नहीं है। इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून में देशभर में करीब 12 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। खरीफ फसलों का कुल बुवाई क्षेत्र लगभग 1 प्रतिशत घटा और धान का रकबा करीब 16.32 लाख हेक्टेयर कम हुआ। बाढ़, भारी बारिश और सूखे से करीब 6.11 लाख हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित होने की प्रारंभिक सूचना है।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि प्रतिकूल मौसम के बावजूद खरीफ खाद्यान्न उत्पादन में बड़ी गिरावट की आशंका नहीं है। सरकार ने 2026-27 के लिए खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 373.93 मिलियन टन रखा है, जो पिछले अनुमान से थोड़ा कम है।

सूखे की मार, कई राज्यों में फसल प्रभावित

कर्नाटक और महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति विशेष चिंता का विषय बनी है। इसके अलावा तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और कुछ अन्य इलाकों में भी मौसम संबंधी नुकसान की प्रारंभिक रिपोर्ट आई है। केंद्र ने कर्नाटक और महाराष्ट्र में स्थिति का आकलन करने के लिए केंद्रीय टीम भेजने की बात कही है।

महाराष्ट्र में 358 में से 265 तालुकाओं को सूखा प्रभावित घोषित किया गया है, जो स्थिति की गंभीरता का एक संकेत है।

महंगाई का कनेक्शन समझिए

अब असली सवाल है कि इन घटनाओं का आम आदमी की थाली से क्या संबंध है?

अगर वैश्विक स्तर पर खाद की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो खेती की लागत बढ़ सकती है। अगर ऊर्जा महंगी होती है, तो सिंचाई, परिवहन, भंडारण और खाद्य प्रसंस्करण की लागत पर असर पड़ सकता है। और अगर प्रमुख निर्यातक देशों से अनाज की सप्लाई बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

भारत में इसका असर दाल, खाद्य तेल, अनाज और दूसरी कृषि वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है, लेकिन वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि घरेलू उत्पादन, सरकारी भंडार, आयात-निर्यात नीति और सप्लाई चेन की स्थिति कैसी रहती है।

राहत की तस्वीर भी मौजूद

तस्वीर का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। कृषि मंत्रालय के मुताबिक खराब मौसम के बावजूद कई फसलों में रकबा बढ़ा है। उड़द, बाजरा, ज्वार, तिल, सूरजमुखी और अरहर जैसी फसलों की बुवाई में बढ़ोतरी दर्ज हुई है। रबी सीजन के लिए भी सरकार ने उत्पादन लक्ष्य रखा है और खाद भंडार की स्थिति को लेकर आश्वस्त किया है।

संकट से ज्यादा चुनौती तैयारी की

फिलहाल इसे भारत में आने वाली “महंगाई की महामार” कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन दो अलग-अलग स्तरों से मिले संकेत जरूर महत्वपूर्ण हैं—जयशंकर का ग्लोबल सप्लाई संकट का अलर्ट और शिवराज सिंह चौहान की मौसम एवं फसल नुकसान पर रिपोर्ट।

आने वाले महीनों में तीन चीजें निर्णायक रहेंगी—रबी की बुवाई, वैश्विक खाद-ऊर्जा कीमतें और ब्लैक सी सहित प्रमुख अनाज सप्लाई रूट। अगर इन तीनों मोर्चों पर दबाव एक साथ बढ़ा, तो खाद्य महंगाई की चुनौती गंभीर हो सकती है। लेकिन अभी उपलब्ध सरकारी आंकड़े देश में तत्काल व्यापक खाद्यान्न संकट की पुष्टि नहीं करते। यानी खतरे की घंटी बजने की बात जरूर है, लेकिन थाली पर संकट कितना बड़ा होगा, इसका फैसला आने वाले महीनों की फसल, मौसम और वैश्विक सप्लाई से होगा।

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