पाकिस्तान फिर बौखलाया, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने देश के अंदरूनी संकट के बीच पानी की सुरक्षा को लेकर भारत के खिलाफ़ युद्ध की गीदड़ भभकी

Pakistan Defence Minister

पानी पर राजनीति और युद्ध की धमकी: अपनी नाकामियों को छिपाने की पाकिस्तान की पुरानी चाल

पाकिस्तान  जो अपनी नीतिगत विफलताओं को सुधारने के बजाय पड़ोसियों को दोष देता है, वह समस्याओं का समाधान नहीं बल्कि संकटों का विस्तार करता है।”

भारत के खिलाफ़ युद्ध की धमकियां देना पाकिस्तान की पुरानी आदत रही है। जब भी पाकिस्तान अपने घरेलू संकटों, आर्थिक बदहाली या प्रशासनिक विफलताओं से घिरता है, तब उसके नेता भारत विरोधी बयानबाजी को हथियार बनाकर जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का हालिया बयान भी इसी मानसिकता का एक और उदाहरण है।

पहलागाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला लिया। यह कदम किसी राजनीतिक सनक का परिणाम नहीं था, बल्कि सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ़ एक सख्त और स्पष्ट संदेश था। भारत ने साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से संचालित आतंकी ढांचे पर विश्वसनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक सामान्य संबंधों की उम्मीद नहीं की जा सकती।

इसके बावजूद पाकिस्तान अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश कर रहा है। ख्वाजा आसिफ भारत पर “पानी को हथियार” बनाने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान वर्षों से अपने जल संसाधनों के प्रबंधन में असफल रहा है। सिंध और बलूचिस्तान में गंभीर जल संकट, नहरों में भारी कमी, जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रांतों के बीच पानी को लेकर बढ़ते विवाद उसकी अपनी नीतिगत विफलताओं का परिणाम हैं।

वास्तव में पाकिस्तान को भारत से नहीं, बल्कि अपने प्रशासनिक भ्रष्टाचार, कमजोर जल प्रबंधन और राजनीतिक अस्थिरता से लड़ने की जरूरत है। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी आसान रास्ता चुना गया है—भारत को दोष दो और जनता की नाराजगी को बाहरी दुश्मन की ओर मोड़ दो।

भारत ने हमेशा जिम्मेदार राष्ट्र की भूमिका निभाई है। सिंधु जल संधि छह दशकों तक दोनों देशों के बीच सहयोग का प्रतीक रही, यहां तक कि युद्धों और तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी भारत ने अपने दायित्वों का पालन किया। लेकिन आतंकवाद और शांति एक साथ नहीं चल सकते। यदि पाकिस्तान अपनी धरती पर पल रहे आतंकी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता, तो उसे इसके कूटनीतिक और रणनीतिक परिणाम भुगतने होंगे।

ख्वाजा आसिफ की युद्ध संबंधी धमकियां न तो पाकिस्तान की जल समस्या का समाधान हैं और न ही उसकी जनता की परेशानियां कम कर सकती हैं। यह बयान केवल उस हताशा को दर्शाता है जो एक ऐसे देश में दिखाई दे रही है, जहां आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और संसाधनों के कुप्रबंधन ने शासन की कमजोरियों को उजागर कर दिया है।

भारत को ऐसी बयानबाजी से विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। देश ने हमेशा संयम, दृढ़ता और राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए निर्णय लिए हैं। पाकिस्तान के नेताओं को युद्ध की भाषा छोड़कर आत्ममंथन करना चाहिए, क्योंकि पानी की कमी का असली कारण सीमा पार नहीं, बल्कि उनके अपने घर के भीतर मौजूद है।

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