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‘आतंकवाद’ का जाल…अब पाकिस्तान ही हुआ शिकार! जानें तालिबान, TTP और ISI की रणनीति कैसे बनी इस्लामाबाद पर खतरा

DigitalDesk by DigitalDesk
June 29, 2026
in दिल्ली, मुख्य समाचार
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Pakistan appears to be getting entangled once again in the same web of terrorism
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पाकिस्तान एक बार फिर आतंकवाद के उसी जाल में उलझता दिखाई दे रहा है, जिसे उसने दशकों तक अपनी रणनीतिक नीति का हिस्सा बनाकर पाला था। कराची में पाकिस्तानी रेंजर्स मुख्यालय पर हुए बड़े आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के भीतर हवाई और जमीनी कार्रवाई की। लेकिन सवाल सिर्फ इस हमले का नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर वह नीति, जिसे पाकिस्तान कभी अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत मानता था, आज उसी की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती कैसे बन गई? यही है ‘गुड और बैड आतंकवाद’ की बहुचर्चित थ्योरी।

  • कराची हमले के बाद अफगानिस्तान पर पाकिस्तानी बमबारी
  • ‘गुड टेररिस्ट’ की नीति अब पाकिस्तान पर भारी
  • तालिबान और TTP ने बदला दक्षिण एशिया का सुरक्षा समीकरण
  • ISI की रणनीति कैसे बनी पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी
  • क्या अपने ही बनाए नेटवर्क में फंस गया पाकिस्तान?

कराची हमले ने बढ़ाया तनाव

कराची स्थित पैरामिलिट्री रेंजर्स मुख्यालय पर हुए हमले में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुंचा। पाकिस्तान के अनुसार हमले की जिम्मेदारी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के गुट जमात-उल-अहरार ने ली। हमले के बाद पाकिस्तान ने अफगानिस्तान सीमा के भीतर हवाई हमले किए और कई लड़ाकों को मार गिराने का दावा किया। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव और गहरा गया।

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क्या है ‘गुड’ और ‘बैड’ आतंकवाद की थ्योरी?

सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार पाकिस्तान की सैन्य और खुफिया रणनीति में वर्षों तक आतंकवादी संगठनों को दो वर्गों में देखा जाता रहा।

‘गुड आतंकवाद’

वे संगठन जिन्हें पाकिस्तान अपने रणनीतिक हितों के लिए उपयोगी मानता था।

इनमें शामिल बताए जाते रहे—

  • लश्कर-ए-तैयबा
  • जैश-ए-मोहम्मद
  • हक्कानी नेटवर्क
  • अफगान तालिबान

आरोप रहे कि इन संगठनों का इस्तेमाल भारत और अफगानिस्तान में प्रभाव बढ़ाने के लिए किया गया।

‘बैड आतंकवाद’

वे संगठन जो सीधे पाकिस्तान की सेना और सरकार के खिलाफ हथियार उठाते हैं।

इनमें सबसे प्रमुख नाम है—

  • तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP)

स्ट्रैटेजिक डेप्थ की नीति

विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान की सुरक्षा नीति का एक प्रमुख सिद्धांत ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ रहा, जिसके तहत अफगानिस्तान में अपने अनुकूल शासन और प्रभाव बनाए रखने की कोशिश की गई। इसी सोच के कारण कई उग्रवादी समूहों को लंबे समय तक संरक्षण मिलने के आरोप लगते रहे।

2021 के बाद क्यों बदल गया पूरा खेल?

अगस्त 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद पाकिस्तान को उम्मीद थी कि नई सरकार TTP पर कार्रवाई करेगी। लेकिन घटनाक्रम इसके विपरीत दिखाई दिया।

विश्लेषकों के अनुसार अफगान तालिबान और TTP के बीच वैचारिक समानताएं हैं। दोनों का सामाजिक आधार बड़े पैमाने पर पश्तून समुदाय में है। कई TTP लड़ाके अफगानिस्तान में सक्रिय रहे। यही कारण है कि पाकिस्तान की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकीं।

पाकिस्तान में क्यों बढ़ रहे आतंकी हमले?

हाल के वर्षों में—

  • खैबर पख्तूनख्वा
  • बलूचिस्तान
  • उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्र

लगातार हिंसा से प्रभावित रहे हैं। इन इलाकों में सुरक्षा बलों, पुलिस चौकियों और सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं।

बलूचिस्तान बना दूसरी बड़ी चुनौती

पाकिस्तान केवल TTP से ही नहीं जूझ रहा। बलूचिस्तान में सक्रिय अलगाववादी संगठन भी—

  • सुरक्षा बलों
  • सैन्य ठिकानों
  • चीन समर्थित परियोजनाओं

को निशाना बना रहे हैं। इससे पाकिस्तान की सुरक्षा चुनौतियां कई गुना बढ़ गई हैं।

अफगान शरणार्थियों पर सख्ती

सुरक्षा स्थिति बिगड़ने के बाद पाकिस्तान ने बड़ी संख्या में अफगान नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की।

रिपोर्टों के अनुसार—

  • लाखों अफगान नागरिकों को देश छोड़ने के निर्देश दिए गए।
  • कई लोगों के दस्तावेज अमान्य घोषित किए गए।
  • बैंक खाते और अन्य सुविधाएं भी प्रभावित हुईं।

इस कदम की अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने आलोचना भी की है।

भारत के लिए क्या मायने?

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर बढ़ता दबाव उसके सुरक्षा संसाधनों को विभाजित कर रहा है। हालांकि भारत के लिए सतर्क रहना अब भी जरूरी है, क्योंकि सीमा पार आतंकवाद से जुड़े खतरे पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।

अमेरिका और चीन की चिंता

पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता बनी हुई है।

  • अमेरिका लगातार आतंकवादी ढांचे के खिलाफ कठोर कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर देता रहा है।
  • चीन भी अपनी परियोजनाओं और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहा है।

सबसे बड़ा सबक

सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि आतंकवाद को ‘अच्छा’ और ‘बुरा’ जैसी श्रेणियों में बांटना अंततः किसी भी देश के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। जब किसी उग्रवादी समूह को रणनीतिक उद्देश्य से संरक्षण दिया जाता है, तो समय के साथ वही समूह नियंत्रण से बाहर भी हो सकता है। कराची हमले और उसके बाद पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच बढ़े सैन्य तनाव ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि आतंकवाद का इस्तेमाल रणनीतिक साधन के रूप में कितना जोखिम भरा हो सकता है। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी प्रकार के उग्रवादी नेटवर्क को अल्पकालिक रणनीतिक लाभ के लिए बढ़ावा देना लंबे समय में उसी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है।

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Tags: #Crackdown on Afghan refugees #Security situation #Action against Afghan nationals#Pakistan is getting entangled in the web of terrorism
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