दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 2026 का नतीजा कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI के लिए बड़ा झटका है। केंद्रीय पैनल की चारों सीटों में NSUI एक भी पद नहीं जीत सकी। अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पद पर ABVP ने जीत दर्ज की, जबकि उपाध्यक्ष पद पर पूर्व NSUI सदस्य और निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने जीत हासिल की। लेकिन इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश सिर्फ ABVP की तीन सीटों की जीत नहीं, बल्कि NSUI के भीतर टिकट, संगठन और जमीनी पकड़ को लेकर उठे सवाल हैं। खास तौर पर दीपांशु शौकीन की जीत ने इस बहस को और धार दी है। हालांकि, कन्हैया कुमार को लेकर राहुल गांधी की नाराजगी, समीक्षा बैठक में फटकार या उन्हें हटाए जाने की संभावना से जुड़े दावे फिलहाल रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से हैं। इसलिए इन्हें स्थापित तथ्य के बजाय दावे और राजनीतिक चर्चा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
1. टिकट का फैसला संगठन के खिलाफ क्यों गया?
उपाध्यक्ष पद पर दीपांशु शौकीन ने 30,615 वोट हासिल किए, जबकि ABVP के इशू मौर्य को 16,910 और NSUI के वीर चतरथ को सिर्फ 4,313 वोट मिले। यानी दीपांशु ने NSUI प्रत्याशी से करीब सात गुना ज्यादा वोट हासिल किए। दीपांशु पहले NSUI से जुड़े रहे थे और टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय मैदान में उतरे। यही परिणाम अब NSUI के टिकट वितरण और उम्मीदवार चयन पर सबसे बड़ा सवाल बन गया है। सवाल यह है कि जिस छात्र नेता के पास इतना मजबूत व्यक्तिगत समर्थन था, उसे संगठन का आधिकारिक टिकट क्यों नहीं मिला?
2. क्या NSUI ने जमीन की नब्ज पढ़ने में गलती की?
अध्यक्ष पद पर मुकाबला जरूर करीबी रहा, लेकिन NSUI के विजय शंकर मीणा को 22,523 वोट मिले और ABVP के यश डबास ने 24,576 वोट लेकर जीत हासिल की। अंतर 2,053 वोट का रहा। लेकिन बाकी पदों पर NSUI की स्थिति कमजोर रही। सचिव पद पर ABVP की रिया छावड़ी को 21,650 और NSUI की नम्रता चौधरी को 14,869 वोट मिले। संयुक्त सचिव पद पर भी NSUI तीसरे स्थान पर रही। इससे एक सवाल निकलता है—क्या राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक नैरेटिव और विश्वविद्यालय के स्थानीय छात्र मुद्दों के बीच NSUI पर्याप्त तालमेल नहीं बना सकी?
3. दीपांशु की जीत ने क्या संदेश दिया?
दीपांशु शौकीन की जीत इस चुनाव का सबसे बड़ा उलटफेर रही। हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, 17 साल बाद कोई निर्दलीय उम्मीदवार DUSU के केंद्रीय पैनल में पहुंचा है। उनकी पृष्ठभूमि भी चर्चा में रही। वह DTC बस कंडक्टर के बेटे हैं और छात्र मुद्दों, खासकर हॉस्टल और सुरक्षा जैसे विषयों को अपने अभियान में प्रमुखता से उठाते रहे। यही वजह है कि उनकी जीत को केवल NSUI के खिलाफ वोट के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। यह व्यक्तिगत उम्मीदवार की अपील बनाम संगठन की पहचान के सवाल को भी सामने लाती है।
4. क्या कन्हैया कुमार की भूमिका पर समीक्षा होना तय है?
कन्हैया कुमार NSUI के प्रभारी हैं, इसलिए संगठन के चुनावी प्रदर्शन पर उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन उन्हें ‘हीरो से विलेन’ घोषित करना अभी राजनीतिक निष्कर्ष होगा। मीडिया रिपोर्टों में राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल के बीच DUSU परिणामों को लेकर चर्चा तथा उसके बाद समीक्षा बैठक के दावे सामने आए हैं। इन दावों की स्वतंत्र सार्वजनिक पुष्टि सीमित है। इसलिए फिलहाल इतना कहना ज्यादा उचित है कि DUSU के नतीजों ने NSUI नेतृत्व के सामने रणनीति और उम्मीदवार चयन की समीक्षा की जरूरत जरूर खड़ी कर दी है।
5. क्या DUSU का परिणाम कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक संकेत है?
DUSU चुनाव का परिणाम कांग्रेस के छात्र संगठन के लिए निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे सीधे राष्ट्रीय राजनीति या आगामी विधानसभा चुनावों के जनादेश के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा। DUSU का चुनाव विश्वविद्यालय के छात्रों, स्थानीय मुद्दों और छात्र संगठनों के समीकरण पर आधारित होता है। इस चुनाव में 40.46 प्रतिशत मतदान हुआ। ABVP ने चार में से तीन केंद्रीय पद जीते और निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष पद अपने नाम किया।
असली कहानी क्या है?
डूसू का फैसला NSUI के लिए तीन स्तरों पर चुनौती लेकर आया है—उम्मीदवार चयन, संगठन की जमीनी पकड़ और बागी उम्मीदवारों को संभालने की क्षमता। सबसे दिलचस्प तथ्य यही है कि NSUI से टिकट नहीं पाने वाले एक पूर्व सदस्य ने निर्दलीय लड़कर उपाध्यक्ष पद पर 30 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए, जबकि आधिकारिक NSUI प्रत्याशी 4,313 वोट पर सिमट गया। इसलिए कन्हैया कुमार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल सिर्फ हार का नहीं, बल्कि हार के कारण की पहचान और संगठन को फिर से जमीन से जोड़ने की रणनीति का है। आने वाले दिनों में कांग्रेस नेतृत्व की समीक्षा और NSUI में होने वाले संगठनात्मक फैसले यह बताएंगे कि इस नतीजे को नेतृत्व किस रूप में लेता है।





