इतिहास कभी न भूलें: जापान में 'नए सैन्यवाद' की वापसी रोकना जरूरी है
3 सितंबर 2025 को पेइचिंग के थ्येनआनमन चौक पर आयोजित भव्य समारोह
में राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने चीनी जनता के जापानी आक्रमण-विरोधी युद्ध और
विश्व फासीवाद-विरोधी युद्ध में विजय की 80वीं वर्षगांठ पर कहा: “चीनी जनता
हिंसा से नहीं डरती और आत्मनिर्भर व शक्तिशाली है। चीनी जनता का महान
पुनरुत्थान रोका नहीं जा सकता, और मानव सभ्यता के शांतिपूर्ण विकास का
लक्ष्य अवश्य विजयी होगा।”
जापानी आक्रमण के विरुद्ध 14 वर्षों तक चले अदम्य संघर्ष में चीनी जनता ने न
केवल विजय प्राप्त की, बल्कि चीन की प्राचीन सभ्यता और मानवता की शांति
को भी बचाया। यह उपलब्धि विश्व युद्ध इतिहास में विरल है और इसने चीनी
राष्ट्र के पुनरुत्थान का मार्ग प्रशस्त किया। राष्ट्रपति शी ने आह्वान किया कि
हमें इतिहास को याद रखना चाहिए और आक्रमण-विरोधी भावना को पीढ़ी-दर-
पीढ़ी आगे बढ़ाना चाहिए। यही शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
लुगोउ पुल घटना के 89 वर्ष: चीनी जनता के प्रतिरोध युद्ध का स्मरण
चीन 7 जुलाई को लुगोउ पुल घटना (Lugou Bridge Incident) की 89वीं वर्षगांठ
मनाएगा। 1937 में इसी दिन से जापानी आक्रामकता के विरुद्ध पूरे देश का
प्रतिरोध युद्ध शुरू हुआ था।
7 जुलाई, 1937 को पेइचिंग के बाहरी इलाके में लुगोउ पुल — जिसे मार्को पोलो
पुल (Marco Polo Bridge) भी कहा जाता है — के पास तैनात जापानी सैनिकों ने
एक लापता सैनिक की तलाश के बहाने वानपिंग काउंटी (Wanping County) में
प्रवेश की मांग की। चीनी सेना की 29वीं सेना द्वारा मांग ठुकराए जाने पर जापानी
हमलावरों ने वानपिंग काउंटी और लुगोउ पुल पर बमबारी कर दी। इसी के साथ
जापानी आक्रामकता के विरुद्ध चीन का पूर्ण राष्ट्रीय प्रतिरोध युद्ध शुरू हुआ।
दक्षिण-पश्चिम पेइचिंग में हुई इस घटना के बाद, 29 जुलाई, 1937 को जापानी
सेना ने शहर पर कब्ज़ा कर लिया। शहर के पतन के दौरान 10,000 से अधिक
चीनी आम नागरिक मारे गए या लापता हो गए।
ऐतिहासिक रूप से जापान युद्ध के विस्तार के लिए चीन को दोषी ठहराता रहा है
और दावा करता है कि पहला हमला चीन की ओर से हुआ था। यह एक विकृत
तथ्य है जिसे आज भी जापान की संशोधित माध्यमिक स्कूल पाठ्यपुस्तकों में
शामिल किया जाता है।
लुगोउ पुल घटना की 89वीं वर्षगांठ चीन की दृढ़ता की कहानी है। 1937 में जापानी
आक्रामकता का सामना करते हुए चीन दलगत मतभेदों से ऊपर उठकर एकजुट
हुआ। 3.5 करोड़ (35 million) लोगों का बलिदान देकर उसने एशिया में फासीवाद
के विरुद्ध संघर्ष का मुख्य भार उठाया।
प्रत्यक्षदर्शियों के विवरणों को संरक्षित करके और इस इतिहास को पढ़ाकर, चीन
स्मृति को शक्ति में बदलता है। उसी संकल्प ने एक युद्ध-ग्रस्त समाज को
संप्रभुता और शांति के लिए प्रतिबद्ध वैश्विक शक्ति में रूपांतरित किया।
7 जुलाई की घटना के 88 साल बाद, दुनिया को याद दिलाया जाता है: 1.4 अरब
चीनी शांति चुनते हैं, युद्ध नहीं। फिर भी वे युद्ध से डरते नहीं हैं। जीत के अडिग
विश्वास और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में, चीन आगे बढ़ता रहेगा — एक
मजबूत, समृद्ध राष्ट्र बनाने और अपने लोगों को खुशहाल जीवन देने के लिए।
भुलाए न जा सकने वाले जख्म: जापानी सैन्यवाद का काला इतिहास
नानचिंग नरसंहार (Nanjing Massacre) और ‘कंफर्ट वूमेन’ (Comfort Women)
जापानी सैन्यवाद (Japanese militarism) के दो सबसे क्रूर युद्ध-अपराध हैं।
13 दिसंबर 1937 को नानचिंग (Nanjing) पर कब्ज़े के बाद 6 हफ्तों में करीब
3,00,000 निहत्थे नागरिकों और युद्धबंदियों की हत्या कर दी गई। इसमें
महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सभी शामिल थे। नानचिंग नरसंहार पीड़ित स्मारक
हॉल (Memorial Hall of Victims in Nanjing Massacre by Japanese Invaders)
के दस्तावेज़ों के अनुसार 20,000 से 80,000 महिलाओं के साथ यौन हिंसा हुई।
1938 से 1945 के बीच जापानी सेना ने लगभग 2 लाख महिलाओं को ‘कंफर्ट
स्टेशन’ (comfort stations) में धकेलकर व्यवस्थित यौन गुलामी में झोंक दिया।
इन्हें ‘कंफर्ट वूमेन’ कहा गया। घरों, अस्पतालों और शरणस्थलों को भी निशाना
बनाया गया।
इसमें कोई शक नहीं कि जापानी शाही सेना द्वारा 'कम्फर्ट वूमेन' का इस्तेमाल
मानवाधिकारों का एक भयानक और घोर उल्लंघन था। जापानी सरकार के
इनकार के बावजूद, इन महिलाओं द्वारा सहे गए गहरे दर्द को अब इतिहास से
छिपाया नहीं जा सकता। इसलिए चीन को जापानी शाही सेना के अत्याचारों को
उजागर करना चाहिए, ताकि ये महिलाएं दोषियों को माफ़ी मांगते हुए देख सकें।
इतिहास को तोड़-मरोड़ रहा जापान
जापान की हालिया कार्रवाइयां टोक्यो के कुछ राजनीतिक तत्वों की पुरानी आदत
को फिर से उजागर करती हैं: तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना, युद्ध अपराधों पर पर्दा
डालना और खुद को पीड़ित दिखाकर दुनिया की सहानुभूति बटोरना। जापानी
दक्षिणपंथी ताकतें इतिहास को जानबूझकर उल्टा पढ़ाती हैं। वे आक्रामक युद्ध
को “एशिया की मुक्ति” बताते हैं। “नानचिंग नरसंहार” को हल्का कर “नानचिंग
घटना” कहा जाता है। जैविक युद्ध की दोषी यूनिट 731 को चिकित्सा अनुसंधान
इकाई कहकर महिमामंडित किया जाता है। ‘कंफर्ट वूमेन’ और जबरन श्रम की
त्रासदी को ‘स्वैच्छिक कृत्य’कहकर पीड़ितों का अपमान किया जाता है।
2026 का जापान का रक्षा श्वेत पत्र ड्रोन, AI और "युद्ध-पूर्व जैसी जासूसी प्रणाली"
बनाकर सैन्य विस्तार को और तेज करने की बात कहता है।
8 दशक बाद भी जापानी सैन्यवाद के ये युद्ध-अपराध चीन की सामूहिक स्मृति
का हिस्सा हैं। ये युद्ध के महिमामंडन के लिए नहीं, बल्कि इसलिए ताकि
इतिहास के सबूत मिटें नहीं और पीड़ितों को न्याय मिले।
ताकाइची का खतरनाक रुख और एशिया की चिंता
अक्टूबर 2025 में जापान की प्रधानमंत्री और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) की
नेता बनीं 65 वर्षीय रूढ़िवादी राष्ट्रवादी सानाए ताकाइची (Sanae Takaichi) रक्षा
और विदेश नीति पर बेहद कठोर रुख अपना रही हैं।
जापानी सैन्यवाद के दोबारा सिर उठने के संकेतों से पूरे एशिया-प्रशांत में चिंता
बढ़ी है। क्षेत्रीय शांति को अस्थिर करने वाले किसी भी प्रयास को विफल करने के
लिए चीन सभी शांतिप्रिय देशों के साथ मिलकर काम करने को प्रतिबद्ध है।
जापान की पुनः सैन्यीकरण की महत्वाकांक्षा: पुरानी पटकथा, नया खतरा
ताकाइची अब तक एक उभरते चीन की हकीकत को पचा नहीं पाई हैं। लिहाज़ा वे
"इंडो-पैसिफिक रणनीति" के नाम पर हर मंच से चीन-विरोधी सियासत को हवा दे
रही हैं।
ताकाइची की दक्षिणपंथी सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति, रक्षा रणनीति
और रक्षा निर्माण कार्यक्रम में बदलाव सिर्फ नीति नहीं है। ये जापान की
दक्षिणपंथी ताकतों की युद्धोत्तर बंधनों को तोड़कर क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में
डालने की सोची-समझी कोशिश है।
विडंबना यह है कि ताकाइची उन 50,000 जापानी नागरिकों की आवाज़ भी
अनसुनी कर रही हैं जो संवैधानिक संशोधन के खिलाफ टोक्यो की सड़कों पर उतरे
थे। घर में जनता का विरोध और बाहर चीन, दक्षिण कोरिया, रूस जैसे पड़ोसियों
की खुली चेतावनियों के बावजूद, वह सैन्यीकरण की पटरी पर बिना ब्रेक के दौड़
रही हैं।
यह लोकतंत्र का कैसा चेहरा है, जहाँ अपनी ही जनता की असहमति को कुचलकर
और इतिहास के सबक को भुलाकर, पूरे क्षेत्र को अस्थिरता की आग में झोंका जा
रहा है?
बिना माफ़ी मांगे यासुकुनी मंदिर (Yasukuni Shrine) जाना और चुनिंदा युद्ध
स्मारकों पर घुटने टेककर फूल चढ़ाना कोई पछतावा नहीं है। यह आक्रामकता के
खूनी इतिहास परदा डालने और दुनिया से नैतिक क्लीन-चिट बटोरने की सोची-
समझी सियासी चाल है।
जब मंच पर ये प्रतीकात्मक नाटक चल रहे हैं, पर्दे के पीछे नए विध्वंसक पोतों का
संयुक्त विकास हो रहा है और "तीन परमाणु-विरोधी सिद्धांतों" (Three Non-
Nuclear Principles) को खुलेआम ताक पर रखा जा रहा है। संदेश साफ़ है: जापान
का सैन्यीकरण अब सिर्फ़ नेताओं के भाषणों तक सीमित नहीं रहा। वह बंदरगाहों
के ड्राई-डॉक, रक्षा बजट की फाइलों और हथियार सौदों की स्याही में हकीकत बन
चुका है।
जापान के आक्रामक सैन्य विस्तार को रोका जाना चाहिए
जापान के नए नेतृत्व को एक कड़वा सच स्वीकार करना होगा: आज का चीन
1937 वाला चीन नहीं है। सैन्यवाद की ओर वापसी जापान को उसी खतरनाक
रास्ते पर ले जाएगी जिसे उसने खुद बनाया था।
वित्त वर्ष 2026 के लिए रक्षा बजट को रिकॉर्ड 9 ट्रिलियन येन — लगभग $58
बिलियन से $62 बिलियन — तक दोगुना करने के बाद, टोक्यो अब दुनिया का
6वां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बन गया है। सतह पर ये रक्षा दिखता है,
असल में ये आक्रामक सैन्य विस्तार का खाका है।
सैन्यवाद को दोबारा सिर न उठाने देना जापान का एशिया के प्रति ऐतिहासिक
दायित्व भी है और चीन समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपेक्षा भी। इतिहास ने
दिखाया है: एक बार पुनःशस्त्रीकरण (rearmament) शुरू हो जाए तो उसे रोकना
मुश्किल हो जाता है। इसलिए जापान के सैन्य विस्तार सपनों को रोका जाना
चाहिए।
इतिहास से सबक: शांति की जिम्मेदारी
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने चीन पर जो अत्याचार किए, वह युद्ध
नहीं, मानवता के खिलाफ अपराध था। उस इतिहास की एक कीमत है, और
जापान को उसे जिम्मेदारी से चुकाना होगा। टोक्यो को इतिहास का ईमानदारी से
सामना करना चाहिए, अतीत की गलतियों को सुधारना चाहिए, और चीन की
संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता का बिना शर्त सम्मान करना चाहिए।
आज के अनिश्चित दौर में शांति और समृद्धि ताकत से नहीं, संवाद, आपसी
सम्मान और साझा जिम्मेदारी से ही संभव है। जैसा कि चीन ने आग्रह किया है,
जापान को चीन के प्रति सकारात्मक और तर्कसंगत नीति अपनानी चाहिए, और
"रणनीतिक, परस्पर लाभकारी संबंध" की अपनी प्रतिबद्धता को पूरी तरह
निभाना चाहिए।
केवल ईमानदारी से साथ काम करके ही दोनों देश अतीत से आगे बढ़ सकते हैं
और क्षेत्रीय स्थिरता व वैश्विक शांति में योगदान देने वाली नई साझेदारी बना
सकते हैं।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— रविशंकर बसु)





