नेपाल की प्रलयंकारी बाढ़ के बाद लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है। कुछ लोग मौत को मात देकर वापस लौट रहे हैं तो कुछ को अभी भी अपनों का इंतजार है। इस बीच कुछ पीड़ित ऐसे भी हैं जो अपने गुम परिजन का अंतिम संस्कार कर रहे हैं। लेकिन बड़ी बात ये है कि ये लोग परिजनों का संस्कार पुतले बनाकर कर रहे हैं, इसके पीछे की वजह जानकर आप चौंक जाएंगे।
पुतले बनाकर कर रहे हैं अंतिम संस्कार
नेपाल में लोग अपने परिजनों के पुतले बनाकर अंतिम संस्कार कर रहे हैं। दरअसल, अपनों की वापसी की आस खत्म होने और अभी तक उनके पार्थिव शरीर नहीं मिलने के कारण यह माना जा रहा है कि वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। बाढ़ के साथ आया मलबा और गाद कई इलाकों में 20 से 30 फीट तक जमा हो चुकी है। दुकानें और मकान तबाह हो चुके हैं और जमीन के कई फीट ऊपर अब सिर्फ गाद और दलदल दिखाई दे रहा है। ऐसे हालात में लोगों को अपनों के जीवित मिलने की उम्मीद के साथ उनके पार्थिव शरीर मिल पाने की संभावना भी कम होती जा रही है। इसी वजह से कुछ परिवार पुतलों के जरिए अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी कर रहे हैं।
धार्मिक किताबों में है इस तरह के अंतिम संस्कार का जिक्र
इस तरह पुतले बनाकर अंतिम संस्कार करने का जिक्र कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। महेश्वर राज राजेश्वर मंदिर के पंडित संतोष पंड्या के अनुसार, पुतले के जरिए अंतिम संस्कार करना धार्मिक ग्रंथों में वर्णित विधि के अनुसार माना गया है। इसका उल्लेख अंत्येष्टि कर्म पद्धति, प्रेत मंजरी और धर्मसिंधु में मिलता है। इसमें केवल पुतले का अंतिम संस्कार ही नहीं किया जाता, बल्कि इसके बाद होने वाले अन्य कर्मकांड भी पूरे किए जाते हैं। पिंडदान, दशगात्र, वार्षिक श्राद्ध और तेरहवीं संस्कार जैसी धार्मिक प्रक्रियाएं भी पूरी की जाती हैं।
परिजनों को मुक्ति मिल सके
पुतले के अंतिम संस्कार के पीछे एक प्रमुख धार्मिक मान्यता यह भी है कि इससे दिवंगत परिजन की आत्मा को मुक्ति मिल सके। मान्यता के अनुसार, अंतिम संस्कार और उससे जुड़े कर्मकांड पूरे होने से आत्मा को जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त होती है। ऐसी धार्मिक धारणाओं में यह भी माना जाता है कि यदि अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी न हो तो आत्मा को शांति नहीं मिलती और वह प्रेत योनि में चली जाती है।
26 अगस्त को आई थी नेपाल की त्रासदी
26 अगस्त 2026 को नेपाल में बेहद विनाशकारी प्राकृतिक त्रासदी सामने आई। हिमालयी क्षेत्र के लांगतांग इलाके में ग्लेशियर टूटने के कारण भोटेकोशी और त्रिशूली नदी घाटियों में अचानक बाढ़ और मलबे का तेज बहाव आया। लांगतांग लिरुंग के पास करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर की बर्फ और चट्टान का लगभग 600 मीटर चौड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरने का दावा किया गया है। इसके बाद भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान, पानी और मलबे के बहाव ने निचले इलाकों में तबाही मचा दी।
भूकंपीय झटकों से लेकर बड़े पैमाने पर लापता लोग
इस ग्लेशियर टूटने का प्रभाव इतना तेज बताया गया कि दुनियाभर के सीस्मोमीटरों पर 5.2 तीव्रता के भूकंपीय झटके दर्ज किए गए। नेपाल और तिब्बत सीमा क्षेत्र को मिलाकर 1,250 से अधिक लोगों के जान गंवाने की पुष्टि का दावा किया गया है, जबकि 4,500 से अधिक लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। इनमें जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले श्रमिक और विदेशी पर्यटक भी शामिल हैं। इस बीच राहत और बचाव दल लगातार प्रभावित इलाकों में लोगों की तलाश और सहायता में जुटे हुए हैं।