दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव में नरक चतुर्दशी का विशेष धार्मिक और पौराणिक महत्व है। इसे छोटी दीपावली, रूप चौदस और रूप चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर शरीर पर तेल और उबटन लगाकर स्नान करने की परंपरा है। इस स्नान को अभ्यंग स्नान कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन अभ्यंग स्नान करने से रूप-सौंदर्य, आरोग्य और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर के वध से भी जुड़ा है। मान्यता है कि नरकासुर के अत्याचारों से परेशान देवताओं और लोगों को भगवान कृष्ण ने मुक्ति दिलाई थी। इसी विजय की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है। शाम को यमराज के नाम दीपदान करने की भी परंपरा है। आइए जानते हैं इस दिन की कथा, पूजा-पाठ, अभ्यंग स्नान और यम दीप जलाने की पूरी विधि।
रूप चौदस क्यों कहते हैं, अभ्यंग स्नान की क्या है मान्यता?
नरक चतुर्दशी को रूप चौदस इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन शरीर पर तेल और उबटन लगाकर स्नान करने की परंपरा है। सुबह जल्दी उठकर तिल के तेल से शरीर की मालिश की जाती है। इसके बाद बेसन, हल्दी और सुगंधित सामग्री से बने उबटन को शरीर पर लगाया जाता है और स्नान किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस विधि से शरीर की अशुद्धियां दूर होती हैं और व्यक्ति को सुंदरता तथा आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है। कुछ परंपराओं में स्नान के समय अपामार्ग यानी चिरचिटा के पौधे की टहनी सिर के ऊपर घुमाने की भी मान्यता है।
नरकासुर वध की पौराणिक कथा, भगवान कृष्ण ने कैसे दिलाई मुक्ति?
पौराणिक कथा के अनुसार नरकासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर प्राग्ज्योतिषपुर का राजा था। उसने अपनी शक्ति के अहंकार में देवताओं और लोगों को परेशान करना शुरू कर दिया था। उसने कई राजकुमारियों को बंदी बना लिया था। उसके अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी। इसके बाद भगवान कृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ नरकासुर के विरुद्ध युद्ध करने पहुंचे। भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध कर बंदी बनाई गई राजकुमारियों को मुक्त कराया। इसी विजय को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में याद किया जाता है। इसी कारण इस तिथि को नरक चतुर्दशी कहा जाता है।
नरक चतुर्दशी पर अभ्यंग स्नान कैसे करें?
इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान की तैयारी की जाती है। सबसे पहले शरीर पर तिल का तेल लगाकर हल्के हाथों से मालिश करें। इसके बाद बेसन, हल्दी और सुगंधित सामग्री से तैयार उबटन लगाएं। कुछ देर बाद गुनगुने पानी से स्नान करें। स्नान के बाद साफ कपड़े पहनकर भगवान का स्मरण करें। मान्यता है कि इस दिन अभ्यंग स्नान करने से नरक के भय से मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मकता आती है। हालांकि, स्नान की परंपरा और सामग्री अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों में अलग हो सकती है।
इस दिन किसकी पूजा की जाती है?
नरक चतुर्दशी पर भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण और पूजन किया जाता है। इसके साथ ही यमराज के निमित्त तर्पण और दीपदान की परंपरा भी है। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थान पर दीपक जलाएं। भगवान कृष्ण को फूल और फल अर्पित करें तथा धूप-दीप दिखाकर प्रार्थना करें। कई परिवारों में इस दिन भगवान गणेश और माता लक्ष्मी का स्मरण भी किया जाता है। पूजा के दौरान परिवार की सुख-शांति और आरोग्य की कामना की जाती है।
यमराज के नाम का दीपक कैसे जलाएं?
नरक चतुर्दशी की शाम को यमराज के नाम दीपदान किया जाता है। इसके लिए मिट्टी का दीपक लेकर उसमें तेल और चार बातियां लगाई जाती हैं। दीपक जलाकर घर के बाहर रखा जाता है। कुछ परंपराओं में इसे मुख्य द्वार के पास रखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यम दीप जलाने से परिवार पर यमराज की कृपा बनी रहती है और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। दीपदान की दिशा और विधि में क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अंतर हो सकता है, इसलिए अपने परिवार की परंपरा या स्थानीय पुरोहित के निर्देशों का पालन करना उचित है। इस तरह नरक चतुर्दशी केवल दीप जलाने का पर्व नहीं, बल्कि भगवान कृष्ण की विजय, स्वच्छता, आरोग्य और परिवार की मंगलकामना से जुड़ा त्योहार है। अभ्यंग स्नान से दिन की शुरुआत और शाम को यम दीपदान के साथ इस पर्व की परंपराएं पूरी की जाती हैं।