महिला आरक्षण बनाम परिसीमन—‘हिस्सा चोरी’ के आरोपों के बीच 850 सीटों का नया राजनीतिक गणित
राहुल गांधी का केंद्र पर बड़ा आरोप
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि महिला आरक्षण के नाम पर असली खेल परिसीमन का है। उनका कहना है कि महिला आरक्षण विधेयक पहले ही 2023 में संसद से पारित हो चुका है और अब इसे नए तरीके से पेश करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने केंद्र के प्रस्तावित कदम को “हिस्सा चोरी” करार देते हुए आरोप लगाया कि सरकार परिसीमन और निर्वाचन क्षेत्रों में फेरबदल के जरिए सत्ता संतुलन बदलने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस का स्पष्ट रुख—महिला आरक्षण के समर्थन में
कांग्रेस पार्टी ने साफ किया है कि वह महिला आरक्षण के मुद्दे पर पूरी तरह समर्थन में है। राहुल गांधी ने कहा कि 2023 में संसद ने सर्वसम्मति से महिला आरक्षण कानून को पारित किया था, जो अब संविधान का हिस्सा है। ऐसे में मौजूदा प्रस्ताव को महिला सशक्तिकरण से जोड़ना भ्रामक है। उनका दावा है कि यह नया प्रस्ताव असल में राजनीतिक लाभ लेने के लिए लाया जा रहा है, न कि महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए।
‘हिस्सा चोरी’ का क्या है आरोप
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार ओबीसी, दलित और आदिवासी समुदायों के अधिकारों को नजरअंदाज कर रही है। उन्होंने कहा कि जातिगत जनगणना के आंकड़ों को दरकिनार कर सीटों का पुनर्वितरण करना इन वर्गों के साथ अन्याय होगा। साथ ही उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि दक्षिण भारत, उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम और छोटे राज्यों के साथ किसी तरह का भेदभाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम और नई रणनीति
2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया गया था। हालांकि, इसे लागू करने को परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया से जोड़ा गया था। अब सरकार इस अधिनियम में संशोधन कर 2029 के आम चुनाव से पहले इसे लागू करने की योजना बना रही है, जिससे यह मुद्दा फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है।
परिसीमन से अलग करने की तैयारी
सूत्रों के अनुसार, सरकार एक संवैधानिक संशोधन के जरिए महिला आरक्षण को परिसीमन प्रक्रिया से अलग करने पर विचार कर रही है। इसका मतलब यह होगा कि 2027 की जनगणना और परिसीमन के इंतजार के बिना ही आरक्षण लागू किया जा सके। सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं को जल्द प्रतिनिधित्व मिलेगा, लेकिन विपक्ष इसे राजनीतिक रणनीति के तौर पर देख रहा है।
850 सीटों वाली लोकसभा का प्रस्ताव
सबसे बड़ा बदलाव लोकसभा की सीटों की संख्या को लेकर प्रस्तावित है। मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 तक करने की योजना पर विचार किया जा रहा है। इसमें लगभग 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए तय की जा सकती हैं। यह प्रस्ताव लागू होता है तो भारत की संसदीय राजनीति का पूरा ढांचा बदल सकता है और प्रतिनिधित्व का नया समीकरण सामने आ सकता है।
क्या बदलेगा राजनीतिक समीकरण
लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने से ज्यादा आबादी वाले राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिल सकता है, जिससे राजनीतिक ताकत का संतुलन बदल सकता है। यही कारण है कि दक्षिण और छोटे राज्यों को अपने प्रभाव में कमी का डर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव सिर्फ सीटों का विस्तार नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाला कदम साबित हो सकता है।
महिला सशक्तिकरण या सियासी रणनीति?
पूरे विवाद के केंद्र में यही सवाल है कि क्या यह पहल वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए है या इसके पीछे राजनीतिक लाभ की रणनीति छिपी है। जहां सरकार इसे ऐतिहासिक सुधार बता रही है, वहीं विपक्ष इसे सत्ता विस्तार का माध्यम मान रहा है।
आगे की राह—सहमति या टकराव
आने वाले दिनों में संसद में इस मुद्दे पर तीखी बहस होने की संभावना है। अगर सभी दलों के बीच सहमति बनती है तो यह भारतीय लोकतंत्र में ऐतिहासिक बदलाव हो सकता है। लेकिन अगर मतभेद गहराते हैं, तो महिला आरक्षण और परिसीमन का यह मुद्दा आने वाले चुनावों में बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है





