ब्रह्मांड में जीवन कैसे विकसित हुआ और हमारी पृथ्वी जैसी दुनिया कैसे बनी, इन सवालों के जवाब तलाश रहे वैज्ञानिकों को एक अहम सफलता मिली है। खगोलविदों ने एलियास 2-24 बी नाम के ऐसे ग्रह की पुष्टि की है, जिसकी उम्र दस लाख वर्ष से भी कम मानी जा रही है। बृहस्पति के आकार का यह ग्रह अभी भी उस गैस और धूल से घिरा है, जिससे इसका निर्माण हुआ। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे ग्रहों के जन्म की प्रक्रिया समझने का एक दुर्लभ अवसर मान रहे हैं।
दस लाख साल से भी कम उम्र
यह ग्रह पृथ्वी से लगभग 450 प्रकाश वर्ष दूर स्थित एक युवा तारे की परिक्रमा कर रहा है। इसकी सबसे खास बात इसका आकार ही नहीं, बल्कि वह दूरी भी है, जिस पर यह अपने तारे से मौजूद है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह दूरी पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी से लगभग 55 गुना है। मौजूदा सिद्धांतों के मुताबिक, इतनी दूर बृहस्पति जैसे विशाल ग्रह का इतनी जल्दी बन जाना आसान नहीं होना चाहिए।
यहीं से वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। क्या ग्रहों के निर्माण की मौजूदा गणनाओं में कुछ प्रक्रियाएं छूट रही हैं? क्या गैस, धूल और चट्टानी पदार्थों के इकट्ठा होने की गति हमारी अब तक की समझ से कहीं अधिक तेज हो सकती है? एलियास 2-24 बी की खोज इन सवालों पर नए सिरे से विचार करने का अवसर दे रही है।
दस साल पुराना रहस्य सुलझा
इस ग्रह की कहानी करीब एक दशक पुरानी है। पहले चिली में स्थित अटाकामा लार्ज मिलीमीटर/सबमिलीमीटर एरे ने इसके तारे के आसपास मौजूद धूल भरी डिस्क में एक खाली क्षेत्र देखा था। बाद में यूरोपीय दक्षिणी वेधशाला के विशाल दूरबीन उपकरण ने उसी क्षेत्र में प्रकाश का एक धुंधला बिंदु दर्ज किया। वैज्ञानिकों के सामने सवाल था कि यह वास्तव में कोई ग्रह है या दूर स्थित कोई अन्य खगोलीय वस्तु।
इसके बाद हवाई स्थित डब्ल्यू. एम. कीक वेधशाला के पुराने प्रेक्षणों का अध्ययन किया गया। वर्ष 2018 और 2020 के आंकड़ों की तुलना से वैज्ञानिकों को उस वस्तु की गति का पता चला। उसके व्यवहार ने इस संभावना को मजबूत किया कि वह अपने तारे की परिक्रमा करने वाला ग्रह है, न कि दूर का कोई तारा या दूरबीन से पैदा हुई छवि की त्रुटि।
ग्रह बनते कैसे हैं?
वैज्ञानिकों के अनुसार, तारे गैस और धूल के विशाल बादलों से बनते हैं। नए तारे के आसपास बची सामग्री धीरे-धीरे एक चक्राकार डिस्क बनाती है। इसी सामग्री से छोटे खगोलीय पिंड विकसित होते हैं और समय के साथ ग्रहों का आकार लेते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान ग्रह आसपास की सामग्री को अपनी ओर खींच सकते हैं और डिस्क में खाली क्षेत्र बना सकते हैं।
लेकिन शुरुआती अवस्था में ग्रहों को देखना बेहद कठिन होता है। धूल और गैस उन्हें ढक लेते हैं, जबकि उनके तारे की तेज चमक छोटे ग्रहों की रोशनी को दबा देती है। इसी कारण अब तक खोजे गए अधिकांश बाह्य ग्रह अरबों वर्ष पुराने हैं। एलियास 2-24 बी जैसे युवा ग्रहों का अध्ययन इस कमी को दूर करने में मदद कर सकता है।
क्या बदलेंगे ग्रह निर्माण के सिद्धांत?
इस खोज का महत्व केवल एक नए ग्रह की पहचान तक सीमित नहीं है। यह वैज्ञानिकों को अपने कंप्यूटर
आधारित मॉडलों और ग्रह निर्माण से जुड़े सिद्धांतों की जांच करने का अवसर देती है। यदि विशाल ग्रह अपेक्षा से कम समय में और बहुत अधिक दूरी पर बन सकते हैं, तो वैज्ञानिकों को यह समझना होगा कि इस प्रक्रिया में कौन-से कारक अब तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुए हैं।
आगे चलकर नई पीढ़ी की दूरबीनें ऐसे युवा ग्रहों को पहचानने में मदद कर सकती हैं। इससे वैज्ञानिक ग्रहों के शुरुआती विकास की अलग-अलग अवस्थाओं का अध्ययन कर पाएंगे और यह समझ सकेंगे कि हमारा सौरमंडल अपने जन्म के समय कैसा रहा होगा। एलियास 2-24 बी की पुष्टि ग्रह निर्माण की हमारी समझ को चुनौती देती है, लेकिन यह अभी किसी सिद्धांत के पूरी तरह गलत साबित होने का प्रमाण नहीं है। यह एक महत्वपूर्ण संकेत है कि ब्रह्मांड में ग्रह बनने की प्रक्रिया हमारी मौजूदा समझ से कहीं अधिक जटिल हो सकती है।





