मध्यप्रदेश में मानसून का रफ्तार खोना अब कृषि और जल संसाधनों के लिए चिंता का विषय बन गया है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार, प्रदेश में अब तक सामान्य से करीब 3 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। पूर्वी मध्यप्रदेश में लगभग 17 प्रतिशत और पश्चिमी हिस्से में करीब 10 प्रतिशत वर्षा की कमी रिकॉर्ड की गई है। पिछले कई दिनों से अधिकांश क्षेत्रों में व्यापक बारिश नहीं होने के कारण आधे से अधिक इलाकों में सूखे जैसे हालात बनने लगे हैं।
- मानसून सुस्त, खेती पर बढ़ा संकट
- बारिश की कमी से खरीफ फसलें प्रभावित
- जलाशयों में कम पानी, बढ़ी चिंता
- दो-तीन दिन बाद सक्रिय हो सकता मानसून
- किसानों की नजर अगले मौसम तंत्र पर
बारिश की कमी का सबसे अधिक असर खरीफ फसलों पर पड़ रहा है। सोयाबीन, धान, मक्का सहित अन्य फसलों की बुवाई और शुरुआती वृद्धि प्रभावित होने लगी है। खेतों में नमी तेजी से घट रही है, जबकि जलाशयों, तालाबों और छोटे बांधों में भी अपेक्षित जलभराव नहीं हो पाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अगले एक सप्ताह में अच्छी बारिश नहीं हुई तो सिंचाई और पेयजल की समस्या भी गहरा सकती है।
मौसम विभाग ने अनूपपुर, बालाघाट, जबलपुर, रीवा, सागर, सतना, सिवनी, शहडोल, सीधी, सिंगरौली, विदिशा, रायसेन और अन्य जिलों में हल्की से मध्यम बारिश की संभावना जताई है। वहीं भोपाल, इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर, देवास, सीहोर, राजगढ़ और बुरहानपुर समेत कुछ जिलों में अपेक्षाकृत अधिक वर्षा हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन बौछारों से प्रदेशभर में वर्षा की कमी की भरपाई नहीं होगी।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार अगले दो से तीन दिनों तक भारी बारिश की संभावना कम है। इसके बाद बंगाल की खाड़ी में नया मौसम तंत्र बनने के संकेत हैं, जिसके सक्रिय होने पर मध्यप्रदेश में मानसून फिर जोर पकड़ सकता है। फिलहाल किसान, कृषि विभाग और प्रशासन सभी की निगाहें आगामी मौसम प्रणाली पर टिकी हैं, क्योंकि जुलाई के शेष दिनों की बारिश ही प्रदेश के कृषि उत्पादन और जल उपलब्धता की दिशा तय करेगी।