एमपी विधानसभा का मानसून सत्र: विधानसभा नहीं अब सिर्फ चर्चा का मंच… नारेबाजी पर रोक लगी तो भड़का विपक्ष, सत्ता पक्ष ने किया बचाव
मध्य प्रदेश विधानसभा मानसून सत्र 2025 का आगाज़
सत्र के पहले ही दिन विरोध-प्रदर्शन पर बैन से गरमाई सियासत
मध्य प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र आज सोमवार 28 जुलाई से शुरू हो गया है। इस सत्र के को लेकर अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने एक आदेश जारी किया है। उन्होंने आदेश जारी करते हुए कहा है कि सत्र के दौरान राज्य विधानसभा परिसर के अंदर विधायक किसी भी तरह का विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी नहीं कर सकेंगे। इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। स्पीकर ने नियम 94(2) के तहत यह निर्देश दिए हैं। यह निर्देश सभी विधायकों को विधानसभा परिसर के अंदर किसी भी प्रकार का विरोध प्रदर्शन करने अथवा नारेबाजी करने से रोकता है।
मध्य प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र आज सोमवार, 28 जुलाई से शुरू हो गया, लेकिन सत्र शुरू होते ही सियासत गरमा गई। विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के एक नए आदेश ने विपक्ष को चौकन्ना कर दिया है और सत्र की शुरुआत से पहले ही राजनीतिक घमासान छिड़ गया। अध्यक्ष ने आदेश जारी कर यह स्पष्ट कर दिया है कि इस बार के मानसून सत्र में राज्य विधानसभा के परिसर में कोई भी विधायक को किसी प्रकार के विरोध प्रदर्शन या नारेबाजी की अनुमति नहीं दी जाएगी।
विरोध पर प्रतिबंध… विपक्ष ने जताई आपत्ति
इस आदेश के सामने आते ही कांग्रेस ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। कांग्रेस ने इसे सीधे तौर पर लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला करार दिया। विपक्ष का कहना है कि इस प्रतिबंध से उनकी आवाज को दबाया जा रहा है और लोकतंत्र की भावना को ठेस पहुंचाई जा रही है। विपक्ष के उपनेता हेमंत कटारे ने इस आदेश को तानाशाहीपूर्ण और असंवैधानिक बताया। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा “अब तो मीडिया को बयान देने पर भी रोक लगाई जा रही है। अगर महात्मा गांधी और बाबा साहेब अंबेडकर के नारों को भी आपत्तिजनक समझा जा रहा है, तो क्या हम आपातकाल की ओर बढ़ रहे हैं? विधानसभा में आवाज उठाना अगर आपत्तिजनक बन गया है, तो फिर लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाएगा?”
कांग्रेस नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया
कांग्रेस विधायक और पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ.गोविंद सिंह ने कहा कि यदि विधानसभा में मुद्दों को उठाने से रोका गया, तो वे जरूरत पड़ी तो सड़क पर उतरेंगे…जेल जाएंगे…तो वो जरूरत पड़ी तो जेल में भी अपनी बात उठाएंगे। उन्होंने यह भी चेताया कि अगर यह आदेश वापस नहीं लिया गया तो वे बड़ा आंदोलन करेंगे। इसी तरह, पूर्व मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस विधायक लखन घनघोरिया ने अध्यक्ष के आदेश को विधानसभा की गरिमा के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा, “विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है। अगर माननीय अध्यक्ष स्वयं विपक्ष में रह चुके हैं, तो उन्हें पता होना चाहिए कि आवाज उठाना लोकतंत्र का आधार है। इस तरह के आदेश से विधानसभा की भूमिका ही सीमित हो जाएगी।”
बीजेपी का बचाव: “विधानसभा कोई थिएटर नहीं”
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अध्यक्ष के आदेश का समर्थन किया है। पार्टी के वरिष्ठ विधायक और पूर्व प्रोटेम स्पीकर रामेश्वर शर्मा ने कहा, “विधानसभा में गंभीर विषयों पर चर्चा होनी चाहिए, न कि हंगामे और बैनर-पोस्टर की राजनीति। विरोध प्रदर्शन करने के लिए रोशनपुरा या दशहरा मैदान जैसे स्थान पर्याप्त हैं। सदन कोई थिएटर नहीं है।” बीजेपी का मानना है कि विपक्ष को विषयों पर तथ्यों के साथ चर्चा करनी चाहिए, न कि सत्र को बाधित करने के लिए हंगामा खड़ा करना चाहिए।
विधानसभा परिसर में विरोध पर रोक: क्या यह पहली बार है?
हालांकि विधानसभा में कार्यवाही के दौरान अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से नियम पहले भी लागू होते रहे हैं, लेकिन इस बार अध्यक्ष द्वारा पूर्व में ही संपूर्ण रूप से विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी पर रोक लगाना एक असाधारण निर्णय माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह फैसला आगामी 2025 के अंत में संभावित विधानसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में सत्ता पक्ष की छवि को सुरक्षित रखने की कोशिश हो सकती है।
लोकतांत्रिक मर्यादा और अनुशासन
इस पूरे विवाद ने एक बड़े सवाल को जन्म दिया है — क्या लोकतंत्र में विरोध की आवाज को दबाना संविधान के मूल्यों के विपरीत नहीं है? एक ओर जहां विधानसभा अध्यक्ष का तर्क है कि सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए यह कदम आवश्यक है, वहीं विपक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मान रहा है। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने साफ कहा है कि वे इस आदेश का विरोध जारी रखेंगे और अध्यक्ष से आदेश वापस लेने की मांग की है।
मध्य प्रदेश विधानसभा का यह मानसून सत्र भले ही नियत विषयों पर केंद्रित हो, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, और सत्ता बनाम विपक्ष की जंग ने इसे सियासी हलकों में चर्चा का विषय बना दिया है। विधानसभा में उठने वाली हर आवाज अब सत्ता और विपक्ष के बीच की दूरी का नया पैमाना बनेगी। क्या लोकतंत्र में शांति और मर्यादा के नाम पर विरोध को दबाया जा सकता है? यह सवाल आने वाले दिनों की राजनीति की दिशा तय करेगा।सत्र की आगे की कार्यवाही में यह देखने वाली बात होगी कि कांग्रेस और विपक्ष इस मुद्दे को कैसे उठाते हैं और क्या यह सत्र सुचारू रूप से चल पाएगा या विरोध के स्वर और तेज होंगे। यदि अध्यक्ष नरम रुख अपनाते हैं तो विपक्षी दल इसे अपनी नैतिक जीत के रूप में लेंगे, लेकिन अगर आदेश यथावत रहता है, तो विधानसभा के बाहर विरोध-प्रदर्शन, मीडिया में बयानबाज़ी, और शायद राज्यव्यापी आंदोलन तक की संभावनाएं जताई जा रही हैं।…(प्रकाश कुमार पांडेय)





