काशी में गूंजा स्वर्णिम इतिहास: सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य ने दिया सुशासन का संदेश

cm Mohan Yadav

काशी में गूंजा स्वर्णिम इतिहास: सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य ने दिया सुशासन का संदेश

सुशासन और संस्कृति का संगम बना महानाट्य

वाराणसी की पावन धरा पर आयोजित ‘सम्राट विक्रमादित्य’ महानाट्य केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सुशासन, राष्ट्रप्रेम और भारतीय गौरव का जीवंत प्रतीक बनकर उभरा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसे सम्राट विक्रमादित्य की न्यायप्रिय और आदर्श शासन व्यवस्था का सशक्त संदेश बताया।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अहम आयोजन

  • तीन दिवसीय इस आयोजन में भव्य चित्र प्रदर्शनी भी आकर्षण का केंद्र रही
  • उज्जैन के महाकाल मंदिर की प्रतिकृति विशेष रूप से सराही गई
  • 18 घोड़े, हाथी, ऊंट और रथों के साथ जीवंत मंचन ने वास्तविकता का अहसास कराया
  • विक्रम-बेताल कथा से लेकर राजतिलक तक की पूरी गाथा को प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया

मोदी के सुशासन से जुड़ा ऐतिहासिक संदर्भ

मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को सम्राट विक्रमादित्य के सुशासन से जोड़ते हुए कहा कि आज देश में विकास और राज्यों के बीच सहयोग उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। केन-बेतवा लिंक जैसी परियोजनाएं इस सोच का उदाहरण हैं।

काशी से उज्जैन तक जुड़ी सांस्कृतिक कड़ी

कार्यक्रम का शुभारंभ योगी आदित्यनाथ और डॉ. यादव ने मिलकर किया। योगी ने कहा कि काशी विश्वनाथ मंदिर और महाकालेश्वर मंदिर की सांस्कृतिक धारा को इस आयोजन ने एक सूत्र में पिरो दिया है, जो “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” की भावना को साकार करता है।

युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा बना मंच

इस भव्य महानाट्य में 400 से अधिक कलाकारों ने भाग लिया, जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य पेशेवर भी शामिल रहे। यह मंच न केवल प्रतिभाओं को अवसर दे रहा है, बल्कि युवाओं को सम्राट विक्रमादित्य के पराक्रम, न्याय और त्याग से भी परिचित करा रहा है।

भव्य प्रस्तुति ने जीवंत किया स्वर्णिम युग

विशाल सेट, हाथी-घोड़े, रथ और आधुनिक लाइट-साउंड तकनीक के साथ प्रस्तुत इस नाटक ने दर्शकों को हजारों वर्ष पुराने युग में पहुंचा दिया। शकों के खिलाफ युद्ध, ‘सिंहासन बत्तीसी’ और विक्रम संवत की स्थापना जैसे प्रसंगों ने दर्शकों को रोमांचित और गौरवान्वित किया। ‘सम्राट विक्रमादित्य’ महानाट्य ने यह साबित कर दिया कि जब इतिहास को आधुनिक तकनीक और भव्यता के साथ प्रस्तुत किया जाता है, तो वह केवल मनोरंजन नहीं रहता—बल्कि समाज को दिशा देने वाला माध्यम बन जाता है। काशी की इस ऐतिहासिक शाम ने भारत की सांस्कृतिक जड़ों और सुशासन की परंपरा को फिर से जीवंत कर दिया।

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