पहले फ्रेम से मोदी गायब, अब पानी की दुहाई; पाकिस्तान की सियासत में भारत विरोध का पुराना फॉर्मूला!”
मोदी को फ्रेम से हटाया, अब सिंधु पर हक जताया; पाकिस्तान की भारत नीति का विरोधाभास फिर बेनकाब
नई दिल्ली। पाकिस्तान की भारत नीति एक बार फिर अपने विरोधाभासी रंग के साथ सामने है। एक तरफ SCO की तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फ्रेम से बाहर करने की कोशिश दिखाई दी, दूसरी तरफ उसी बहुपक्षीय मंच से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भारत को सिंधु जल संधि की याद दिलाते नजर आए। तस्वीर पर विवाद बढ़ा तो शहबाज शरीफ ने बाद में पूरी तस्वीर साझा कर दी, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने पाकिस्तान के रवैये पर सवाल जरूर खड़े कर दिए।
मामला सिर्फ एक तस्वीर का नहीं है। इसके पीछे पाकिस्तान की वह कूटनीतिक राजनीति दिखाई देती है, जिसमें भारत के साथ तनाव के बीच भी पाकिस्तान उन समझौतों और व्यवस्थाओं की दुहाई देता है, जिनसे उसके हित जुड़े हैं। SCO के मंच से शहबाज शरीफ ने सिंधु जल को क्षेत्र की जीवनरेखा बताते हुए कहा कि पानी का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने या हथियार के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए।
लेकिन भारत का सवाल इससे कहीं बड़ा है—जब पाकिस्तान पानी को जीवनरेखा बता रहा है, तब सीमा पार आतंकवाद के कारण भारत की सुरक्षा को होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
आतंकवाद बढ़ा तो रिश्तों की बुनियाद भी बदली
भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला लिया था। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद भारत ने 7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ढांचे को निशाना बनाया।
यही वह बिंदु है जहां भारत-पाकिस्तान संबंधों का पुराना समीकरण बदलता दिखाई देता है। भारत का रुख स्पष्ट है कि आतंकवाद और सामान्य संबंध एक साथ नहीं चल सकते।
पाकिस्तान जब अब सिंधु जल संधि को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता बताकर उसके पालन की मांग करता है, तो भारत के सामने स्वाभाविक सवाल खड़ा होता है—क्या द्विपक्षीय रिश्तों में सिर्फ वही समझौते याद रखे जाएंगे जिनसे पाकिस्तान को फायदा होता है?
कारगिल से पहलगाम तक—हर बार बदला भारत का जवाब
पाकिस्तान की भारत नीति में टकराव कोई नया अध्याय नहीं है। 1999 का कारगिल संघर्ष, 2008 का मुंबई आतंकी हमला, 2016 का उरी हमला और 2019 का पुलवामा हमला—हर घटना ने दोनों देशों के रिश्तों को और गहरा नुकसान पहुंचाया।
लेकिन इन घटनाओं के बाद भारत की प्रतिक्रिया भी लगातार बदलती गई।
कारगिल में भारतीय सेना ने घुसपैठ को पीछे धकेला। उरी हमले के बाद भारत ने सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक की। पुलवामा हमले के बाद बालाकोट में एयर स्ट्राइक हुई। वहीं पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर के जरिए भारत ने पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया।
यानी भारत की रणनीति का संदेश धीरे-धीरे और स्पष्ट होता गया—आतंकी हमला होगा तो जवाब सिर्फ बयान तक सीमित नहीं रहेगा।
सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की बेचैनी
1960 में हुई सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच जल बंटवारे की व्यवस्था तय करती है। इसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और दायित्व निर्धारित किए गए।
भारत के संधि को स्थगित करने के फैसले के बाद पाकिस्तान लगातार इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठा रहा है। पाकिस्तान ने हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता अदालत की प्रक्रिया का भी सहारा लिया है। हालांकि भारत इस प्रक्रिया के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता।
यहीं पाकिस्तान की चिंता सबसे ज्यादा दिखाई देती है। पाकिस्तान के लिए सिंधु नदी प्रणाली केवल पानी का मुद्दा नहीं, बल्कि उसकी कृषि, अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा विषय है। इसलिए भारत द्वारा संधि को स्थगित किया जाना इस्लामाबाद के लिए रणनीतिक चिंता का विषय बन गया है।
तस्वीर छोटी थी, संदेश बड़ा निकल गया
SCO की तस्वीर में मोदी को क्रॉप करने की घटना भले ही सोशल मीडिया विवाद जैसी लगे, लेकिन कूटनीति में प्रतीक भी संदेश देते हैं। एक ओर पाकिस्तान भारत के प्रधानमंत्री को तस्वीर के फ्रेम से बाहर करता दिखा और दूसरी ओर उसी समय भारत से जल समझौते के सम्मान की अपेक्षा करता है।
यही विरोधाभास इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू है।
जिस भारत को पाकिस्तान तस्वीर में जगह देने से बचता है, उसी भारत से वह सिंधु के पानी पर बातचीत और समझौते की उम्मीद करता है।
बाद में शहबाज शरीफ द्वारा पूरी तस्वीर साझा किए जाने से तस्वीर विवाद का एक हिस्सा जरूर शांत हुआ, लेकिन भारत-पाकिस्तान संबंधों का मूल सवाल वहीं खड़ा है—क्या पाकिस्तान भारत के साथ टकराव की राजनीति छोड़े बिना सामान्य रिश्तों की उम्मीद कर सकता है?
भारत का रुख—पहले आतंकवाद, फिर बातचीत
भारत लंबे समय से कहता रहा है कि पड़ोसी देश के साथ सामान्य संबंधों के लिए आतंकवाद का मुद्दा सबसे बड़ी बाधा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी SCO मंच से आतंकवाद के खिलाफ सख्त संदेश दिया और आतंकवाद के पूरे नेटवर्क को खत्म करने की जरूरत पर जोर दिया।
इसका सीधा अर्थ यही है कि भारत अब पाकिस्तान के बयानों को सिर्फ बयान के रूप में नहीं देखता। आतंकवाद, सीमा सुरक्षा, कूटनीति और जल संसाधन—इन सभी मुद्दों को व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से देखा जा रहा है।
पाकिस्तान की मुश्किल यही है कि वह भारत के साथ अपने हितों से जुड़े समझौतों को अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी बताता है, लेकिन भारत की सुरक्षा चिंताओं का समाधान करने के सवाल पर वही तत्परता दिखाई नहीं देती।
पाकिस्तान के लिए असली सवाल
मोदी की तस्वीर को क्रॉप करने से कुछ घंटों के लिए राजनीतिक संदेश जरूर बनाया जा सकता है, लेकिन भारत के साथ संबंधों की वास्तविकता नहीं बदली जा सकती।
भारत अब उस दौर में नहीं है जहां आतंकी हमला एक घटना बने, बयान जारी हों और कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य हो जाए। उरी, पुलवामा और पहलगाम के बाद भारत ने अपनी प्रतिक्रिया का तरीका बदलकर यह संकेत दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कार्रवाई भी होगी और उसकी कीमत भी तय होगी।
इसलिए पाकिस्तान के सामने सवाल सिर्फ सिंधु जल संधि का नहीं है। सवाल यह है कि वह भारत के साथ कैसा रिश्ता चाहता है?
एक तरफ तस्वीर से भारत को हटाना और दूसरी तरफ भारत से समझौतों की दुहाई देना—यह नीति कब तक चलेगी? पाकिस्तान को समझना होगा कि भारत को फ्रेम से बाहर करने की कोशिश आसान हो सकती है, लेकिन भारत की ताकत, कूटनीति और रणनीतिक भूमिका को नजरअंदाज करना इतना आसान नहीं। तस्वीर बदली जा सकती है, लेकिन हकीकत नहीं।





