आपराधिक कानूनों से जुड़े तीन बिल लोकसभा से पास हो गए हैं। इससे पहले इन बिलों पर चर्चा हुई। नए कानून में आतंकवाद महिला विरोधी अपराध देशद्रोह और मॉब लिचिंग से संबंधित नए प्रावधान पेश किए गए। वह बिल ऐसे समय में पास हुए हैं, जब संसद के 143 सांसदों को निलंबित कर दिया गया है। इनमें से लोकसभा के 97 सासंद और राज्य सभा के 46 सांसद शामिल हैं। भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता विधेयक 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता विधेयक-2023 और भारतीय साक्ष्य (द्वितीय) विधेयक 2013 बिल पेश करते हुए केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि इन बिलों के पेश करने का उदेशय कानून व्यवस्था को बेहतर बनाना है।
लोकसभा से पास किये गये आपराधिक कानूनों से जुड़े तीन नए बिल में भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के साथ भारतीय साक्ष्य बिल शामिल हैं। ये बिल 1860 के इंडियन पैनल कोड IPC, 1973 के कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर के साथ 1872 के एविडेंस एक्ट का स्थान लेंगे। इन क्रिनल बिल के तहत मॉब लिंचिंग ही नहीं नाबालिग से दुष्कर्म पर भी मौत की सजा का प्रावधान किया गया है।
- बदलेगा 150 साल पुराना कानूनी इतिहास
- सरकार ने अंग्रेजों के जमाने के कानून बदले
- भादंसं और भारतीय साक्ष्य अधिनियम को बदला
- केन्द्र सरकार लेकर आई तीन नए कानून
- लोकसभा से पास हुए तीनों कानूनी बिल
दरअसल भारत अपने 150 साल पुराने कानूनी इतिहास को अब बदलने जा रहा है। अंग्रेजों के जमाने के जंग लगी भारतीय दंड संहिता के साथ भारतीय अपराध दंड संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह मौजूदा केंद्र सरकार तीन नए कानून लेकर आई है। इस प्रक्रिया में तीन नए विधेयक भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता 2023, नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता 2023 और भारतीय साक्ष्य (द्वितीय) विधेयक 2023 को संशोधन के साथ लोकसभा ने पारित कर दिया है। यह तीनों विधेयक केंद्र सरकार की ओर से मानसून सत्र में लोकसभा में पेश किए थे। उस वक्त सदन ने इन विधेयकों को संसदीय समिति को समीक्षा के लिए भेज दिया था। अब तीनो विधेयक कानून बनने की प्रक्रिया से महज दो कदम दूर हैं। यानि अभी राज्यसभा में इसे पास होना है। इसके बाद राष्ट्रपति की मुहर लगेगी। है। इन तीनों नए विधेयक के अधिनियम बन जाने के बाद भारतीय कानून सहिंता पूरी तरह बदल जाएगी। इनमें भारतीयता, संविधान और भारत की जनता की चिंता की गई है। ये कानून स्वदेशी तो होंगे ही इनसे औपनिवेशिक कानून से देश को मुक्ति भी मिलेगी। इनमें दंड विधान की जगह न्याय देने की चेष्टा की गई है। पिछले 150 वर्ष में अपराध का पूरा तंत्र बदल चुका है। नई नई तकनीेकें आ गईं हैं। ऐसे में इन परिवर्तनों के अनुरूप न्याय संहिता का होना भी जरूरी था। तीनों नए विधेयक में नई जरूरतों को एड्रेस किया गया है।
मॉब लिंचिंग पर अब फांसी की सजा का प्रावधान
माँव लिंचिंग जैसे अक्षम्य अपराध के लिए फांसी की सजा का प्रावधान किया गया है। 50 साल से अधिक समय तक सत्ता में रहने वाली कांग्रेस को भारतीय दंड सहिंता में समय के अनुरूप बदलाव करना चाहिए था। नए विधेयकों के कानून बन जाने के बाद छोटी सजा बाले मामले में तीन दिन के अंदर एफआईआर दर्ज करनी होगी। 3 से 7 साल की सजा के मामले में 14 दिन के अंदर एफआईआर दर्ज करनी होगी। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (सीआरपीसी) में पहले 484 धाराएं थीं, अब 531 होंगी। 177 धाराओं में बदलाव हुआ है। 9 नई धाराएं जोड़ी गई हैं। 39 नए सब सेक्शन जोड़े गए हैं। 44 नए प्रोविजन और स्पष्टीकरण जोड़े गए हैं। 35 सेक्शन में टाइम लाइन जोड़ी हैं। 14 धाराओं को हटाया गया है। गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों के बारे में अब हर पुलिस स्टेशन में विवरण दर्ज किया जाएगा। एक नामित पुलिस अधिकारी इन रिकॉडों को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होगा। रिकार्ड डिजिटल रखा जाएगा। तस्करी कानूनों को जेंडर न्यूट्रल बना दिया है।
राजद्रोह की जगह लागू किया गया देशद्रोह कानून
राजद्रोह की जगह देशद्रोह लागू किया गया है। सरकार की आलोचना अब अपराध नहीं होगा, हालांकि देश के खिलाफ बोलना या कृत्य करना गंभीर अपराध होगा। नए कानून में आतंकवाद को परिभाषित किया गया है। पहले के कानूनों में आतंकवाद की व्याख्या नहीं थी। यौन हिंसा के मामलों में बयान महिला न्यायिक मजिस्ट्रेट ही करेंगी और पीड़िता का बयान उसके आवास पर महिला पुलिस अधिकारी के सामने ही दर्ज होगा। झूठे वादे या पहचान छुपाकर यौन संबंध बनाना अब अपराध की श्रेणी में आएगा। सामूहिक दुष्कर्म के मामलों में 20 साल की सजा या आजीवन कारावास की सजा होगी। सात साल या उससे अधिक की सजा वाले सभी अपराधों में फोरेंसिक जांच अनिवार्य होगा। घोषित अपराधियों की भारत से बाहर की सम्पति को जब्त करने का नया प्रावधान होगा। भागे गए अपराधियों के खिलाफ भी सुनवाई हो सकेगी व सजा दी जा सकेगी। अब डिजिटल एविडेंस को भी कानूनी साक्ष्य का दर्जा मिलेगा। ये तीनों विधेयक कानूनी सुधार का मार्ग प्रशस्त करेगा। संसद में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) पद, रिसर्च एनलासिस विंग (रॉ) और खुफिया ब्यूरो (आईबी) के निदेशक पद को भी कानून के दायरे में लाने की मांग की गई है। ऐसे में देखने वाली बात होगी कि राज्यसभा में इस पर कितना विचार होता है।





