पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर ऐसा मोड़ आया है, जिसने आने वाले उपचुनावों की पूरी तस्वीर बदल दी है। चुनाव आयोग ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ वाले पारंपरिक चुनाव चिन्ह को अंतरिम तौर पर फ्रीज कर दिया, लेकिन ममता बनर्जी ने भी इस फैसले के सामने चुप बैठने के बजाय आधी रात को ही अपना जवाब आयोग तक पहुंचा दिया।
सबसे खास बात यह है कि ममता खेमे ने गुरुवार रात 11 बजकर 36 मिनट पर आयोग को अपना जवाब भेजा। जवाब में आदेश का कड़ा विरोध दर्ज कराने के साथ तीन वैकल्पिक नाम और चुनाव चिन्ह के विकल्प दिए गए। यानी आयोग की समयसीमा शुक्रवार सुबह 11 बजे थी, लेकिन ममता खेमा उससे काफी पहले अपनी रणनीति तैयार कर चुका था।
नाम गया तो पहचान कैसे बचेगी?
मामला सिर्फ एक चुनाव चिन्ह का नहीं है। किसी राजनीतिक दल के लिए उसका नाम और चुनाव चिन्ह मतदाताओं के बीच उसकी पहचान का बड़ा हिस्सा होता है।
टीएमसी के लिए ‘घासफूल’ सिर्फ ईवीएम पर दिखाई देने वाला एक निशान नहीं रहा है। 1998 में पार्टी के गठन के बाद से यही चिन्ह उसकी चुनावी पहचान का हिस्सा रहा है। ऐसे में आगामी उपचुनावों में इस चिन्ह का ईवीएम पर नहीं होना ममता खेमे के सामने एक अलग तरह की चुनावी चुनौती पैदा करता है।
चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों से तीन-तीन नाम और स्वतंत्र चुनाव चिन्हों के विकल्प मांगे हैं। आयोग इन विकल्पों में से उपयुक्त नाम और चिन्ह तय करेगा। यह व्यवस्था फिलहाल संबंधित उपचुनावों के लिए अंतरिम है।
ममता का ‘आधी रात’ वाला संदेश क्या बताता है?
ममता बनर्जी का देर रात जवाब भेजना अपने आप में राजनीतिक संदेश से ज्यादा संगठनात्मक तैयारी को दिखाता है। आयोग के आदेश के तुरंत बाद विकल्प तैयार करना बताता है कि ममता खेमा इस स्थिति में चुनावी प्रक्रिया को रोकने के बजाय वैकल्पिक पहचान के साथ आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है।
लेकिन साथ ही जवाब में आदेश का “सबसे कड़ा विरोध” दर्ज कराया गया है। यानी ममता खेमा वैकल्पिक नाम और चिन्ह की प्रक्रिया में हिस्सा तो ले रहा है, लेकिन आयोग के अंतरिम आदेश को स्वीकार कर लेने का संदेश भी नहीं देना चाहता।
यहीं से मामला दिलचस्प हो जाता है। एक तरफ चुनावी प्रक्रिया में आगे बढ़ने की मजबूरी है, दूसरी तरफ मूल नाम और चिन्ह पर दावा बरकरार रखने की राजनीतिक और कानूनी लड़ाई।
कांग्रेस ने क्यों खोला मोर्चा?
इस पूरे विवाद ने विपक्षी खेमे को भी सक्रिय कर दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने टीएमसी विवाद को शिवसेना और एनसीपी के पुराने नाम-चिन्ह विवादों से जोड़ते हुए चुनाव आयोग और बीजेपी पर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस के पवन खेड़ा और केसी वेणुगोपाल की ओर से भी आयोग के फैसले पर आपत्ति जताई गई है। समाजवादी पार्टी समेत इंडिया गठबंधन के कुछ अन्य दलों ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए हैं।
हालांकि, इन नेताओं के आरोप राजनीतिक दावे हैं, जिन्हें चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश के तथ्य से अलग करके देखना जरूरी है। उपलब्ध आदेश का तत्काल प्रभाव दोनों गुटों को मूल पार्टी नाम और आरक्षित चिन्ह इस्तेमाल करने से रोकना है।
असली लड़ाई उपचुनाव से आगे की है
नंदीग्राम और रेजीनगर के उपचुनाव फिलहाल इस विवाद का सबसे तात्कालिक मैदान हैं। लेकिन असली सवाल इससे बड़ा है—आखिर तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह पर अंतिम अधिकार किसे मिलेगा?
चुनाव आयोग ने अभी अंतिम फैसला नहीं दिया है। मौजूदा व्यवस्था अंतरिम है और दोनों पक्षों को अलग पहचान के साथ चुनाव लड़ने की अनुमति देने के लिए बनाई गई है। अंतिम संगठनात्मक दावे और पार्टी के नाम-चिन्ह को लेकर आगे की प्रक्रिया अलग होगी।
इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि घासफूल की लड़ाई में किसका पलड़ा भारी है। फिलहाल इतना जरूर साफ है कि जिस पार्टी की पहचान दशकों से एक नाम और एक चिन्ह से जुड़ी रही, उसी पार्टी के दोनों गुट अब उपचुनाव में अलग नाम और अलग चुनाव चिन्ह के साथ दिखाई दे सकते हैं।
ममता के सामने तीन मोर्चे
अब ममता बनर्जी के सामने एक साथ तीन चुनौतियां हैं।
पहली—चुनावी पहचान। नया चिन्ह मतदाताओं तक कितनी तेजी से पहुंचाया जाता है।
दूसरी—संगठन। पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को नए नाम और चिन्ह से जोड़ना।
तीसरी—कानूनी और संवैधानिक लड़ाई। मूल नाम और ‘घासफूल’ चिन्ह पर दावा बनाए रखना।
दूसरी तरफ बागी गुट के सामने भी बिल्कुल अलग चुनौती नहीं है। उसे भी मतदाताओं के सामने अपनी पहचान स्थापित करनी होगी और यह बताना होगा कि वह टीएमसी की वैध राजनीतिक विरासत का दावा किस आधार पर कर रहा है।
यानी फिलहाल घासफूल फ्रीज हुआ है, लेकिन लड़ाई खत्म नहीं हुई है।
ममता बनर्जी ने आधी रात को जवाब देकर यह संकेत जरूर दिया है कि वह आयोग के अंतरिम फैसले के बाद राजनीतिक और चुनावी दोनों मोर्चों पर सक्रिय हैं। अब निगाहें चुनाव आयोग के अगले फैसले पर हैं—कौन सा नाम मंजूर होता है, कौन सा चुनाव चिन्ह मिलता है और अंततः तृणमूल कांग्रेस की मूल पहचान पर फैसला किस दिशा में जाता है।