- केरल पहुंचने से पहले मॉनसून पर बड़ा अपडेट
- अल नीनो के असर से घट सकती है बारिश
- जून से सितंबर तक कम वर्षा का अनुमान
- खरीफ फसलों पर असर को लेकर बढ़ी चिंता
- भीषण गर्मी के बीच बारिश का इंतजार जारी
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. एम. रविचंद्रन ने भी मॉनसून की स्थिति पर जानकारी देते हुए कहा कि मॉनसून समुद्री क्षेत्र में सक्रिय हो चुका है, लेकिन अभी पूरी तरह जमीन तक नहीं पहुंचा है। जैसे ही यह केरल के तट पर स्थायी रूप से पहुंच जाएगा, मौसम विभाग इसकी आधिकारिक घोषणा करेगा। फिलहाल मौसम वैज्ञानिक इसके आगे बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं।
आमतौर पर भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की शुरुआत एक जून के आसपास मानी जाती है। पिछले वर्ष मॉनसून तय समय से काफी पहले 24 मई को ही केरल पहुंच गया था और 29 जून तक पूरे देश को कवर कर लिया था। लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग दिखाई दे रही हैं। मौसम विभाग के अनुसार इस साल जून से सितंबर तक मॉनसून सीजन के दौरान देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की जा सकती है।
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक इसके पीछे सबसे बड़ी वजह अल नीनो की संभावित सक्रियता मानी जा रही है। मॉनसून मिशन क्लाइमेट फोरकास्ट सिस्टम के आंकड़ों के अनुसार जुलाई के बाद अल नीनो की स्थिति विकसित हो सकती है। इसका सबसे अधिक असर अगस्त और सितंबर महीने की बारिश पर पड़ने की संभावना जताई गई है। अल नीनो के सक्रिय होने पर समुद्र की सतह का तापमान बढ़ जाता है, जिससे भारत में मॉनसून कमजोर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अगस्त और सितंबर में बारिश कम हुई तो इसका असर कृषि क्षेत्र पर भी दिखाई दे सकता है। हालांकि मौसम विभाग का मानना है कि खरीफ फसलों की शुरुआती बुवाई पर बहुत बड़ा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि अधिकांश बुवाई जून और जुलाई में ही पूरी हो जाती है। फिर भी लंबे समय तक कम बारिश रहने पर धान, दलहन, तिलहन और अन्य खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है।
देश के कई हिस्सों में इस समय तापमान सामान्य से अधिक बना हुआ है। दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों में लू और उमस लोगों को परेशान कर रही है। मौसम विभाग के अनुसार मॉनसून की सक्रियता बढ़ने के बाद ही लोगों को गर्मी से राहत मिलने की उम्मीद है। फिलहाल अगले कुछ दिनों तक तापमान में बहुत बड़ी गिरावट की संभावना नहीं दिखाई दे रही।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले कुछ वर्षों में मॉनसून का पैटर्न लगातार बदल रहा है। कहीं अत्यधिक बारिश तो कहीं लंबे सूखे जैसी स्थिति देखने को मिल रही है। यही वजह है कि अब कृषि, जल प्रबंधन और शहरी योजनाओं में मौसम की अनिश्चितता को ध्यान में रखते हुए नई रणनीति बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
फिलहाल पूरे देश की नजर इस बात पर टिकी है कि मॉनसून आखिर कब केरल पहुंचेगा और कितनी तेजी से आगे बढ़ेगा। किसानों से लेकर आम नागरिकों तक हर कोई बारिश का इंतजार कर रहा है, क्योंकि चिलचिलाती गर्मी और बढ़ती उमस के बीच मॉनसून ही राहत की सबसे बड़ी उम्मीद बना हुआ है।