राष्ट्रीय सुरक्षा पर बड़ा सवाल! MP में ‘क्लोन आधार मशीन’ अलर्ट के बाद भी 26 महीने तक नहीं हुई FIR
भोपाल। मध्यप्रदेश एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवालों के केंद्र में है। इस बार मामला किसी आतंकी मॉड्यूल की गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि आधार जैसी संवेदनशील पहचान प्रणाली से जुड़ी कथित सुरक्षा चूक का है। सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, 2023 में UIDAI ने चेतावनी दी थी कि मध्यप्रदेश में BSNL की कथित क्लोन आधार मशीनों के जरिए संदिग्ध और संभवतः आतंकियों के फर्जी आधार कार्ड बनाए जा रहे हैं। इसके बावजूद करीब 26 महीने तक न कोई FIR दर्ज हुई और न ही किसी व्यापक आपराधिक जांच की स्पष्ट जानकारी सामने आई।
- UIDAI ने 2023 में दी थी आतंकियों के फर्जी आधार बनने की चेतावनी
- BSNL ने 79 आधार किट बंद कीं, लेकिन आपराधिक जांच का रिकॉर्ड नहीं
- भोपाल समेत कई जिलों में क्लोन मशीनों के इस्तेमाल का दावा
- 26 महीने तक फाइलें घूमती रहीं, सिस्टम तय करता रहा कार्रवाई कौन करेगा
- राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले में प्रशासनिक सुस्ती पर उठे गंभीर सवाल
यदि दस्तावेजों में दर्ज तथ्यों की पुष्टि होती है, तो यह मामला केवल तकनीकी गड़बड़ी नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पहचान प्रणाली की विश्वसनीयता और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा बड़ा प्रश्न बन सकता है।
भोपाल फिर सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर
भोपाल का नाम पहले भी कई आतंकी मामलों में सामने आता रहा है। प्रतिबंधित संगठनों और कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़े मामलों की जांच में समय-समय पर यह शहर चर्चा में रहा है। हाल में एक संदिग्ध की गिरफ्तारी के बाद सुरक्षा एजेंसियों की निगाहें फिर प्रदेश पर टिक गई हैं। इसी बीच सामने आए दस्तावेजों ने एक नई चिंता खड़ी कर दी है।
UIDAI ने नवंबर 2023 में भेजी थी गंभीर चेतावनी
दस्तावेजों के अनुसार, नवंबर 2023 में UIDAI ने BSNL को सूचित किया कि कुछ स्थानों पर क्लोन आधार एनरोलमेंट मशीनों का कथित तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। आरोप था कि इन मशीनों के जरिए समानांतर आधार पंजीकरण किया जा रहा था और इसका दुरुपयोग गंभीर सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकता है।
6 दिसंबर 2023: BSNL ने जारी किया अलर्ट
इसके बाद 6 दिसंबर 2023 को BSNL मध्यप्रदेश सर्किल ने अपने सभी बिजनेस एरिया प्रमुखों को पत्र जारी किया।
पत्र में कहा गया कि—
- UIDAI से गंभीर शिकायत प्राप्त हुई है।
- M/s Royal Communication नामक वेंडर के माध्यम से कथित तौर पर क्लोन मशीनों का संचालन किया जा रहा था।
- स्थानीय सुपरवाइजर और ऑपरेटरों की भूमिका भी संदिग्ध बताई गई।
- तत्काल प्रभाव से 79 आधार पंजीकरण किट डी-रजिस्टर करने के निर्देश दिए गए।
किन जिलों में थीं मशीनें?
दस्तावेजों के अनुसार जिन क्षेत्रों में आधार किट बंद करने के निर्देश दिए गए, उनमें शामिल थे—
- भोपाल
- विदिशा
- सागर
- छतरपुर
- टीकमगढ़
- जबलपुर
- बालाघाट
- मंडला
- नरसिंहपुर
- सतना
- सिवनी
- शहडोल
- छिंदवाड़ा
- ग्वालियर
- शिवपुरी
सहित प्रदेश के कई अन्य जिले।
सबसे बड़ा सवाल—क्या बने फर्जी आधार?
- इन मशीनों से क्या वास्तव में बने फर्जी आधार कार्ड ?
- कितने आधार पंजीकरण संदिग्ध पाए गए?
- क्या उनमें किसी आतंकी या अपराधी का नाम शामिल था?
- क्या किसी ऑपरेटर या वेंडर से पूछताछ हुई?
- क्या किसी थाने में एफआईआर दर्ज हुई?
- क्या ATS, STF या केंद्रीय जांच एजेंसियों को औपचारिक रूप से सूचना दी गई?
इन सवालों के स्पष्ट उत्तर अब तक सार्वजनिक नहीं हैं।
26 महीने बाद भी कार्रवाई पर संशय
मामले में 2 फरवरी 2026 का एक और पत्र सामने आया।
इस पत्र में मुख्य चर्चा इस बात पर थी कि संबंधित वेंडर Royal Communication को ब्लैकलिस्ट करने का अधिकार किसके पास है।
पत्र के अनुसार—
- UIDAI ने वेंडर पर कथित धोखाधड़ी और भ्रष्ट आचरण की सूचना दी थी।
- लेकिन BSNL के भीतर यह तय किया जा रहा था कि कार्रवाई सर्किल स्तर पर होगी या बिजनेस एरिया स्तर पर।
यानी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चेतावनी के दो वर्ष से अधिक समय बाद भी प्रशासनिक स्तर पर अधिकार क्षेत्र को लेकर चर्चा जारी थी।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न
यदि किसी पहचान प्रणाली का दुरुपयोग कर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए हों, तो उसके संभावित परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं। ऐसे दस्तावेजों का उपयोग कथित रूप से—
- बैंक खाते खोलने,
- मोबाइल सिम लेने,
- सरकारी योजनाओं का लाभ लेने,
- यात्रा संबंधी पहचान,
- या अन्य पहचान आधारित प्रक्रियाओं में किया जा सकता है।
हालांकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह सार्वजनिक रूप से पुष्टि नहीं हुई है कि कितने फर्जी आधार बने या उनका उपयोग किन गतिविधियों में हुआ। जांच एजेंसियों की अंतिम रिपोर्ट ही इस संबंध में निर्णायक होगी।
प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने कई प्रशासनिक सवाल खड़े कर दिए हैं—
- गंभीर चेतावनी मिलने के बाद तत्काल आपराधिक मामला क्यों दर्ज नहीं हुआ?
- क्या विभागीय कार्रवाई को ही पर्याप्त मान लिया गया?
- क्या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी रही?
- क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई नई व्यवस्था बनाई गई है?
अब निगाहें जांच पर
यह मामला केवल एक विभागीय अनियमितता का नहीं, बल्कि देश की पहचान प्रणाली की सुरक्षा से जुड़ा विषय माना जा रहा है। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह सुरक्षा व्यवस्था में बड़ी सेंध का मामला हो सकता है। वहीं यदि जांच में आरोप पुष्ट नहीं होते, तो भी यह स्पष्ट करना जरूरी होगा कि शुरुआती चेतावनी के बाद कार्रवाई में इतना विलंब क्यों हुआ। क्या मध्यप्रदेश में क्लोन मशीनों के जरिए फर्जी आधार कार्ड बनाए जा रहे थे? क्या UIDAI की गंभीर चेतावनी के बावजूद सिस्टम 26 महीने तक सिर्फ फाइलें घुमाता रहा? और अगर मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा था, तो आखिर एफआईआर क्यों नहीं हुई? दस्तावेजों के आधार पर उठ रहे इन सवालों की पड़ताल करती हमारी यह एक्सक्लूसिव रिपोर्ट।