‘मेड इन चाइना’ से ‘क्रिएटेड इन चाइना’ तक: नवाचार और तकनीक से नई औद्योगिक पहचा गढ़ता चीन

‘मेड इन चाइना’ से ‘क्रिएटेड इन चाइना’ तक: नवाचार और तकनीक से नई औद्योगिक पहचा गढ़ता चीन

दशकों तक दुनिया में “मेड इन चाइना” का अर्थ लगभग तय था विशाल कारखाने, बड़े पैमाने पर
उत्पादन, प्रतिस्पर्धी लागत, मजबूत श्रमशक्ति और दुनिया भर के बाजारों के लिए सामान तैयार
करने वाली असाधारण विनिर्माण क्षमता। इसी औद्योगिक शक्ति के सहारे चीन वैश्विक आपूर्ति
शृंखलाओं के केंद्र में पहुंचा और “दुनिया की फैक्ट्री” उसकी सबसे परिचित अंतरराष्ट्रीय पहचान बन
गई। लेकिन 2026 के चीन को केवल इसी पुराने परिचय से समझना अब उसकी औद्योगिक
क्षमता का अधूरा वर्णन होगा। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरियां, औद्योगिक रोबोट, ड्रोन, दूरसंचार,
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में चीनी कंपनियां अब केवल दूसरे देशों में
विकसित तकनीक के आधार पर वस्तुएं बनाने तक सीमित नहीं हैं। वे स्वयं अनुसंधान कर रही हैं,
पेटेंट हासिल कर रही हैं, तकनीक विकसित कर रही हैं और अपने ब्रांड के साथ वैश्विक बाजारों में
उतर रही हैं। यानी चीन की औद्योगिक कहानी में एक नया अध्याय जुड़ रहा है “मेड इन चाइना”
समाप्त नहीं हो रहा, बल्कि उसके साथ “क्रिएटेड इन चाइना” उभर रहा है।
इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण प्रमाण संयुक्त राष्ट्र की विशेषीकृत संस्था विश्व बौद्धिक संपदा
संगठन यानी डब्ल्यूआईपीओ के आंकड़ों में दिखाई देता है। 2025 के वैश्विक नवाचार सूचकांक में
चीन पहली बार दुनिया की दस सबसे नवाचारी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होकर 139
अर्थव्यवस्थाओं में 10वें स्थान पर पहुंचा। इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि चीन innovation
inputs यानी नवाचार के लिए लगाए जाने वाले संसाधनों में 19वें स्थान पर था, लेकिन
innovation outputs यानी उनसे पैदा होने वाले परिणामों में पांचवें स्थान पर पहुंच गया। ज्ञान
और प्रौद्योगिकी से जुड़े परिणामों में चीन दुनिया में पहले स्थान पर रहा। डब्ल्यूआईपीओ के
अनुसार चीन दुनिया की शीर्ष 30 नवाचारी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल एकमात्र उच्च-मध्यम आय
वाली अर्थव्यवस्था भी था। ये आंकड़े बताते हैं कि चीन की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को अब केवल
कम लागत वाले उत्पादन के पुराने पैमाने से नहीं समझा जा सकता। उत्पादन क्षमता के साथ
अनुसंधान, ज्ञान, पेटेंट और तकनीकी नवाचार उसकी आर्थिक शक्ति के अधिक महत्वपूर्ण हिस्से
बनते जा रहे हैं।

इस परिवर्तन के पीछे अनुसंधान एवं विकास में विशाल निवेश भी दिखाई देता है। चीन के राष्ट्रीय
सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार 2025 में देश का अनुसंधान एवं विकास खर्च बढ़कर 3.9262 लाख
करोड़ युआन हो गया, जो एक वर्ष पहले की तुलना में 8.1 प्रतिशत अधिक था और सकल घरेलू
उत्पाद के 2.80 प्रतिशत के बराबर था। इसमें बुनियादी अनुसंधान पर ही 277.8 अरब युआन खर्च
किए गए, जो पिछले वर्ष से 11.1 प्रतिशत अधिक थे। 2025 के अंत तक देश में नई व्यवस्था के
तहत 207 राष्ट्रीय इंजीनियरिंग अनुसंधान केंद्र और राष्ट्रीय विकास एवं सुधार आयोग से मान्यता
प्राप्त 1,921 उद्यम प्रौद्योगिकी केंद्र थे। इन आंकड़ों का महत्व केवल खर्च की विशाल राशि में
नहीं है। चीन ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर जोर दे रहा है जिसमें विश्वविद्यालय, वैज्ञानिक
संस्थान और उद्योग एक-दूसरे से जुड़ें और प्रयोगशाला में विकसित विचार को तेजी से वास्तविक
औद्योगिक उत्पाद में बदला जा सके। दुनिया की फैक्ट्री बनने का पहला चरण उत्पादन क्षमता पर
आधारित था; अगला चरण ज्ञान, अनुसंधान और मूल तकनीक पर अधिक निर्भर है।
चीन के नवाचार तंत्र की दूसरी बड़ी ताकत उसके औद्योगिक और वैज्ञानिक केंद्र हैं।
डब्ल्यूआईपीओ के 2025 के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के शीर्ष 100 नवाचार केंद्रों में सर्वाधिक 24
चीन में थे, जबकि अमेरिका में 22 थे। चीन लगातार तीसरे वर्ष इस संख्या में दुनिया में सबसे आगे
रहा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि Shenzhen–Hong Kong–Guangzhou समूह 2025 में
दुनिया का नंबर एक नवाचार केंद्र बना, जबकि बीजिंग चौथे स्थान पर रहा और
Shanghai–Suzhou भी शीर्ष वैश्विक केंद्रों में शामिल था। ऐसे केंद्र इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि
आधुनिक तकनीक केवल किसी सरकारी योजना या एक कंपनी की प्रयोगशाला में पैदा नहीं होती।
उसके लिए विश्वविद्यालय, वैज्ञानिक, अभियंता, निवेशक, पेटेंट, पूंजी और कारखानों का ऐसा तंत्र
चाहिए जो एक-दूसरे से जुड़ा हो। चीन के कई औद्योगिक क्षेत्रों में किसी नए उत्पाद के लिए
इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों से लेकर बैटरी, मोटर, कैमरा, सॉफ्टवेयर और उत्पादन विशेषज्ञता तक एक
व्यापक आपूर्ति शृंखला उपलब्ध है। यही औद्योगिक घनत्व किसी विचार को प्रयोगशाला से बड़े
पैमाने के उत्पादन तक पहुंचाने की चीन की सबसे महत्वपूर्ण क्षमताओं में से एक बन गया है।
अगर “क्रिएटेड इन चाइना” की इस यात्रा को किसी एक उद्योग में सबसे स्पष्ट रूप से देखना हो तो
इलेक्ट्रिक वाहन उसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के Global EV Outlook
2026 के अनुसार 2025 में दुनिया भर में करीब 2.2 करोड़ इलेक्ट्रिक कारों का उत्पादन हुआ और
उनमें लगभग तीन-चौथाई चीन में बनीं। चीन ने अकेले करीब 1.6 करोड़ इलेक्ट्रिक कारों का

उत्पादन किया। यह आंकड़ा केवल विशाल उत्पादन क्षमता का प्रमाण नहीं है। चीन से इलेक्ट्रिक
कारों का निर्यात 2025 में दोगुना होकर 25 लाख से अधिक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार चीन दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक वाहन विनिर्माण और
व्यापार केंद्र बना हुआ है। यहां एक महत्वपूर्ण बदलाव यह भी है कि इस उत्पादन का नेतृत्व बड़े
पैमाने पर घरेलू वाहन निर्माता कर रहे हैं। यानी कहानी अब केवल चीन की धरती पर कार बनाने
की नहीं है; चीनी कंपनियां अपने ब्रांड, अपनी तकनीक और अपनी औद्योगिक क्षमता के साथ
दुनिया के बाजारों में उतर रही हैं।
बैटरी उद्योग इस परिवर्तन को और गहराई से समझाता है। इलेक्ट्रिक वाहन का भविष्य केवल
कार के बाहरी ढांचे से तय नहीं होगा; बैटरी उसकी लागत, दूरी, सुरक्षा और प्रदर्शन का केंद्रीय
हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार 2025 में दुनिया की 80 प्रतिशत से अधिक बैटरी
कोशिकाओं का उत्पादन चीन में हुआ। इलेक्ट्रिक कारों में इस्तेमाल होने वाली बैटरियों में चीनी
उत्पादकों की वैश्विक हिस्सेदारी लगभग 75 प्रतिशत तक पहुंच गई।
चीन के औद्योगिक परिवर्तन का तीसरा महत्वपूर्ण चेहरा स्वचालन और रोबोटिक्स है। आधुनिक
कारखाने की प्रतिस्पर्धा केवल श्रमिकों की संख्या से तय नहीं होती; सटीकता, गति, स्वचालन और
डिजिटल नियंत्रण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रोबोटिक्स की World
Robotics 2025 रिपोर्ट के अनुसार 2024 में चीन के कारखानों में 2,95,000 नए औद्योगिक
रोबोट लगाए गए। यह उस वर्ष दुनिया में लगाए गए औद्योगिक रोबोटों का लगभग 54 प्रतिशत
था। 2024 तक चीन के कारखानों में सक्रिय औद्योगिक रोबोटों की संख्या 20 लाख से अधिक हो
चुकी थी। इससे भी महत्वपूर्ण परिवर्तन घरेलू उद्योग में आया चीनी रोबोट निर्माताओं की अपने
ही बाजार में हिस्सेदारी पहली बार 57 प्रतिशत तक पहुंच गई। यह बदलाव “मेड इन चाइना” और
“क्रिएटेड इन चाइना” के अंतर को बहुत स्पष्ट तरीके से सामने रखता है। कभी चीन बड़े पैमाने पर
विदेशी औद्योगिक मशीनों का उपयोग करके दुनिया के लिए सामान बनाता था; अब उसकी
कंपनियां उन्हीं मशीनों, रोबोटों और स्वचालन प्रणालियों को विकसित और निर्मित करने की
अपनी क्षमता भी तेजी से बढ़ा रही हैं।
“नई गुणवत्ता वाली उत्पादक शक्तियों” की अवधारणा चीन के वर्तमान औद्योगिक परिवर्तन को
समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसका आशय पुराने औद्योगिक आधार को त्यागना

नहीं, बल्कि उसे विज्ञान, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण
से अधिक उत्पादक बनाना है। चीन की विशाल विनिर्माण व्यवस्था इस रणनीति के लिए एक
विशिष्ट लाभ देती है।
इस यात्रा के सामने चुनौतियां भी हैं और उन्हें समझना चीन की उपलब्धियों के महत्व को कम नहीं
करता। उन्नत अर्धचालकों और कुछ अत्याधुनिक विनिर्माण उपकरणों के क्षेत्रों में चीन को
तकनीकी और बाहरी प्रतिबंधों से जुड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ा है। अमेरिका और चीन के
बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा और उन्नत चिप तथा संबंधित उपकरणों पर निर्यात नियंत्रण ने चीन के
लिए वैज्ञानिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता के महत्व को और बढ़ाया है। दूसरी ओर यूरोप और
अमेरिका ने चीन की औद्योगिक सहायता तथा उत्पादन क्षमता को लेकर चिंताएं जताई हैं और
इलेक्ट्रिक वाहनों सहित कुछ क्षेत्रों में शुल्क तथा व्यापारिक विवाद सामने आए हैं। चीन इन दावों
से असहमति जताता है और अपनी औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को तकनीकी प्रगति, विशाल घरेलू
बाजार, संपूर्ण औद्योगिक व्यवस्था और कुशल आपूर्ति शृंखलाओं से जोड़ता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा
एजेंसी ने भी बताया है कि चीन में इलेक्ट्रिक वाहन उत्पादन घरेलू मांग से आगे निकलने के कारण
विदेशी बाजार चीनी कंपनियों के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो रहे हैं। इसे केवल समस्या के रूप में
देखने के बजाय यह चीन के उद्योग के सामने अगला प्रश्न भी रखता है क्या घरेलू पैमाने पर
हासिल तकनीकी और उत्पादन क्षमता को स्थायी वैश्विक ब्रांड शक्ति में बदला जा सकता है?
असल परिवर्तन शायद यहीं है। “मेड इन चाइना” समाप्त नहीं हो रहा है और न ही चीन की
औद्योगिक यात्रा का अगला चरण अपनी विनिर्माण शक्ति को छोड़ने का है। उसके ऊपर एक नई
परत जुड़ रही है चीन में अनुसंधान, चीन में अभिकल्पना, चीन में तकनीकी विकास, चीन में पेटेंट,
चीन में निर्माण और चीन के अपने वैश्विक ब्रांड। विनिर्माण और नवाचार को दो अलग रास्तों के
रूप में देखने के बजाय चीन उन्हें एक ही आर्थिक व्यवस्था में जोड़ रहा है।
चार दशक पहले चीन ने दुनिया को दिखाया था कि विशाल पैमाने, बुनियादी ढांचे और संगठित
आपूर्ति शृंखला के सहारे वस्तुओं का उत्पादन वैश्विक अर्थव्यवस्था को किस तरह बदल सकता है।
अब चीन की अगली परीक्षा और अधिक महत्वाकांक्षी है क्या वह अगली पीढ़ी की तकनीकों को
स्वयं विकसित करके उन्हें प्रयोगशाला से कारखाने और फिर कारखाने से वैश्विक बाजार तक उसी
दक्षता से पहुंचा सकता है? इस प्रश्न का अंतिम उत्तर भविष्य देगा, लेकिन वर्तमान आंकड़े बताते हैं

कि इस दिशा में चीन की प्रगति को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। दुनिया के सबसे बड़े
इलेक्ट्रिक वाहन विनिर्माण केंद्र, 80 प्रतिशत से अधिक बैटरी सेल उत्पादन, 20 लाख से अधिक
सक्रिय औद्योगिक रोबोट, करीब 3.93 लाख करोड़ युआन का वार्षिक अनुसंधान एवं विकास व्यय
और दुनिया में सर्वाधिक 24 शीर्ष नवाचार केंद्र इन उपलब्धियों को एक साथ देखने पर चीन की
औद्योगिक पहचान का नया रूप अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
“मेड इन चाइना” ने चीन को वैश्विक उत्पादन शक्ति बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। अब
उसके साथ उभरता “क्रिएटेड इन चाइना” एक नए चरण की ओर संकेत कर रहा है ऐसा चरण
जिसमें पैमाने के साथ नवाचार, विनिर्माण के साथ अनुसंधान, कारखानों के साथ प्रयोगशालाएं
और उत्पादन के साथ मूल तकनीक जुड़ रही है। राष्ट्रपति शी चिनफिंग के नेतृत्व में वैज्ञानिक और
तकनीकी नवाचार तथा नई गुणवत्ता वाली उत्पादक शक्तियों पर दिया जा रहा जोर इसी व्यापक
परिवर्तन को राष्ट्रीय विकास की दिशा से जोड़ता है। चीन की अगली औद्योगिक पहचान शायद
केवल इस बात से तय नहीं होगी कि दुनिया की कितनी वस्तुएं वहां बनती हैं, बल्कि इस बात से भी
तय होगी कि अगली पीढ़ी की कितनी तकनीकें वहां जन्म लेती हैं। “मेड इन चाइना” दुनिया को
चीन की उत्पादन क्षमता से परिचित कराने वाला अध्याय था; “क्रिएटेड इन चाइना” उसी कहानी
को नवाचार, तकनीक और नए विचारों के अगले अध्याय तक ले जाने की कोशिश है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) (लेखक: नीरज बाली)

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